वर्ष 2014 से अभी तक जिला भर मेें लगभग 1 करोड़ रूपये का माल जब्त

देश में नशा के आदी लोगों का आंकड़ा 50 लाख के पार : मंसूर अहमद मीर

  • देश में नशा के आदी लोगों का आंकड़ा 50 लाख के पार
  • भारत में युवा पीढ़ी में नशीली दवाइयों का चलन एक रूप ले रहा है महामारी का
  • मुख्य न्यायधीश का नशीले पदार्थों के पूर्ण उन्मूलन पर बल
  • भारत में इस समय करीब 10 लाख युवा हैरोइन जैसे नशे की चपेट में
  • गैर अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 50 लाख के करीब
  • वर्तमान में नशे का अवैध व्यापार 500 बिलियन डॉलर के आंकड़ा पार
  • वर्तमान में सिंथेटिक नशे का चलन एक बड़ी चुनौती
  • अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य नशे के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए एक सांझा रणनीति और विधिक सेवाएं प्राधिकरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार करना

शिमला: हिमाचल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने कहा कि देश में नशा के आदी लोगों का आंकड़ा 50 लाख को पार कर चुका है, जो चिंताजनक है। उन्होंने नशीले पदार्थों के पूर्ण उन्मूलन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारत में युवा पीढ़ी में नशीली दवाइयों का चलन एक महामारी का रूप ले रहा है। मुख्य न्यायाधीश आज मनाली में हिमाचल प्रदेश राज्य विधिक सेवाएं प्राधिकरण द्वारा आयोजित ‘भारत में नशाखोरी, समीक्षा, चुनौतियां और समाधान’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय विधिक अधिवेशन को सम्बोधित कर रहे थे।

न्यायमूर्ति मीर ने कहा कि बढ़ते आर्थिक दबाव और परिवारों के बिखराव के कारण नशाखोरी का चलन बढ़ा हैं। वैश्विक आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो यह तस्वीर और भी धुंधली नजर आती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में नशे का अवैध व्यापार 500 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है, जो पैट्रोलियम एवं हथियारों के व्यापार के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धंधा है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दुनिया भर में नशाखोरी के आदी बहुत ही दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं और भारत में भी स्थिति कोई अलग नहीं है। भारत में इस समय करीब 10 लाख युवा हैरोइन जैसे नशे की चपेट में हैं और गैर अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 50 लाख के करीब है।

न्यायमूर्ति मीर ने कहा कि औषधीय उत्पादनों में नशीली दवाओं के दुरुपयोग के मामले बढ़े हैं। एक आकलन के अनुसार भारत में नौवीं कक्षा तक पहुंचने वाले कुल छात्रों में से 50 प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्होंने कम से कम एक बार नशे का सेवन किया है। भारत में नशे के सेवन का दुष्प्रभाव विशेषकर महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, एच.आई.वी. जैसे रोग एवं आर्थिक तंगी के तौर पर भुगतना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में सिंथेटिक नशे का चलन एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे पदार्थों की मांग में कमी को लेकर विशेष प्रयास करने और नशाखोरी की समस्या के निपटारे के लिए स्वास्थ्य प्रोत्साहन नीतियां एवं नशामुक्ति शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता है।

न्यायमूर्ति मीर ने कहा कि अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य नशे के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए एक सांझा रणनीति और विधिक सेवाएं प्राधिकरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार करना है ताकि देश के कोने-कोने में इसके खिलाफ एक सार्थक संदेश प्रसारित कर सके।

 

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