मैं जिदंगी का साथ निभाता चला गया".......

“मैं जिदंगी का साथ निभाता चला गया”…….

 यादें

 

(दिवंगत अभिनेता देव आनंद​)

“आना जाना हमेशा अपने हाथ में थोड़े ही रहता है दोस्त। इंसान सोचता है मैं उधर चलूं, किस्मत कान पकड़कर उधर ले जाती है। सोचता है इधर चलूं, नाक पकड़कर उधर खींच ले जाती है।”

सिर हिलाना, एक तरफ झुककर डांस करना, गले में स्कार्फ औऱ सिर पर टोपी, ये सारे अंदाज किसी फिल्म के स्क्रिप्ट की मांग नहीं थे, बल्कि ये बॉलीवुड के एवरग्रीन रोमांटिक सुपरस्टार देव आनंद का खुद का स्टाइल था। जिसे देखकर हर कोई देव आनंद

देव आनंद

देव आनंद

साब का फैन हो गया। जिसका नाम आते ही ज़हन में ज़िन्दादिली, रोमांस, स्टाइल और जोश से भरे एक शख्स की तस्वीर उभर जाती है। जो अपने बेहतरीन अंदाज और खूबसूरती की वजह से दुनियाभर में अपने लाखों फैंस के दिल पर आज भी राज करता है, उसी का नाम देव आनंद है।

ये सिर्फ एक कलाकार के डॉयलॉग नहीं है, उसकी सच्चाई है, उसकी जिंदगी है, उसकी रूमानियत है। जी हां, लाहौर से ट्रेन पकड़कर एक शख्स मुंबई आता है। अपना सब कुछ दांव पर लगाता है. मां-बाप, भाई-बहन और यहां तक कि अपनी पहली मोहब्बत भी। जेब में तीस रूपए लेकर फ्रंटियर मेल में सवार बीस साल का नौजवान छोरा अपनी किस्मत का सिक्का आजमाने सीधे मायानगरी के लिए निकल पड़ता है। ट्रेन की रफ्तार बढ़ती जाती है, पर उस गोरे-पतले छरहरे बदन वाले शख्स का सबकुछ पीछे छूटता जाता है। उसे खुद भी नहीं पता था कि जिसे वो पीछे छोड़ रहा है, वो तो कुछ नहीं, बल्कि आने वाले दिन में उसकी किस्मत पूरे संसार को उसका दीवाना बना देगी।

अपने करियर में 110 से भी ज्यादा फिल्में करने वाले देव साहब ने कामयाबी की ऐसी ऊंचाइयों को छुआ कि, वो शब्द जिसे स्टारडम कहते हैं, उसके भी मायने बदल गए। देव आनंद, जिसकी जिंदगी पल-पल बहती एक कलकल नदी के समान थी, उसमें मोड़ तो खूब आए, लेकिन कभी विराम नहीं आया। छह दशकों में न जाने कितनी पीढ़ियां, विचार और नायक बदल गए, मगर कुछ नहीं बदला तो वो था देव साहब का अंदाज़, इसीलिए उन्हें सदाबहार अभिनेता का खिताब मिला।

नौकरी के साथ ही देव साहब अपने बढ़े भाई चेतन आनंद के साथ इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन से जुड़ गए, जिसके तुरंत बाद देव साहब को ‘हम एक हैं’ फिल्म का ऑफर मिल गया और इसी के साथ 1946 में देव साहब ने बॉलीवुड में अपना पहला कदम रखा। फिल्म ‘हम एक हैं’ में देव साहब के साथ मुख्य भूमिका में थीं सुरैया जो उस समय की नंबर वन हीरोइन और गायिका थीं, और जब तक 1947 में देव साहब की दूसरी फिल्म ‘ज़िद्दी’ रिलीज़ हुई वो एक सुपर स्टार बन चुके थे. इन फिल्मों की सफलता के बाद देव साहब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

देव साहब खुद को काफी खुशनसीब मानते थे कि करियर के शुरूआत में ही उन्हें एक बड़ी अदाकारा के साथ काम करने का मौका मिला। ‘हम एक हैं’ मिला कर इस जोड़ी ने करीब सात फिल्मों में साथ काम किया। इन्हीं में से एक फिल्म ‘विद्या’ के एक गाने ‘किनारे-किनारे चले जाएंगे..’ की शूटिंग के दौरान हुए हादसे में देव साहब ने सुरैया की जान बचाई, जिसके बाद सुरैया को देव आनंद से प्यार हो गया। देव आनंद ने समाज की परवाह छोड़कर ज़माने के आगे अपने प्यार का इज़हार कर तो दिया, लेकिन मज़हब की दीवारों ने दो प्रेम करने वालों को जुदा कर दिया, जिसके बाद सुरैया ने किसी से भी शादी न करने का फैसला किया. इसके अलावा दोनों ने साथ में फिल्में करना भी छोड़ दिया।

हालांकि ये ब्रेकअप एक तरह से देव साहब के लिए फायदेमंद ही साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद फिल्मों में उन्हें पहचान मिलने लगी, वर्ना फिल्म की सफलता का अधिकतर श्रेय सुरैया को ही मिलता था, आखिरकार वो सुपरस्टार जो थीं। ब्रेकअप का दुख कम और फिल्मों में मिलती पहचान ने देव साहब की ज़िंदगी को थमने नहीं दिया और वर्सटाइल देव आनंद ने एक के बाद एक अनेक हिट फिल्में दी।

सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे देव साहब ने 1949 में निर्माता बनने का निर्णय लिया और इसी के साथ बैनर ‘नवकेतन’ की शुरूआत हुई। 2011 तक ‘नवकेतन’ के तले करीब 35 फिल्में बन चुकी है।

1951 में ‘नवकेतन’ बैनर के तले आई फिल्म ‘बाज़ी’ का निर्देशन किया देव आनंद के दोस्त गुरूदत्त ने। इस फिल्म में देव साहब के साथ नज़र आईं कल्पना कार्तिक, जिनकी ये पहली फिल्म थी। फिल्म ‘बाज़ी’ की अपार सफलता के बाद देव साहब और कल्पना को एक साथ कई और फिल्मों का ऑफर मिलने लगा और सुपर हिट ऑन स्क्रीन जोड़ी को आखिरकार हक़ीकत में फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ की शुटिंग के दौरान प्यार हो गया। और 1954 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।

1950 और 1960 का दशक देव साहब के लिए सिर्फ और सिर्फ कामयाबी लेकर आया

1950 और 1960 का दशक देव साहब के लिए सिर्फ और सिर्फ आया कामयाबी लेकर

1950 और 1960 का दशक देव साहब के लिए सिर्फ और सिर्फ कामयाबी लेकर आया। इस दौर में आईं उनकी सभी फिल्में सफल रही और अपनी अलग पहचान के चलते हर किसी के लिए स्टाइल आइकन बन गए। खासकर फिल्म हीरा पन्नाऔर हरे राम हरे कृष्णमें देव साहब ने अपने लुक्स के साथ जितने भी प्रयोग किए वो काफी हद तक सफल रहे और इसी के साथ स्कार्फ का फैशन आया। देव साहब के स्कार्फ पहने के तरीके ने तो उस दौर में तहलका मचा दिया था। अगर आप शाहरुख की फिल्म मोहब्बतेऔर देव साहब की फिल्म हीरा पन्नादेखें तो आपको पता चलेगा कि कंधे पर स्वेटर डालने का ट्रेंड शाहरुख ने नहीं बल्कि करीब 40 साल पहले देव साहब ने ही शुरू किया था। ये सारे ट्रेंड शुरू करने वाले देव साहब ने इन सभी को सिर्फ रील ही नहीं बल्कि अपनी रियल लाइफ में भी अपनाया था।

यही वो दौर थी जब देव साहब की एक के बाद एक कई सफल फिल्में आईं। ‘बाज़ी’ (1951), ‘हमसफर’ (1953), ‘टैक्सी ड्राइवर’ (1954), ‘मुनीमजी’ (1955), ‘सीआईडी’ (1956), ‘पेयिंग गेस्ट’ (1956), ‘नौ दे ग्यारह’ (1957), ‘काला पानी’ (1958), ‘काला बाज़ार’ (1960), ‘जाली नौट’ (1960), ‘बम्बई का बाबू'(1960), हम दोनों (1961), गाइड (1965), ज्वेल थीफ़ (1967), जैसी कई और फिल्मों को दर्शकों ने खूब सराहा।

इतना ही नहीं उनके लुक्स, स्टाइल और ऑन स्क्रीन रोमांटिक छवी के कारण देव साबह पर लड़कियां फिदा थीं. ‘अभी न जाओ छोड़कर..’, ‘खोया खोया चांद..’, ‘आंखों ही आंखों में इशारा हो गया..’, ‘है अपना दिल तो आवारा..’, ‘दिल पुकारे आरे-आरे-आरे..’ और न जाने ऐसे ही कितने गाने जिन्हें देख कर देव साहब की लड़कियां दीवानी हो गई थीं, वो भी पागलपन की हद तक। खासकर जब लड़कियों ने देव साहब को काले सूट में देखा तो अपने प्यार का इज़हार करने के लिए खून से ही खत लिखने शुरू कर दिए, जिसके बाद किसी भी पब्लिक फंक्शन में देव साहब के काले रंग का सूट पहनने पर ही बैन लगा दिया गया।

सभी के दिलों पर राज करने वाले एक्टर देव आनंद 1970 में आई फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ के साथ निर्माता और निर्देशक भी बन गए। इस फिल्म की अपार सफलता से देव आनंद को प्रोत्साहन मिला और उनकी अगली फिल्म आई ‘हरे राम हरे कृष्ण’, जिसमें उन्होंने नए चहरे को लॉन्च किया और ये थीं जीनत अमान। एक तरफ ‘हरे राम हरे कृष्ण’ की अपार सफलता और इसकी चकाचौंध में मदहोश देव आनंद को अपनी इस खोज, यानि ज़ीनत अमान, से प्यार हो गया. अपनी इन्हीं जज़बातों को देव साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में बताते हुए लिखा, “मुझे खुशी होती है जब अखबारों और पत्रिकाओं में फिल्म की सफलता के साथ-साथ हम दोनों का नाम रोमांटिकली जोड़ा जाता है।”

तकरीबन सभी जानते थे कि देव साहब को जीनत अमान से प्यार हो गया था, मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था. देल साहब ने ज़ीनत से अपने प्यार का इज़हार करने के लिए मिलने का फैसला किया, लेकिन मुलाकात से पहले नशे में धुत राज कपूर की बाहों में ज़ीनत अमान को देख कर देव आनंद को गहरा सदमा पहुंचा। सुरैया और ज़ीनत के अलावा देव साहब के और भी कई अफेयर्स रहे। जहां तक अपने अफेयर्स की बात है, इसके बारे में देव साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘रोमान्सिंग विद लाइफ़’ में लिखा था कि “मैं वास्तविक जीवन में एक स्कर्ट चेज़र नहीं हूं, महिलाएं हमेशा सामने से पहल करती थीं और मैं बस जवाब देता था।”

अपने करीब 65 सार के पूरे करियर में देव साहब ने कुल 114 हिंदी फिल्मों में काम किया जिनमें से 104 में उन्होंने सोलो

 देव साहब

अपने करीब 65 सार के पूरे करियर में देव साहब ने कुल 114 हिंदी फिल्मों में किया काम

लीड रोल प्ले किया. देव साहब ने कुल 19 फिल्में डायरेक्ट की जिनमें 7 सुपर हिट रही और 35 फिल्में प्रोड्यूस की, जिनमें 18 फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। बहुत कम लोग जानते हैं कि देव साहब को कहानी लिखने का भी शौक था, उन्होंने कुल 13 फिल्मों की कहानी लिखी थी। इसके अलावा उन्होंने दो अंग्रेज़ी फिल्मों में भी काम किया।

सितंबर 2007 में अपने जन्मदिन के मौके पर देव आनंद ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘रोमान्सिंग विद लाइफ़’ का विमोचन किया। फरवरी 2011 में देव साहब की ब्लेक अंड वाइट फिल्म ‘हम दोनों’ को रंगीन करके एक बार फिर रिलीज़ किया गया।

बॉलीवुड में लगभग छह दशक से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले देव आनंद को अदाकार बनने के ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। उनका जन्म 26 सिंतबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता पिशोरीमल नामी वकील होने के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता थे और स्वतंत्रता आंदोलन में जेल भी गए थे। वे काफी अध्ययनशील थे और कई भाषाएँ जानते थे। उन्हें हिन्दी/अँग्रेजी/संस्कृत/उर्दू/पंजाबी/ /अरबी/जर्मन/हिब्रू जैसी भाषाएँ आती थीं। किताबें पढ़-पढ़ कर उन्होंने इन भाषाओं को सीखा था। गीता और कुरान पर उनका अच्छा अधिकार था और बाइबिल के बारे में तो वे सदा कहा करते थे कि अगर अँगरेजी भाषा सीखनी हो, तो बाइबिल पढ़ो। देव आनंद अपने माता-पिता की पाँचवीं संतान थे। वे कुल नौ भाई-बहन थे। चार भाई और पाँच बहनें। देव तीसरे पुत्र थे। दो बड़े भाई थे, मनमोहन और चेतन आनंद और छोटा भाई विजय आनंद। देव आनंद को जानने वाले चेतन और विजय आनंद को जानते हैं, जिन्होंने देव आनंद की फिल्म निर्माण संस्था नवकेतन के माध्यम से फिल्मी दुनिया में अपना अलग मुकाम बनाया। मनमोहन और चेतन आनंद का निधन हो चुका है। 1940 में देव आनंद की माता का निधन हो गया था, इसलिए इन भाई-बहनों को आपस में एक-दूसरे की देखभाल की जवाबदारी पूरी करनी पड़ी। देव आनंद ने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर सरकारी कॉलेज में पूरी की। वह इसके आगे भी पढ़ना चाहते थे लेकिन उनके पिता ने साफ शब्दों में कह दिया कि उनके पास उन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं और अगर वह आगे पढ़ना चाहते हैं तो नौकरी कर लें।

फिल्म इंडिया और अशोक कुमार

बचपन के वे दिन कठिनाइयों भरे थे, फिर भी देव आनंद दोस्तों के साथ आवारागर्दी करने और कभी-कभार फिल्में देखने का मौका जुगाड़ लेते थे। उन्हीं दिनों उन्हें बाबूराव पटेल की पत्रिका ‘फिल्म इंडिया’ पढ़ने का चस्का लग गया। वे रद्दी की दुकान से इस पत्रिका के पुराने अंक खरीद लाते और बड़े चाव से पढ़ते। अच्छे-अच्छे अभिनेताओं को उनकी क्षमता से रूबरू कराने का पटेल का अंदाज, यानी लेखन शैली देव आनंद को बहुत भाती थी। पुरानी पत्रिकाओं के ग्राहक देव आनंद के प्रति दुकानदार को भी लगाव हो गया, जो पत्रिकाएँ छाँटकर अलग रख लेता और कभी-कभी मुफ्त में दे देता। इसी दुकान पर एक दिन देव आनंद ने सुना कि अपनी फिल्म ‘बंधन’ (1940) के प्रीमियर के लिए अशोक कुमार गुरदासपुर आने वाले हैं। वे आए, भीड़ ने उमड़कर अपनी खुशी को प्रकट किया। कुछ लोगों ने ऑटोग्राफ भी लिए, लेकिन देव आनंद दूर खड़े देखते रहे, श्रद्धा से अभिभूत।

प्रशंसकों की भीड़ में भी अशोक कुमार को निर्विकार भाव से शांतिपूर्वक सबसे मिलते देख देव को आश्चर्य हुआ। वह उसके जीवन का एक विशेष क्षण था, जब उसके दिमाग में यह विचार आया-अगर आगे की पढ़ाई के लिए विदेश नहीं जा सका तो फिल्म स्टार बन जाऊँगा। उस समय वह लाहौर कॉलेज से अँगरेजी साहित्य में बीए ऑनर्स कर रहा था और अँगरेजी में एम.ए करने की इच्छा भी रखता था।

 

पहुंचे मुंबई

किस्मत से बनी किस्मत

बच्चों की शिक्षा के मामले में पिशोरीमल जागरूक अवश्य थे। उन्होंने चेतन आनंद को लाहौर कॉलेज से एम.ए.कराया और आईसीएस की परीक्षा देने लंदन भेजा था, लेकिन जब देव आनंद के एम. ए. करने का समय आया, तब वे आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे थे, उन्होंने देव आनंद को किसी बैंक में नौकरी करने की सलाह दी। देव आनंद महत्वाकांक्षी थे। वे कुछ बनना चाहते थे। नाम कमाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि वे बंबई जाकर फिल्मों में भाग्य आजमाना चाहेंगे।

देव आनंद ने खुद के बलबूते पर बंबई में स्थापित होने का संकल्प लिया

देव आनंद ने खुद के बलबूते पर बंबई में स्थापित होने का लिया संकल्प

पिता ने स्पष्ट कर दिया कि बंबई का खर्च उठाने की उनकी ताकत नहीं है। देव आनंद ने खुद के बलबूते पर बंबई में स्थापित होने का संकल्प लिया। बड़े भाई चेतन के साथ फ्रंटियर मेल से मुंबई आए। तब उनकी जेब में सिर्फ 30-35 रुपए थे। चेतन ने देव को अपने लेखक मित्र राजा राव के साथ रख दिया। यह जुलाई 1943 की बात है। उस समय देश भर के सिनेमा घरों में बॉम्बे टॉकीज की युगांतकारी फिल्म ‘किस्मत’ चल रही थी, जिसमें अशोक कुमार ने एंटी हीरो की भूमिका निभाई थी। यह एक अपराध कथा थी। और संयोग देखिए कि देव ने अपने आगामी फिल्मी जीवन में अपराध कथाओं की लीक पर चलना ही ज्यादा पसंद किया।

चेतन आनंद देहरादून के एक स्कूल में अँगरेजी साहित्य का अध्यापन करने लगे थे। देव के मुंबई आने का तात्कालिक कारण नौसेना की नौकरी प्राप्त करना भी था, जिसके लिए वे चुन लिए गए और छह महीने नौसेना में काम भी किया, लेकिन उनके पिता की राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण नौकरी पक्की नहीं हुई। बाद में देव ने डाक विभाग में कारकूनी कर ली। तनख्वाह थी 165 रुपए महीना। इतना रुपया उस जमाने में काफी होता था। मुंबई में जमे रह कर फिल्मों में हाथ-पैर मारने के लिए अच्छा सहारा था।

छुट्टियों में चेतन आनंद भी मुंबई आ जाते। उनका झुकाव वामपंथ की तरफ था और साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत में उनकी अच्छी पैठ थी। देव आनंद उनके साथ इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) की गतिविधियों में भाग लेने लगे। यहीं ख्वाजा अहमद अब्बास और बलराज साहनी निर्देशित ‘जुबैदा’ में नायक के छोटे भाई का रोल दिया गया। इस मामूली भूमिका ने उनके लिए फिल्मों के द्वार खोल दिए। इसी नाटक के दौरान प्रभात फिल्म कंपनी (पुणे) संचालक बाबूराव पै की नजर देव आनंद पर पड़ी।

कॉफी के प्याले में तैरते सपने

उन दिनों बांद्रा में ‘टॉक ऑफ द टाउन’ नामक होटल ‘पेरिसियन डैरी’ के नाम से जाना जाता था। जहाँ फिल्मों में काम पाने के इच्छुक स्ट्रगलरों का जमावड़ा हुआ करता था। जहाँ कभी-कभार दिलीप कुमार और राज कपूर जैसे स्थापित कलाकार भी आया करते थे, जिससे होटल के कारिंदे हड़बड़ा जाते थे और कोहराम मच जाता था। उस जगह कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए भविष्य के सपने देखना जुझारू कलाकारों का खास शगल हुआ करता था। ऐसे ही एक दिन उस रेस्तराँ में देव आनंद ने सुना कि निर्माता प्यारेलाल संतोषी (फिल्मकार राकुमार संतोषी के पिता) को अपनी फिल्म ‘हम एक हैं’ के लिए नायक की जरूरत है। अगले ही‍ दिन देव आनंद संतोषी के दफ्तर पहुँचकर उनके आने की प्रतीक्षा में जा बैठे। संतोषी आए, देव आनंद ने अपना मकसद बताया। सभी स्ट्रगलों को दिया जाने वाला स्टॉक उत्तर मिला- कुछ सोचना पड़ेगा।

ऐसा कीजिए आप मुझसे टेलीफोन पर संपर्क कीजिए। जो भी उत्तर होगा, मैं बता दूँगा। देव आनंद ने इस टालू जवाब को गंभीरता से नहीं लिया। एक माह बाद संतोषी के दफ्तर से पत्र आया कि स्क्रीन टेस्ट के लिए पूना पहुँचिए। देव आनंद वहाँ गए और 55 अन्य युवकों के साथ स्क्रीन टेस्ट में चुन लिए गए। वेतन तय हुआ 400 रुपए माहवार।

फिल्मी सफर की शुरुआत

वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म ‘हम एक हैं’ से बतौर अभिनेता देव आनंद ने अपने सिने करियर की शुरूआत की। 1948 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिद्दी’ देव आनंद के फिल्मी कैरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म की कामयाबी के साथ ही उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और नवकेतन बैनर की स्थापना की। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने चेतन आनंद को सौंपी। गुरूदत्त के निर्देशन में बनी फिल्म बाजी की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर अभिनेताओं की लिस्ट में शुमार हो गए।

 

प्रेम और शादी

फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई। देव आनंद ने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं। लेकिन सुरैया की नानी ने इस रिस्ते के लिए हामी न भरी और यह दास्तां यहीं खत्म हो गई। वर्ष 1954 में देव आनंद ने उस जमाने की मशहूर अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से शादी कर ली।

 

सफल निर्माता और निर्देशक

देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आरके नारायण से काफी प्रभावित थे और उनके उपन्यास ‘गाइड’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो उनके सिने कैरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म के लिए देव आनंद को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। बतौर निर्माता देव आनंद ने कई फिल्में बनाईं। इन फिल्मों में हमसफर, टैक्सी ड्राइवर, हाउस न. 44, फंटूश, कालापानी, काला बाजार, हम दोनों, तेरे मेरे सपने, गाइड और ज्वेल थीफ जैसी कई मशहूर फिल्में शामिल हैं।

वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र मे भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बाक्स आफिस पर मुंह के बल गिरी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म हरे रामा हरे कष्णा का भी निर्देशन किया जिसकी कामयाबी के बाद उन्होंने हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला और अव्वल नंबर समेत कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया।

 

देव आनंद

देव आनंद को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से किया गया सम्मानित

जिंदादिली की मिसाल

देव आनंद को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 में एक ओर जहां देव आनंद को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। अपनी फिल्मों से दर्शकों के दिलों में खास पहचान बनाने वाले महान फिल्मकार देव आनंद 03 दिसंबर 2011 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन आखिरी दम तक उनमें हौसले और आगे काम करते रहने के जोश की कोई कमी नहीं थी।

प्रणय दृश्य की परेशानी

इसे देव आनंद का भाग्य ही कहा जाएगा कि प्रभात फिल्म कंपनी ने ‘हम एक हैं’ फिल्म के लिए उदयकुमार नामक जिस नवोदित अभिनेता का चयन किया था, वह उसी फिल्म की एक नई अभिनेत्री के प्रेमजाल में फँस गया। उनका प्रेम तीसरी अवस्था (थर्ड स्टेज) में जा पहुँचा था। और स्टूडियो के कामकाज में अड़चनें आने लगी थीं। प्रभात के कर्ताधर्ताओं ने उन्हें नारियल थमा कर बाहर कर दिया। नए नायक का प्रश्न उठा, तो देव आनंद को चुन लिया। इस फिल्म की नायिका कमला कोटनीस थीं, जो पहले भी कुछ फिल्मों अभिनय कर चुकी थीं। देव आनंद एकदम नए और सिर्फ 22 साल के थे।

आसपास सारा वातावरण मराठी था और पहले ही दिन देव को कमला के साथ प्रणय दृश्य फिल्माने के लिए कहा गया। कमला कोटनीस के सहयोगी रुख के कारण देव आनंद ने जैसे-जैसे यह फिल्म पूरी की। इसके बाद प्रभात की ‘आगे बढ़ो’ फिल्म में देव आनंद को गायिका अभिनेत्री खुर्शीद के साथ नायक बनाया गया। उस बुजुर्ग अभिनेत्री के साथ प्रणय दृश्य करने में देव आनंद को कठिनाई हुई। भारत-पाक विभाजन के कारण देव आनंद की ये दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिटकर आई-गई हो गई।

 

धोबी की दिलचस्प गलती

प्रभात स्टूडियो के शुरुआती दिनों में देव आनंद को अपने धोबी की गलती से एक ऐसे व्यक्ति की मित्रता नसीब हुई, जो आगे चलकर ‘प्यासा’ ‘कागज के फूल’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ जैसी कालजयी फिल्मों का निर्देशक बना। वह थे गुरुदत्त। गुरुदत्त भी अलमोड़ा में उदयशंकर की नृत्य मंडली से प्रशिक्षित होकर फिल्मों में काम ढूँढने आए थे। इन दिनों प्रभात में सहायक निर्देशक का काम देख रहे थे।

धोबी ने इनके कुर्तों की अदलाबदली कर दी थी, देव आनंद ने स्टूडियो में गुरुदत्त को अपना शर्ट पहने देखा तो कहे बगैर नहीं रह पाए कि हममें से जो भी पहले कामयाब रहेगा, वह दूसरे को अपनी फिल्म में ‘ब्रेक’ देगा। 1951 और 52 में देव आनंद ने ‍अपनी फिल्म निर्माण संस्था नवकेतन के बैनर तले बनी फिल्म ‘बाजी’ और ‘जाल’ का निर्देशन गुरुदत्त से कराया। इसी प्रकार 1955 में गुरुदत्त ने अपनी फिल्म ‘सीआईडी’ में देव आनंद को शकीला और वहीदा रहमान के नायक के रूप में लिया था। (सीआईडी गुरुदत्त प्रॉडक्शंस की पहली फिल्म थी)

 

बेकार देव आनंद को काम दो

प्रभात की दूसरी फिल्म ‘आगे बढ़ो’ (1947) का निर्माण पूरा होते न होते प्रभात के संचालक मंडल में मतभेद हो गए। बाबूराव पै ने प्रभात छोड़कर मुंबई के फेमस स्टूडियो से संबंध जोड़ लिए। फेमस ने मोहन नामक फिल्म का निर्माण शुरू किया, जिसकी नायिका के रूप में हेमावती को चुना गया। वह बाद में अभिनेता सप्रू की पत्नी बनी। यह फिल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई। प्रभात का तीन साल का करार भी खत्म हो गया और पोस्ट ऑफिस की नौकरी वे पहले ही छोड़ चुके थे। देव आनंद बेकारी की स्थिति में आ गए थे और गुरदासपुर लौटने का विचार चल ही रहा था कि दादामुनि (अशोक कुमार) के सौजन्य से उन्हें बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जिद्दी’ (1948) में काम मिल गया।

इस फिल्म के लिए उन्हें बीस हजार रुपयों में अनुबंधित किया गया था। देव आनंद के लिए यह अच्छी शुरुआत थी। असल में इस फिल्म के निर्देशक शाहिद लतीफ और पटकथा लेखिका इस्मत चुगताई इस फिल्म में काम करने के लिए अशोक कुमार पर जोर डाल रहे थे। उन दिनों अशोक कुमार बॉम्बे टॉकीज के सर्वेसर्वा थे और बहुत व्यस्त थे। एक दिन झल्लाकर उन्होंने शाहिद और इस्मत (दोनों पति-पत्नी) से झल्लाकर कह दिया कि पीछे क्यों पड़े हो। वो देव आनंद बेकार घूम रहा है, उसे काम दो।

‘जिद्दी’ में देव आनंद की नायिका कामिनी कौशल थीं। इसका संगीत खेमचंद प्रकाश ने दिया था, जिन्होंने बाद में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘महल’ में लता मंगेशकर से ‘आएगा आने वाला’ जैसा शाश्वत गीत गवाया था। जिद्दी में किशोर कुमार ने पहली बार पार्श्वगायन किया, वह भी देव आनंद के लिए। यहीं से किशोर और देव आनंद के बीच अभिन्न मित्रता की शुरुआत हुई। आगे चलकर देव ने अपने अधिकांश गाने किशोर से ही गवाए। 1987 में किशोर कुमार के असामयिक निधन तक यह दोस्ती कायम रही।

अंतिम बार किशोर ने ‘सच्चे का बोलबाला’ (1989) फिल्म के लिए देव आनंद को अपनी आवाज दी थी। ‘जिद्दी’ की सफलता ने देव आनंद को स्टार का दर्जा दिला दिया। उस समय तक दिलीप कुमार और राज कपूर भी स्टार का दर्जा हासिल कर चुके थे। दोनों की आठ-दस फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं। अशोक कुमार के बाद इन नवोदित अभिनेताओं के मासूम चेहरे देखकर सिने दर्शक अभिभूत थे, क्योंकि आजादी के बाद सचमुच नई शुरुआत हो गई थी।

अगले तीन दशकों तक इस त्रिमूर्ति की दोस्ताना प्रतिस्पर्धा को हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने बड़े चाव से देखा और इनकी फिल्मों का स्वाद चखा। तीनों की अभिनय शैलियाँ एक-दूसरे से भिन्न थीं और तीनों के वफादार दर्शकों का समूह भी अलग-अलग रहा। आज तक इन तीनों के नाम एक साथ लिए जाते हैं।

 

काला कोट पहनने पर प्रतिबंध

अभिनय का वो जुदा अंदाज़, गर्दन की वो ऐंठन, काली पैंट-शर्ट का उनका लिबास…ये कहावत बेहद मशहूर थी कि जब

देव आनंद को काला कोट पहनने पर प्रतिबंध

देव आनंद को काला कोट पहनने पर प्रतिबंध

जवानी में देव आनंद काली शर्ट-पैंट पहनकर बाहर निकलते थे तो लड़कियां बेहोश हो जाती थीं। ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’…ये एक गाना ही नहीं था, ऐसा लगता है उनकी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा था।

देव आंनद ने अपने प्यार का इजहार खुलकर किया। देव आंनद ने हमेशा ही कहा था कि उनका पहला प्यार सुरैया थी। देव आंनद ने भले ही पर्दे पर हजारों हसीनाओं से प्यार किया था पर असल जिन्दगी में देव आंनद का पहला प्यार सुरैया थीं। सह कलाकार सुरैया से प्रेम की बात देव आनंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में स्वीकार की है। इसमें उन्होंने सुरैया के बारे में खास तौर पर जिक्र किया है। देव आनंद ने कहा हां ‘मैं सुरैया को चाहता था’। मुझे यह तथ्य स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है। देव आंनद भले ही अपने प्यार सुरैया के साथ शादी नहीं कर सके लेकिन हमेशा अपने दिल में सुरैया के लिए प्यार रखा था। देव आंनद कहते हैं कि पहले प्यार का अहसास ही अलग होता है।

यह बात किसी से छुपी नहीं की झुक-झुक कर संवाद अदायगी का खास अंदाज हो, या फिर फीमेल फैन्स की बात…देव आनंद अपने समकालीन एक्टरों से हमेशा अलग थे। बॉलीवुड में कितने ही हीरो आए और चले गए, लेकिन ऐसे कुछेक ही हैं जिनके किस्सों का जिक्र किए बिना हिंदी फिल्मों का इतिहास अधूरा रह जाएगा। देव आनंद भी ऐसे ही सितारों में से एक थे। अपने दौर में रूमानियत और फैशन आइकन रहे देव आनंद को लेकर यूं तो कई किस्से मशहूर हैं, लेकिन इन सबसे खास उनके काले कोट पहनने से जुड़े किस्से हैं। देव आनंद ने एक दौर में व्हाइट शर्ट और ब्लैक कोट को इतना पॉपुलर कर दिया था कि लोग उन्हें कॉपी करने लगे। फिर एक दौर वह भी आया जब देव आनंद पर सार्वजनिक स्थानों पर काला कोट पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

 

देव आंनद का प्रेम

देव आंनद की प्रेम कहानी का एक दिलचस्प किस्सा है कि एक बार झील में एक गीत की शूटिंग चल रही थी। देव आंनद और सुरैया एक नाव पर बैठे थे। अचानक सुरैया फिसल गईं और पानी में जा गिरीं। देव आंनद तुरंत पानी में कूद गए और सुरैया को डूबने से बचा लिया। देव आनंद के अनुसार पहला प्यार एक खूबसूरत अहसास होता है।

देव आनंद और सुरैया की मोहब्बत किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। दोनों में प्यार तो हुआ लेकिन हिंदू-मुस्लिम की दीवार के कारण दोनों की मोहब्बत को मंजिल नहीं मिल पाई। प्यार को घर वालों की रजा की मुहर नहीं मिली और एक फिल्मी अंदाज में दोनों अलग हो गए। जीत फिल्म के सेट पर देव आनंद ने सुरैया से अपने प्यार का इजहार किया और सुरैया को तीन हजार रुपयों की हीरे की अंगूठी दी।

सुरैया की नानी को ये रिश्ता नामंजूर था। वो एक हिंदू-मुस्लिम शादी के पक्ष में नहीं थीं। कहा जाता है कि उनकी नानी को

देव आनंद और सुरैया की मोहब्बत किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं

देव आनंद और सुरैया की मोहब्बत किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं थी

फिल्म में देव आनंद के साथ दिए जाने वाले रोमांटिक दृश्यों से भी आपत्ति थी। वो दोनों की मोहब्बत का खुलकर विरोध करती थीं। यही नहीं बाद में उन्होंने देव आनंद का सुरैया से फोन पर बात करना भी बंद करवा दिया था। उन्होंने देव आनंद को सुरैया से दूर रहने की हिदायत दी और पुलिस में शिकायत दर्ज करने की धमकी तक दे डाली।

नतीजतन दोनों ने अलग होने का फैसला किया। इसके बाद दोनों ने एक भी फिल्मों में साथ काम नहीं किया और ताउम्र सुरैया ने किसी से शादी नहीं की। बड़े पर्दे पर दोनों की आखिरी फिल्म ‘दो सितारे’ थी। कहा जाता है कि दोनों के अलग होने के फैसले के बाद सुरैया ने देव आनंद की दी हुई अंगूठी को समुद्र के किनारे बैठकर समुद्र में फेंक दिया। जीनत पर भी कभी देवानंद का दिल आया था. लेकिन यह प्यार एक तरफा निकला जिसकी वजह से देवानंद का दिल टूट गया।

दिसंबर 2011 को अचानक लंदन से एक बुरी खबर आई, खबर थी कि काफी समय से बीमार चल रहे देव साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे। दिल का दौरा पड़ने के बाद देव आनंद का लंदन में निधन हो गया. 1946 से लगातार 2011 तक बालीवुड में सक्रिय रहने के बाद बालीवुड के इस अभिनेता ने जब दुनिया को आखिरी सलाम किया तो पूरे बॉलीवुड ने शोक जताया।

ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे जिन्होंने अंतिम सांस तक अपने काम से मुंह नहीं फेरा। देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरे ले रहा था। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।

 

देव आनंद की रोचक बातें

  • देव आनंद ने राज कपूर के साथ कोई फिल्म नहीं की है।
  • जेमिनी की फिल्म इंसानियत में देव आनंद सिर्फ एक बार दिलीप कुमार के साथ आए हैं।
  • देव आनंद की दोस्ती दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर खान से थी। वे दिलीप साहब को अपने दोस्त का बड़ा भाई मानकर आदर देते थे।
  • किशोर कुमार की आवाज के जादू से तीन अभिनेता शिखर पर पहुँचे, उनमें देव आनंद प्रथम हैं। दूसरे हैं राजेश खन्ना और तीसरे अमिताभ बच्चन।
  • 1947 में देव आनंद चर्चगेट पर लोकल ट्रेन में बैठे थे। इतने में शाहिद लतीफ और इस्मत चुगताई पास आकर बैठे। पूछा – इन दिनों क्या कर रहे हो? देव ने जवाब दिया – कुछ खास नहीं। दूसरे दिन उन्हें बॉम्बे टॉकीज बुलाया गया। अशोक कुमार ने उन्हें फिल्म जिद्दी में कामिनी कौशल का हीरो बना दिया।
  • फिल्म आनंद और आनंद में देव आनंद ने अपने बेटे सुनील आनंद को लांच किया, मगर वह सफल नहीं हो सका। सन् 2002 में सुनील ने मास्टरजी नाम से फिल्म निर्देशित की थी।
  • देव आनंद कभी पार्टी नहीं देते और दूसरों की पार्टियों में प्राय: नहीं जाते थे।
  • शादी के बाद से कल्पना कार्तिक ने फिल्म लाइन छोड़ दी। उन्हें कभी किसी सार्वजनिक स्थान पर भी नहीं देखा गया।
  • छोटे भाई विजय आनंद ने देव आनंद पर आधारित फिल्म जाना न दिल से दूरबनाई थी, लेकिन वे उसे प्रदर्शित नहीं करना चाहते थे।

 

 

 

 

 

 

 

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