राज्य के निजी विश्वविद्यालय भी अपनाएंगे शून्य लागत प्राकृतिक कृषि

राज्य के निजी विश्वविद्यालय भी अपनाएंगे शून्य लागत प्राकृतिक कृषि

  • राज्यपाल के आह्वान पर लिया इस दिशा में कार्य करने का निर्णय

शिमला: राज्यपाल आचार्य देवव्रत के आह्वान पर प्रदेश में स्थापित निजी विश्वविद्यालय भी शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के मॉडल को अपनाकर यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों को कृषि की इस पद्धति के लिए तैयार करने के साथ-साथ इस कृषि पद्धति को व्यपाक स्तर पर प्रोत्साहन देंगे। राज्य में पहली बार इस दिशा में हिमाचल प्रदेश निजी शैक्षिक संस्थान विनियामक आयोग के प्रयासों से चार निजी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ राजभवन शिमला में आयोजित बैठक में यह निर्णय लिया गया। बैठक की अध्यक्षता राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने की।

बैठक में अभिलाशी विश्वविद्यालय, मण्डी के कुलपति डॉ. ए.एस. गुलेरिया, बद्दी विश्वविद्यालय के डीन ब्रिगेडियर सुभाष कटोच, आई.ई.सी विश्वविद्यालय, बद्दी के कुलपति डॉ. नवीन गुप्ता, अर्नी विश्वविद्यालय के कुलपति ब्रिगेडियर संसार वर्मा तथा हिमाचल प्रदेश निजी शैक्षिक संस्थान विनियामक आयोग के सदस्य डॉ. एस.पी. कटयाल उपस्थित थे।

इस अवसर पर, राज्यपाल ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर, बागवानी विश्वविद्यालय, नौणी तथा गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फॉर्म की ताजा रिपोर्ट से यह निष्कर्ष सामने आया है कि प्राकृतिक कृषि, जो भारतीय नस्ल की गाय पर आधारित है, को अपनाने से जमीन का आर्गेनिक कार्बन बढ़ा है और मित्र जीवाणुओं की अत्यधिक संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल है। उन्होंने जानकारी दी कि प्राकृतिक कृषि को अपनाने से गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फॉर्म में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा प्रति एकड़ .9 पहुंच गई है जो पहले .3 थी। इसके अतिरिक्त, यहां 25 से 30 क्विंटल धान की खेती प्रति एकड़ ली जा रही है। कृषि वैज्ञानिक भी इस परिवर्तन से हैरान हैं।

उन्होंने आध्रप्रदेश के गुन्टूर में ‘इंटलैक्ट कन्सोरटियम’ द्वारा जी.आई.ज़ैड, इण्डिया पर किए गए अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा कि मिर्च व कपास पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि प्रति एकड़ पर रसायनिक खेती से किसानों को 50 हजार रुपये की फसल प्राप्त हुई, जबकि जैविक तौर पर की गई खेती से 68 हजार रुपये और प्राकृतिक कृषि से 96 हजार रुपये प्रति एकड़ की खेती की गई। यह रिपोर्ट शून्य लागत प्राकृतिक कृषि पद्धति के फायदे को स्वयं बयां करती है। उन्होंने कहा कि यदि निजी विश्वविद्यालय, जो कृषि विभाग का संचालन भी कर रहे हैं, इस दिशा में आगे आते हैं तो शुरूआती दौर में ही विद्यार्थियों को इस पद्धति से जोड़ने पर अच्छे परिणाम सामने आएंगे।

राज्यपाल ने कुलपतियों के आग्रह पर उन्हें भारतीय नस्ल की गाय उपलब्ध करवाने का आश्वासन दिया तथा परामर्श दिया कि वे अपने विशेषज्ञों को प्राकृतिक कृषि संबंधी जानकारी के लिए गुरुकुल कुरुक्षेत्र भेज सकते हैं। इसे आधार बनाकर वे अपने-अपने विश्वविद्यालयों में कार्य कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा इस दिशा में व्यापक स्तर पर कार्य किया जा रहा है और प्रदेश भर में ग्राम स्तर तक शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण कार्य में न केवल किसान बल्कि एन.सी.सी, एन.एस.एस और कॉलेज के विद्यार्थियों को भी संबद्ध किया जा रहा है ताकि ग्रामीण परिवेश से आने वाले विद्यार्थी भी इसका प्रचार कर सकें।

राज्यपाल ने इस अवसर पर उन्हें शून्य लागत प्राकृतिक कृषि संबंधी विस्तृत जानकारी दी और इसके फायदे से उन्हें अवगत करवाया।

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