कुदरत का कहर

कुदरत का कहर, पाप का ज़हर बढ़ रहा विनाश की ओर

सम्पादकीय

 

आंखें नम और दिल तड़प उठता है जब हम देखते और सुनते हैं कि किस तरह कुदरत अपनी करवट बदलती है और पूरी दुनिया को हिलाकर रख देती है। पहले उत्तराखण्ड में आई त्रासदी के जलजले से लोग अभी तक उभरे भी नहीं थे कि फिर नेपाल धरती ने अपना प्रचण्ड रूप दिखाकर एक बार में ही जाने कितने घरों की नींव को खत्म करके रख दिया। मासूम बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, नौजवान सब उस कहर से अपने आपको नहीं बचा पाए। जो बच गए उन्हें अपनों के इस तरह से खोने के दुख ने झंझोड़ कर रख दिया है कि वो अभी तक नहीं समझ और जान पा रहे हैं कि उनके साथ क्या से क्या हो गया है?

एक तरफ लोग एक-दूसरे की जान ले रहे हैं, बढ़ता आतंकवाद, जुर्म, आपराधिक घटनाएं और दूसरी तरफ प्रकृति का कहर। कहीं सूखा, कहीं बाढ़, कहीं भूकंप तो कहीं बढ़ते अपराध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आखिर दुनिया में ये हो क्या रहा है और क्यों हो रहा है? क्या वाकये ही दुनिया विनाश की ओर जा रही है सब खत्म होने को है? कभी हमारी दुनिया ऐसी तो न थी। प्रकृति का कहर बरपता तो इस तरह न था। शायद ये प्रकृति का इशारा है कि हम तरक्की के आयाम की ओर नहीं बल्कि अपनी समाप्ति की चरम सीमा पर पहुंचने को हैं। वक्त रहते अगर हम नहीं संभले तो जिंदगी किसी को संभलने का मौका नहीं देगी।

कहर तो बरपेगा, आज नेपाल में हुआ कल फिर यहां हो सकता है। ये लोगों के किए पाप हैं प्रकृति से किया खिलवाड़ है। जब प्रकृति की सहनशीलता खत्म होगी तो निश्चय ही विनाश होगा। लेकिन अफसोस, इसमें लाखों-करोड़ों मासूम भी होंगे जिनका कोई कसूर नहीं फिर भी उन्हें यह सजा मिल रही है और आगे भी मिलेगी।

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