“घर" तो वही है जिसमें बचपन में हम सब रहा करते थे, पर अब इस "मकान" में लोग कोई और रहते हैं...

“घर” तो वही है जिसमें बचपन में हम सब रहा करते थे, पर अब इस “मकान” में लोग कोई और रहते हैं…

...चलो किसी दिन बचपन से भी मिल आएं

…चलो किसी दिन बचपन से भी मिल आएं

बचपन” कभी भी नहीं भूलता। चाहे सुख में कटा हो या दुःख में। भाई-बहन का प्यार, आस-पड़ोस, स्कूल, दोस्त और बड़े-बुजुर्ग सब याद रहते हैं। बचपन में मिट्टी-पत्थरों के छोटे-छोटे घर बनाना, छुपन-छुपाई खेलना, लड़ना-झगड़ना, फिर रूठना-मनाना और भी बहुत कुछ। धीरे-धीरे हमारे बड़े होते-होते सब हमसे खो जाता है। परिस्थितियां बदल जाती हैं। जिम्मेदारियों का एहसास होने पर सब अपने-अपने रास्ते चल देते हैं। घर बदल जाते हैं, रिश्ते बदल जाते हैं दोस्त बदल जाते हैं और हम बदल जाते हैं। बदलने के साथ-साथ कुछ रिश्ते और दोस्त हमसे हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं। खबर मिलती है तो दिल दुखता है रोने चिल्लाने का मन होता है। बचपन फिर याद आता है, लेकिन परिस्थितियां आपको ये सब करने की इजाजत नहीं देती। आप बचपन में लौट आना तो चाहते हैं, परन्तु वापस आने पर सब वैसा नहीं मिलता। माता-पिता बुजुर्ग हो चुके हैं जिनकी एक डांट के डर से हम सब भाई-बहन और दोस्त एक दूसरे को बचाने के लिए जमीन आसमान एक कर देते थे।

  • अब गांव पक्के मकानों में बदल गए… शहर बड़े और ऊँचे फ्लैटों में तब्दील हो गए

अब उनकी आवाज़ में डांट नहीं, हमसे कुछ देर फुर्सत के साथ बैठकर बातें करने की खामोश दरकार रहती है जो कभी उनके होंठो तक नहीं आती। बच्चों की भाग दौड़ भरी जिंदगी उन्हें चुप्पी साधने को मजबूर कर देती है। जो तनकर चला करते थे अब उनके कंधे झुक से गए हैं। लोग वो नहीं जिन्हें हम जानते थे। गांव में सब अब वो बड़े बुजुर्ग भी नहीं रहे, जिनकी बातों से कच्चे मिट्टी के घर, खेत खलियान, चौपाल गूंजा करती थी। बच्चे मिट्टी में कंचे, गिल्ली डंडा, पीठु और खेला करते थे। शहरों के बच्चे बैट-बल्ला लिए हर चौराहे पर होते थे।

  • “कभी मौका मिले तो बचपन की गलियों में घूम आना
  • …चलो किसी दिन बचपन से भी मिल आएं

शहर में पहले लोग एक दूसरे को जानते थे एक दूजे के सुख दुःख में साथ खड़े रहते थे। पर अब गांव पक्के मकानों में बदल गए और शहर बड़े और ऊँचे फ्लैटों में तब्दील हो गए। बचपन का शहर गांव सब बदल गया। हम बदल गए। लेकिन बचपन याद फिर भी आता है। सब याद आते हैं। लेकिन विडंबना तो देखिए अपनी बात कहने से हम फिर भी कतराते हैं क्योंकि जिम्मेदारियां आपको रोकती हैं।

, अरसा हो गया उन गलियों को छोड़े, चलो दूर से सही अपने घर की दीवारों को निहार आएं।

, अरसा हो गया उन गलियों को छोड़े, चलो दूर से सही अपने घर की दीवारों को निहार आएं।

आपकी पहचान रूतबा आपका फर्ज आपको अपने बचपन करने से रोकता है। क्योंकि “वक्त” किसके पास है इतना, कि उन पुराने दोस्तों और रिश्तों को फिर से ढूढ़कर, उस बस्ती में जाकर फिर से बचपन में खो जाएं। जो बचपन के अपने कुछ लोग दुनिया से हमें छोड़कर चले गए उन्हें याद करके एक दूजे के गले मिलकर एक-दूजे का दर्द बांट लें। क्योंकि “बचपन” कभी भी नहीं भूलता। बचपन का आस पड़ोस और दोस्त नहीं भूलते। “कभी मौका मिले तो बचपन की गलियों में घूम आना, लोग भले ही बचपन के न मिले, लेकिन अपनेपन का एहसास उस घर की हर दीवार, हर गली, पेड़ और मिट्टी तुम्हें बचपन सा प्यार का एहसास जरूर देगी।

“बहुत हो गई दुनियादारी, चलो किसी दिन बचपन से भी मिल आएं, अरसा हो गया उन गलियों को छोड़े, चलो दूर से सही अपने घर की दीवारों को निहार आएं।

सुना है बड़े-बड़े बंगले बन गए जहाँ हम सब दोस्त घर-घर खेला करते थे, क्यों न उन बंगलों को अपने बचपन के बनाए छोटे पत्थरों के घर से नाप आएं।

ढूंढ तो लूंगा हर एक दोस्त को बचपन के अपने, पर जो दुनिया में नहीं रहा उससे कहां मिला जाए।

फुरसत मैं ले भी लूं कल काम से, लेकिन क्या पता मेरे बचपन के सब दोस्त वायदा करके भी मिलने न आएं।”

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