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जड़ी-बूटियों के उत्पादन से रोजगार को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होगी “वन समृद्धि-जन समृद्धि” योजना

  • जड़ी-बूटी आधारित औषधि निर्माण उद्योगों को पांच लाख रुपए तक अनुदान

मंडी: हिमाचल प्रदेश अपनी नैसर्गिक सुंदरता व समृद्ध वन संपदा के लिए प्रसिद्ध है। यहां के सघन वन क्षेत्र और उनमें प्राकृतिक तौर पर उगने वाली जड़ी-बूटियां व जैव-विविधता धरोहर के रूप में विद्यमान है। इस वन सम्पदा के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दिशा में वर्तमान प्रदेश सरकार द्वारा अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। वन समृद्धि-जन समृद्धि योजना इन्हीं में से एक है, जिसके अंतर्गत सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से वनों के विस्तार व रोजगार के अवसर पैदा करने की दिशा में पहल की गयी है।

प्रदेश में औषधीय पौधों तथा गैर-इमारती लकड़ी के बेहतर उपयोग, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा वन उत्पादों की बिक्री व संग्रहण में शामिल ग्रामीण लोगों की आय में वृद्धि के लिए वन समृद्धि-जन समृद्धि योजना प्रारम्भ की गयी है। इन जंगली जड़ी-बूटियों को बेचने के अतिरिक्त निजी भूमि पर इनके उत्पादन को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर पैदा करना भी इस योजना का उद्देश्य है। योजना के अंतर्गत जड़ी-बूटी संग्रह करने वाले स्थानीय निवासियों का समूह बनाकर दोहन के बाद उनका रखरखाव, मूल्य संवर्द्धन तथा विपणन की उचित व्यवस्था की जा रही है। जड़ी-बूटी आधारित औषधि निर्माण के उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए अनुदान तथा व्यक्तिगत निजी उद्यमी को जड़ी-बूटी व्यापार संबंधी प्रोत्साहन राशि देने का भी इसमें प्रावधान है। एक अनुमान के अनुसार प्रदेश में लगभग 3500 उच्चतम पौधों की किस्में दर्ज की गयी हैं जिनमें से 1489 किस्मों को एनटीएफपी की तरह उपयोग किया जा सकता है। इनमें खाद्य वस्तुएं, चारा, ईंधन की लकड़ी, कृषि कार्यों में उपयोग में लाई जाने वाली छोटी लकड़ी, औषधीय पौधे, छत्त बनाने की सामग्री, टोकरी बनाने की सामग्री, रस्सी बनाने का रेशा इत्यादि ग्रामीण लोगों की आजीविका के मुख्य साधन हैं। कुछ महत्वपूर्ण किस्मों में अनारदाना, चिलगोजा, बुरांश फूल, काफल, टोकरी के लिए बांस, चूली, हरड़, बेहड़ा, आमला आदि शामिल हैं। योजना के अंतर्गत प्रदेश में गैर-इमारती लकड़ी वन उत्पाद संसाधन व आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ करने पर बल दिया जाएगा। इसके साथ-साथ स्थानीय समुदायों, सामुदायिक उपयोगकर्ता समूहों को सुव्यवस्थित बनाया जाएगा। लकड़ी कटाई के उपरांत इन समुदायो की प्रबंधन क्षमता का विकास किया जाएगा औऱ व्यापारियों को बेचने से पूर्व इन वन उत्पादों व औषधीय पौधों की मूल्य वृद्धि के लिए समुचित प्रबंध किए जाएंगे। वन समृद्धि-जन समृद्धि योजना के अंतर्गत मशीनरी तथा उपकरणों के लिए उपदान का भी प्रावधान किया गया है। सामुदायिक उपयोगकर्ता समूहों को व्यक्तिगत या संगठित (सामूहिक) तौर पर प्रकरण इकाईयों की स्थापना के लिए मशीनरी व उपकरणों की लागत का 25 प्रतिशत उपदान अधिकतम पांच लाख रुपए प्रति इकाई प्रदान किए जाएंगे। औषधीय पौधों की बिक्री से होने वाली आय का 90 प्रतिशत हितधारकों में वितरित किया जाएगा, जिनमें समानांतर सांझे आधार पर सामुदायिक उपयोगकर्ता समूहों को दिया जाएगा। शेष 10 प्रतिशत संबंधित जैव-विविधता प्रबंधन समिति द्वारा विभिन्न गतिविधियों जैसे बैठकों, प्रयोगशालाओं इत्यादि पर व्यय करने के लिए रखा जाएगा।

वर्तमान में यह योजना प्रदेश के छह जिलों के दस वन मंडलों में लागू की जा रही है। इसके लिए प्रदेश सरकार द्वारा इस वित्तीय वर्ष के लिए एक करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। प्रदेश सरकार की यह अभिनव पहल न केवल औषधीय जड़ी-बूटियों के संरक्षण व उत्पादन में कारगर साबित होगी, बल्कि प्रदेश की जैव विविधता व वन्य संपदा में विविधता लाने व वनों के नजदीक रहने वाले लोगों के लिए रोजगार का बेहतर विकल्प उपलब्ध करवाने में भी सफल रहेगी।

 

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