मोदी का हरित प्रौद्योगिकी, सौर ऊर्जा और बायो-डीजल के उपयोग पर जोर

मोदी का हरित प्रौद्योगिकी, सौर ऊर्जा और बायो-डीजल के उपयोग पर जोर

विशेष सेवा और सुविधाएँ

 

  • मोदी का हरित प्रौद्योगिकी, सौर ऊर्जा और बायो-डीजल के उपयोग पर जोर
  • विश्व आज हानिकारक और प्रदूषित ग्रीन हाउस गैसों को रहा है डकार
  • शहरों में वायु प्रदूषण उच्चस्तर पर
  • भारत सरकार ने कच्चे तेल के बढ़ते हुए मूल्य को देखते हुए 2022 तक 100 गिगावाट्स (जीडब्ल्यू) सौर ऊर्जा का महत्वाकांक्षी लेकिन प्राप्त किये जाने वाला लक्ष्य किया है निर्धारित
  • सरकार ने वायु प्रदूषण कम से कम करने के लिए सार्वजनिक वाहनों और बड़े शहरों में स्कूल बसों के लिए बायोडीजल, बायोइथनोल और बिजली जैसे स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल शुरू करने की योजनाएं की हैं शुरू
  • सार्वजनिक और निजी ऑटोमोबाइल निर्माताओं ने न्यूनतम इंजन रूपांतरणों और परिवहन समस्याओं को दूर करने के लिए कुशल भंडारण के माध्यम से इन गैर-परंपरागत ईंधनों को व्यवहार्य बनाने के लिए बनाई हैं योजनाएं

 

विशेष लेख

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अभी हाल की चीन यात्रा के दौरान कम चर्चित तथ्‍य गैर जीवाश्‍म- ईंधन स्रोतों में सघन सहयोग का है, जिसे भारत ने चीन से मांगा था और उसे पाने में सफलता प्राप्‍त की। शैक्षिक विद्वानों ने यह दावा किया है कि 2014 लगातार ऐसा दूसरा वर्ष था जिसमें चीन ने जीवाश्म ईंधन के मुकाबले गैर-जीवाश्म-ईंधन स्रोतों से अधिक सृजन क्षमता अर्जित की है। चीन ने जीवाश्म ईंधनों से बिजली उत्पादन की अपनी क्षमता 45 गिगावाट्स बढ़ाकर कुल 916 गिगावाट्स कर ली है। इसी दौरान उसने गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से बिजली उत्पादन की क्षमता 56 गिगावाट्स बढ़ाकर कुल 444 गिगावाट्स कर ली है। जिसमें जल, वायु और सौर बिजली संयंत्रों द्वारा उत्पादित 51 गिगावाट्स क्षमता शामिल है।

हाओ तान, न्यू कैस्टल बिजनेस स्कूल, न्यू कैस्टल विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया और जॉन ए. मैथ्यू, मैकक्यूरी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, सिडनी के विद्वानों के अनुसार वायु, जल और सौर विद्युत का चीन की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में 31 प्रतिशत योगदान है, जो 2007 में 21 प्रतिशत था। जबकि परमाणु बिजली का दो प्रतिशत योगदान है। आश्चर्यजनक बात यह है कि ये लक्ष्य चीन द्वारा बारहवीं पंचवर्षीय योजना में निर्धारित लक्ष्यों से अधिक हैं। योजना में गैर-ईंधन स्रोतों पर आधारित विद्युत उत्पादन क्षमता का निर्धारण लक्ष्य 2015 तक लगभग 30 प्रतिशत रखा गया था।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि चीन ग्रीन हाउस गैस (जीएससी) के उत्सर्जन का दोषी रहा है, जिससे वर्षों के दौरान बीजिंग जैसे शहरों में वायु प्रदूषण भयावह स्थिति तक पहुंच गया था। सरकारी विचारधारा में धीरे-धीरे लेकिन मजबूत परिवर्तन हुआ और सात प्रतिशत वृद्धि प्रतिवर्ष की नई सामान्य गति पर विकास अभियान के बीच में ही सुधार किया गया। भारत के लिए, जो अविश्वसनीय उपलब्धियों के रूप में चीन की तरह की स्थिति में नहीं है और मानव उपभोग या स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति लापरवाह नहीं है, उसे सर्वश्रेठ हासिल करने के लिए अपने विकास की गति बढ़ाने से पहले ये सबक आत्मसात करने की जरूरत है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकास के लिए भारत की उच्च वृद्धि मार्ग के रूप में विनिर्माण मंत्र का अनावरण करते समय पर्यावरण पर ‘शून्य दोष’ और ‘शून्य प्रभाव’ के साथ उच्च गति प्राप्त करने पर जोर दिया था। यह वैश्विक चिंता का विषय है कि विश्व आज हानिकारक और प्रदूषित ग्रीन हाउस गैसों को डकार रहा है। अगर धुएं से निपटने के लिए कोई कठोर आधुनिक कार्रवाई नहीं की जाती है तो इससे मानवता के अस्तित्व को निरंतर खतरा बढ़ता रहेगा।

वास्तव में, मोदी ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिये गये अपने संबोधन में अनेक उन्नत देशों द्वारा व्यक्त की गई चिंता पर सहमति व्यक्त की थी कि सभी देशों को इस साझा कार्य में जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने यह आह्वान किया था कि विश्व सामूहिक कार्यवाही के सुन्दर संतुलन-साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियां (सीबीडीआर) पर सहमत है।

मोदी ने विधिवत कहा कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन समझौते के लिए चल रही वार्ता में भारत के रूख को इस साल के अंत में पैरिस में साफ किया जाएगा, जिसमें समानता और आम सिद्धांत का मार्गदर्शन होगा लेकिन जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगे। भारत यह जोर देता रहा है कि 2015 के जलवायु परिवर्तन समझौते में अनुकूलन, वित्त, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण, क्षमता, निर्माण, कार्रवाई की पारदर्शिता संतुलित तरीके से समर्थन और जलवायु परिवर्तन में कमी लाने के साथ-साथ इसमें क्षति से संबंधित समस्त पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।

भारत हरित प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने के अपने उद्देश्य से न तो विचलित हुआ है और न ही पीछे हटा है। ऐसा करना बहुत आवश्यक हो गया है क्योंकि शहरों में वायु प्रदूषण उच्चस्तर पर पहुंच गया है और इसके कारण अधिकांश जनसंख्या के सामने स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां पैदा हो गई हैं। नवीनतम वैज्ञानिक निष्कर्षों से पता चला है कि 2900 गिगाटन वैश्विक कार्बन बजट (कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन) का अब से 2100 तक उपयोग करने के लिए केवल 1000 गिगाटन बचा है, ताकि वैश्विक तापक्रम को दो डिग्री सैल्सियस तक कम किया जा सके। अधिकांश संचयी कार्बन बजट का विकसित देशों ने विगत में समृद्धि के लिए उपयोग कर लिया है और अब वे उच्च रहन सहन मानकों और अपेक्षाकृत बेहतर गुणवत्ता के वायुमण्डल वातावरण में रहने का शौक रखते हैं। इसलिए इस तथ्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि विश्व संसाधन संस्थानों के अनुमान के अनुसार अगर उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से जारी रहता है तो यह बजट केवल 30 और सालों में समाप्त हो जाएगा।

उत्सर्जन में कमी लाने की प्रतिबद्धता तैयार करने के लिए मुख्य बिन्दु यह है कि शेष कार्बन बजट को उचित भार बंटवारे की प्रणाली के साथ कैसे विभाजित किया जाए। ताकि उन्नति के निचले पायदान पर खड़े देशों की अच्छी विकास योजनाएं पटरी से न उतरें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ऐसे उचित बंटवारे की निकाय के आह्वान को इस जमीनी स्तर के उचित आधार वाले परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। संचित वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड (1850 से 2011) में भारत का अंशदान केवल तीन प्रतिशत था जबकि अमेरिका का 21 प्रतिशत और यूरोपीय संघ का 18 प्रतिशत था।

यह ध्यान दिये जाने की बात है कि भारत सरकार ने कच्चे तेल के बढ़ते हुए मूल्य को देखते हुए 2022 तक 100 गिगावाट्स (जीडब्ल्यू) सौर ऊर्जा का महत्वाकांक्षी लेकिन प्राप्त किये जाने वाला लक्ष्य निर्धारित किया है। जबकि वर्तमान स्थिति 2.5 गिगावाट एवं 50 गिगावाट वायु (वर्तमान 26 गिगावाट) की है। उचित उकसाहट और उत्साह से नवीकरणीय ऊर्जा प्रतिस्पर्धा पैदा हुई है। सरकार ने देश में कृषि, जल और वानिकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अनुकूलन कार्रवाइयों के लिए पिछले वर्ष 100 करोड़ रुपये की प्रारंभिक निधि से राष्ट्रीय अनुकूलन निधि स्थापित की है। उल्लेखनीय है कि भारत ने 2008 में जलवायु परिवर्तन पर अपनी राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की थी और वह नये वैज्ञानिक साक्ष्य और प्रौद्योगिकी विकास के प्रकाश में राष्ट्रीय मिशनों की समीक्षा करने की प्रक्रिया में है।

भारत की कुल नवीकरणीय विद्युत 31 दिसंबर, 2014 के अनुसार 33.8 गिगावाट पर पहुंच गई है। वायु ऊर्जा के हिस्से में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और स्थापित क्षमता में इसका 66 प्रतिशत योगदान है। इसके बाद बायोमास लघु हाईड्रो विद्युत और सौर विद्युत का नम्बर आता है। अगले पांच वर्षों में भारत के राष्ट्रीय सौर मिशन के तहत प्रस्ताव से नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 160 बिलियन अमरीकी डॉलर के व्यापार अवसर पैदा होने की संभावना है। नवीकरण ऊर्जा के बारे में देश की प्रमुख तात्कालिक योजनाओं से संचयी स्थापित क्षमता 170 गिगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। नवीकरणीय ऊर्जा के लिए राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है।

भारत ने 2010 में कोयले पर स्वच्छ ऊर्जा उपकर लागू किया है। ऐसा विश्व के बहुत कम देशों में किया गया है। पिछले वर्ष इसे दो गुना करके 100 रुपये प्रति टन कर दिया गया। लेकिन पिछले केन्द्रीय बजट में इसे बढ़ाकर 200 रुपए प्रति टन किया गया है। राष्ट्रीय स्वच्छ निधि के अधीन कुल वसूली 17,000 करोड़ से अधिक हो गई है और इस निधि से 16,511 करोड़ की लागत से 46 स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को सितंबर 2014 के अंत तक मंजूरी दी गई।

सरकार ने वायु प्रदूषण कम से कम करने के लिए सार्वजनिक वाहनों और बड़े शहरों में स्कूल बसों के लिए बायोडीजल, बायोइथनोल और बिजली जैसे स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल शुरू करने की योजनाएं शुरू की हैं। सार्वजनिक और निजी ऑटोमोबाइल निर्माताओं ने न्यूनतम इंजन रूपांतरणों और परिवहन समस्याओं को दूर करने के लिए कुशल भंडारण के माध्यम से इन गैर-परंपरागत ईंधनों को व्यवहार्य बनाने के लिए योजनाएं बनाई हैं। विश्व समुदाय विशेष रूप से धनी देशों में, जिन्होंने उन्नति का प्रमुखता से लाभ उठाया है उन्हें हरित विकास की सीढ़ी पर तेजी से आगे बढ़ते हुए पारस्थितिकी संतुलन स्थापित करने के लिए एक समग्र तरीके से निधियों और सस्ती प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के द्वारा को बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था और विकासशील देशों की लागत में योगदान देने के लिए आगे आना चाहिए ताकि वनस्पति, जीव-जन्तुओं और मनुष्यों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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