प्रमुख बिजली उपकरणों की थोक खरीद के लिए ई-रिवर्स नीलामी शुरू

प्रधानमंत्री मोदी के अहम कदमों ने भारत के बिजली क्षेत्र में नई जान फूंकी

प्रधानमंत्री मोदी के अहम कदमों ने भारत के बिजली क्षेत्र में नई जान फूंकी

सरकार आधारभूत विकास के क्षेत्र में 1000 अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य का कर रही है व्‍यय

बिजली क्षेत्र में कम से कम 300 अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य के बराबर व्‍यय होने का अनुमान

मोदी सरकार ने वर्ष 2019 तक देशभर में 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से एक बृहद कार्यक्रम किया है शुरू

मोदी सरकार ने भारतीय बिजली प्रणाली को किफायती, उत्‍तरदायी और विश्‍वसनीय बनाने के उद्देश्‍य से राष्‍ट्रीय स्‍मार्ट ग्रिड मिशन की शुरूआत

देश के भीतर सेवाप्रदाताओं को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए सरकार ने नये उपायों की की घोषणा

विशेष लेख

भारत में आधारभूत सुविधाओं की कमी होना एक सबसे बड़ी समस्‍या है, जो देश की तीव्र आर्थिक प्रगति, विशेषकर बिजली उत्‍पादन क्षेत्र के लिए बाधक है। इस बाधा से अवगत प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की सरकार ने इस क्षेत्र को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए पिछली संप्रग सरकार द्वारा कोयले की नीलामी में गड़बडि़यों को ठीक करते हुए कई उपाय किए हैं। अकेले कोयला घोटाले के कारण देश में बिजली क्षेत्र का विकास काफी मंद पड़ गया था और हमारा देश इस क्षेत्र में कई वर्ष पीछे चला गया। भारत का बिजली उत्‍पादन 266 लाख मेगावॉट के स्‍तर पर है और अगले 4 से 5 वर्षों में वार्षिक सकल घरेलू उत्‍पाद में 8-9 प्रतिशत अनुमानित वृद्धि के साथ इसकी मांग दुगुने से भी अधिक होने की संभावना है। ऐसे में बिजली की मांग को पूरा करना एक बहुत बड़ा काम होगा, क्‍योंकि न केवल औद्योगिक और कृषि के क्षेत्र में वृद्धि के कारण इसकी मांग बढ़ेगी, बल्कि मध्‍यवर्गीय लोगों के जीवनस्‍तर में सुधार आने के साथ इनकी संख्‍या 30 करोड़ तक पहुंचने के साथ घरेलू उपभोग में भी इसकी मांग बढ़ेगी।

सरकार आधारभूत विकास के क्षेत्र में 1000 अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य का व्‍यय कर रही है और अगले पांच वर्षों में बिजली क्षेत्र में कम से कम 300 अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य के बराबर व्‍यय होने का अनुमान है। पहले की तरह ही वित्‍तपोषण कोई मुद्दा नहीं है, किन्‍तु कुशल कामगारों की कमी एक रूकावट बन सकती है और नई सरकार की ओर से इस समस्‍या के निदान के लिए पर्याप्‍त कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि आधारभूत क्षेत्र में भी सार्वजनिक निजी भागीदारी के अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त नहीं हुए हैं और इसमें कुछ सुधार की आवश्‍यकता है। यही कारण है कि वित्‍त मंत्री अरूण जेटली ने केन्‍द्रीय बजट में लगभग एक लाख करोड़ रूपये के निवेश के साथ 20,000 मेगावॉट ताप बिजली के उत्‍पादन के लिए बृहद बिजली संयंत्रों की स्‍थापना की घोषणा की थी। ऐसे 4000 मेगावॉट क्षमता वाले पांच बिजली संयंत्रों में से पहले संयंत्र की स्‍थापना ओडि़शा में और इसके बाद एक अन्‍य संयंत्र की स्‍थापना तमिलनाडु में की जाएगी।

संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान 1.86 लाख करोड़ रूपये मूल्‍य के कोयला घोटाले के बाद सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा 204 कोयला ब्‍लॉकों का आवंटन रद्द करने के बाद इनमें से कुछ ब्‍लॉकों की सफल नीलामी के बाद सरकार ने दो लाख करोड़ रूपये जुटाए और कोयले की कमी के कारण अवरूद्ध 20,000 मेगावॉट ताप बिजली परियोजनाओं को फिर शुरू करने पर जोर दिया। सरकार के इस कदम से देश के कुछ हिस्‍से में बिजली की कमी से तत्‍काल राहत मिलेगी। किंतु, ग्रिड के कनेक्‍शन में कमी होने के कारण संभवत: इस कार्य में बाधा उपस्थित होगी और बिजली की कमी वाले दक्षिणी और पूर्वी राज्‍यों में अतिरिक्‍त बिजली पहुंचाने में दिक्‍कत हो सकती है। उद्योगजगत की बढ़ती जरूरत के अलावा मोदी सरकार ने वर्ष 2019 तक देशभर में 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से एक बृहद कार्यक्रम शुरू किया है। इसका अर्थ देश के छह लाख गांवों में से सवा लाख गांवों को ग्रिड से जोड़ना है। इन सवा लाख गांवों को अब तक इससे नहीं जोड़ा गया है। 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्‍ध कराने का तात्‍पर्य यह भी है कि इस दिशा में अन्‍य नये कदम उठाए जाएं। इस बात से अवगत होकर ताप बिजली उत्‍पादन, पनबिजली और नाभिकीय बिजली के साथ-साथ और अधिक महत्‍वपूर्ण सौर बिजली, पवन ऊर्जा तथा अन्‍य हरित ऊर्जा के अलावा पारेषण और वितरण प्रणाली को सशक्‍त करने, फीडर को अलग करने और उपभोक्‍ताओं को दी जाने वाली बिजली का मापन करने के लिए कई ऐतिहासिक निर्णय किये गये हैं।

देश के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की ओर ध्‍यान देते हुए पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की बिजली प्रणाली से संबंधित सुधार की परियोजनाओं और इन राज्‍यों में बिजली के पारेषण और वितरण को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से व्‍यापक योजना को मंजूरी दी गई है। सुधार और पुनरूद्धार के मोर्चे पर बिजली अधिनियम और शुल्‍क नीति में अनेक संशोधन किये जा रहे हैं। सभी घरों के लिए 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्‍ध कराने हेतु राज्‍यवार व्‍यापक कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं और इसके बारे में संबंधित राज्‍यों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है। बिजली मंत्रालय ने अपनी ”सबके लिए बिजली” नामक पहल के अधीन आंध्र प्रदेश सरकार के साथ एक सहमति पत्र पर हस्‍ताक्षर किए हैं, जिसका उद्देश्‍य अक्‍टूबर, 2016 तक संपूर्ण राज्‍य को इसके दायरे में लाना है। दिल्‍ली और राजस्‍थान के लिए योजनाएं तैयार की गई हैं और अन्‍य राज्‍यों के लिए इन्‍हें तैयार किया जा रहा है। सरकार कृषि और ग्रामीण घरेलू उपभोग के लिए अलग फीडर के माध्‍यम से बिजली आपूर्ति करने के लिए 43,033 करोड़ रूपये की एक महत्‍वाकांक्षी योजना कार्यान्वित करने में जुटी है, ताकि ग्रामीण परिवारों को 24 घंटे सातों दिन बिजली मिलना सुनिश्चित हो सके। उप-पारेषण और वितरण प्रणालियों को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से 32,612 करोड़ रूपये की लागत से समन्वित बिजली विकास पहल शुरू की गई है। पारेषण के दौरान बिजली में पांच प्रतिशत कमी की समस्‍या के समाधान के लिए योजना तैयार की गई है, जो महत्‍वपूर्ण है और यह लगभग 27 प्रतिशत के स्‍तर पर है। पारेषण के दौरान पांच प्रतिशत बिजली के नुकसान का अर्थ यह है कि भारत को बिना अतिरिक्‍त निवेश के अतिरिक्‍त 15,000 मेगावॉट बिजली का उत्‍पादन करना होगा। एक मेगावॉट बिजली उत्‍पादन की क्षमता के सृजन का अर्थ 5-7 करोड़ रूपये का निवेश करना है और 15,000 मेगावॉट बिजली की कमी होने का अर्थ अतिरिक्‍त 75,000 से लेकर 1.05 लाख करोड़ रूपये अन्‍य निवेश के रूप में उपलब्‍ध करना है।

मोदी सरकार ने भारतीय बिजली प्रणाली को किफायती, उत्‍तरदायी और विश्‍वसनीय बनाने के उद्देश्‍य से राष्‍ट्रीय स्‍मार्ट ग्रिड मिशन की शुरूआत की है। स्‍मार्ट ग्रिडों में संचालकों के बीच बिजली संयंत्र से लेकर अंतिम उपभोक्‍ता तक बिजली पहुंचने तक स्‍वचालित करने, निगरानी करने और नियंत्रण करने के उद्देश्‍य से सेंसरों, मीटरों, डिजिटल नियंत्रण प्रणालियों के साथ-साथ विश्‍लेषणात्‍मक उपकरणों का इस्‍तेमाल किया जाता है। एक बिजली कंपनी ग्रिड निष्‍पादन को बढ़ाने के साथ-साथ आउटेज को रोक सकती है, आउटेज को तेजी से पुनर्स्‍थापित कर सकती है और उपभोक्‍ताओं को ऊर्जा के इस्‍तेमाल के प्रबंधन की अनुमति दे सकती है। स्‍मार्ट ग्रिडों के माध्‍यम से सौर और पवन ऊर्जा जैसी नई अक्षय ऊर्जाओं का सदुपयोग किया जा सकता है और उन्‍हें वितरित बिजली स्रोतों के साथ जोड़ा जा सकता है। यह एक अत्‍यंत महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम है और स्‍थापित होने वाली 100 स्‍मार्ट सिटी में स्‍मार्ट ग्रिड लगाए जाएंगे और इससे बिजली की काफी बचत हो सकेगी। सभी केन्‍द्रीय मंत्रालयों और विभागों से कहा गया है कि वे सीएफएल और अत्‍यधिक चमकीले बल्‍बों के स्‍थान पर एलईटी बल्‍ब लगाएं। वित्‍त मंत्रालय की ओर से इसके बारे में सभी विभागों को दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं।

विशाखापत्‍तनम में हाल के विनाशकारी हुदहुद चक्रवात के बाद एनर्जी एफिशिएंशी सर्विसेज लिमिटेड ने 91,000 स्‍ट्रीट लाइटों को हटाकर एलईटी लाइट लगवाई। चेन्‍नई और मुंबई नगर निगमों ने भी कुछ क्षेत्रों में सीएफएल और सोडियम वेपर लैम्‍पों के स्‍थान पर एलईडी स्‍ट्रीट लाइट लगवाना शुरू कर दिया है। चेन्‍नई जैसा महानगर 20 मेगावॉट तक और मुंबई लगभग 30 मेगावॉट बिजली की बचत स्‍ट्रीट लाइटों के रूप में कर सकते हैं। एलईडी लाइट लगभग 75,000 करोड़ रूपये का उद्योग है और इससे केवल स्‍ट्रीट लाइटों पर देशभर में 1000 मेगावॉट से अधिक बिजली की बचत हो सकती है।

मोदी सरकार की ओर से वर्ष 2022 तक एक लाख मेगावॉट सौर ऊर्जा और 60,000 मेगावॉट पवन ऊर्जा के अक्षय ऊर्जा उत्‍पादन के लक्ष्‍य पर जोर देने के साथ ही अगले सात वर्षों में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में 10 लाख करोड़ रूपये मूल्‍य का निवेश होने की संभावना है। अवरूद्ध पनबिजली परियोजनाओं को फिर से शुरू करने के लिए तेजी से किये गये प्रयासों के अलावा सरकार ने अक्षय ऊर्जा के लिए बजटीय आवंटन को 65.8 प्रतिशत बढ़ा दिया है। साथ ही, सौर तथा पवन ऊर्जा के लिए नई अक्षय ऊर्जा नीति लागू करने की प्रक्रिया चला रही है।

ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपनी कार्ययोजना के हिस्‍से के रूप में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार हरित ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से प्रत्‍येक पांच अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य की पांच निधियां प्राप्‍त करने की योजना बना रही है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की ओर से बिजली वित्‍त निगम लिमिटेड (पीएफसी), ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड (आरईसी), भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (आईआरईडीए), आईएफसीआई लिमिटेड, एसबीआई कैपिटल मार्केट्स लिमिटेड और आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड जैसी राज्‍य सरकारों के स्‍वामित्‍व वाली और निजी क्षेत्र की वित्‍तीय संस्‍थाओं से मदद लेने की योजना बनाई जा रही है, ताकि 25 अरब अमरीकी डॉलर मूल्‍य की निधि तैयार की जा सके। अमरीका और चीन की ओर से जलवायु परिवर्तन समझौते पर हस्‍ताक्षर किये जाने के संदर्भ में हमारी सरकार द्वारा हरित ऊर्जा पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस समझौते के अनुसार अमरीका वर्ष 2025 तक अपने 2005 के उत्‍सर्जन स्‍तर की तुलना में 26-28 प्रतिशत कमी लाएगा और चीन लगभग 2030 के आस-पास कार्बन डाई- ऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन के नुकसानदायक स्‍तर पर पहुंचेगा।

देश के भीतर सेवाप्रदाताओं को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए सरकार ने नये उपायों की घोषणा की है। इसके तहत एनटीपीसी, कोल इंडिया, एनर्जी एफिसिएंशी सर्विसेज, पॉवर ग्रिड कारपोरेशन द्वारा हाल में बिजली क्षेत्र में दाखिल 100,000 करोड़ रूपये मूल्‍य के ऑर्डरों से प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए स्‍थानीय निर्माताओं को सशक्‍त बनाने पर जोर दिया जाएगा। साथ ही, स्‍थानीय निर्माताओं ने घरेलू सौर और पवन ऊर्जा उत्‍पादन के लिए बड़ी संख्‍या में ऑर्डर दाखिल किये, ताकि उत्‍पादन क्षमता बढ़ाकर और विश्‍व स्‍तरीय प्रौद्योगिकी प्राप्‍त करके उन्‍हें किफायती बनाया जा सके। सरकारी संगठन 1000 मेगावॉट क्षमता वाली ऐसी सौर परियोजनाएं खरीदेंगे, जिसमें केवल घरेलू उत्‍पादन वाले सेलों और मॉडयूलों के इस्‍तेमाल के लिए विशेष प्रावधान होंगे। रक्षा प्रतिष्‍ठान 300 मेगावॉट क्षमता वाले सौर ऊर्जा संयंत्र खरीदेंगे। सरकार ने ऊर्जा संरक्षण के जरिए 10 प्रतिशत ऊर्जा बचाने के लिए भी योजना बनाई है। 10,000 करोड़ यूनिट बिजली की बचत की जाएगी, जिससे 11 करोड़ लोगों के जीवन में रोशनी आएगी तथा 40,000 करोड़ रूपये की बचत होगी।

सरकार की ओर से अक्षय ऊर्जा पर जोर देने की रणनीति का कारण यह भी है कि भारत ऊर्जा आयात के लिए लगभग 150 अरब अमरीकी डॉलर का व्‍यय करता है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 300 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच सकता है। अप्रैल 2014 तक कुल स्‍थापित ताप बिजली क्षमता 168.4 गीगावॉट के स्‍तर पर थी, जबकि पनबिजली और अक्षय ऊर्जा की कुल स्‍थापित क्षमता क्रमश: 40.5 गीगावॉट और 31.7 गीगावॉट थी। अगले वर्ष तक भारत के पवन ऊर्जा बाजार में लगभग 20,000 करोड़ रूपये (3.16 अरब अमरीकी डॉलर) की धनराशि निवेश होने की संभावना है, क्‍योंकि इन क्षेत्रों से संबंधित कंपनियां पवन ऊर्जा द्वारा 3000 मेगावॉट अतिरिक्‍त क्षमता तैयार करने की योजना बना रही हैं।

अगले 5 से 10 वर्षों में लगभग 293 वैश्विक और घरेलू कंपनियों ने भारत में सौर, पवन, लघु पनबिजली और बायोमासा आधारित 266 गीगावॉट बिजली पैदा करने के लिए प्रतिबद्धता दर्शायी है। इस पहल से लगभग 310-350 अरब अमरीकी डॉलर का निवेश जुटाया जा सकता है। अप्रैल 2000 से लेकर फरवरी 2015 की अवधि के दौरान उद्योगजगत ने 9,548.82 मिलियन अमरीकी डॉलर मूल्‍य का प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश जुटाया है।

हाइड्रोकार्बन संसाधनों से भारत के प्राकृतिक गैस उत्‍पादन में अगले तीन वर्षों में 52 प्रतिशत वृद्धि होने की संभावना है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार इस अवधि के दौरान बिजली और उर्वरक कंपनियों से मांग में तेजी आने की संभावना है। भारत के प्राकृतिक गैस उत्‍पादन में वर्ष 2017-18 तक लगभग 230 मिलियन मिट्रिक स्‍टैंडर्ड क्‍यूबिक मीटर प्रतिदिन (एमएमएससीएमडी) वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2014-15 के अंत में इसका मौजूदा स्‍तर 138.33 एमएमएससीएमडी है, जो 52 प्रतिशत वृद्धि दर्शाता है। प्राकृतिक गैस का उपभोग करने वाले प्रमुख क्षेत्रों- बिजली और उर्वरक, से मांग की तुलना में यह 27 प्रतिशत अधिक है। ऊर्जा क्षेत्र के लिए यह एक स्‍वागतयोग्‍य बदलाव है, क्‍योंकि पिछले समय में भारत प्राकृतिक गैस के 3.365 अरब घनमीटर (बीसीएम) के उत्‍पादन के साथ वर्ष 2013-14 में उत्‍पादित 3.54 बीसीएम से 5 प्रतिशत नीचे रहा और 3.66 बीसीएम के उत्‍पादन लक्ष्‍य से 8.1 प्रतिशत नीचे रहा। पिछले 10 वर्षों में, भारत का घरेलू उत्‍पादन जबकि 10 प्रतिशत बढ़ा है, मांग में काफी वृद्धि होने के कारण भारत के आर-एलएनजी के आयात में 335 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जो पीपीएसी के अनुसार लगभग 46 प्रतिशत वृद्धि दर्शाता है।

हालांकि इन बदलावों के परिणाम हमें तत्‍काल नहीं मिलेंगे, क्‍योंकि इन परियोजनाओं के सुचारू होने से पहले इसके मनोवांछित परिणाम प्राप्‍त नहीं हो सकते हैं। निवेश के वातावरण में सुधार होने, महंगाई में कमी आने, स्‍थायी सरकार के रूप में विकास दर बढ़ने के साथ-साथ इन पहलों के परिणाम आने वाले महीनों और वर्षों में हमें धरातल पर दिखाई देंगे।

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