समस्याओं से ज्यादा खतरनाक होती हैं मन से उपजी समस्याएं

समस्याओं से ज्यादा खतरनाक होती हैं मन से उपजी समस्याएं

  • जो मनुष्य परिस्थितियों के साथ संघर्ष नहीं, समझौता करता है वो कभी आगे नहीं बढ़ सकता

बंधा आदमी सहना नहीं जानता। वह कष्टों से बहुत जल्द घबरा जाता है और घबराया मन कभी कोई नई मुसीबत पैदा नहीं करना चाहता। इसीलिए वह जहां होता है वहीं अपने आपको ठीक मान लेता है। ऐसी मनोवृत्ति रखने वाला इंसान कभी क्रांति का स्वर बुलंद नहीं कर सकता। बनी-बनाई परंपराओं से हटकर नए आदर्शों, सिद्धांतों और जीवंतता की मिसाल नहीं बन सकती। जीवन के आस-पास गुजरते अनुभवों की सत्यता भी यही है कि मनुष्य अक्सर जीवन के उजले पृष्ठों की बजाय धुंधले पृष्ठों पर ही केंद्रित रहता है। एक बंदी-सा घुटा-घुटा जीवन जीता है जो मनुष्य परिस्थितियों के साथ संघर्ष नहीं, समझौता कर बैठता है। वो हर वक्त अपने आपको असुरक्षित-सा महसूस करता है। जिसको आत्मविश्वास का अभाव अंधेरे में जीना सिखा देता है। जिसके द्वारा महत्वाकांक्षाओं का बोझ ढोया जाता है। जिसके लिए न्याय और अधिकार अर्थशून्य बन जाते हैं। जिससे सफलताएं दूर भागती हैं और जिसमें न उद्देश्य की स्पष्टता होती है और न वहां तक पहुंचने के लिए छलांग भरने की ताकत। वास्तविक समस्याओं से ज्यादा खतरनाक होती हैं मन से उपजी समस्याएं। क्योंकि वे किसी भी साहसिक कार्य को करने से रोक लेती हैं और हमारी भावनाओं को संकुचित कर देती हैं।
विसंगतियों और असमानताओं के चलते जीवन जीने के मायने ही बदल गए हैं? कहीं भूख मिटाने के लिए दो जून की रोटी जुटाना सपना है, तो कहीं सहारा पाने के लिए आकाश उनका अपना है। कहीं दो औरतों के बीच बंटी हुई एक ही साड़ी से बारी-बारी तन ढक कर लाज बचानी है तो कहीं बीमारी की हालत में इलाज न होने पर जिंदगी मौत की ओर सरकती जाती है। कहीं जवान विधवा के पास दो बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है पर कमाई का साधन न होने से जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर होती है, तो कहीं सिर पर साया होते हुए भी शराब और दुवर््यसनों के शिकारी पति से बेवजह पीटी जाती हैं। कहीं कंठों में प्यास है पर पीने के लिए पानी नहीं। कहीं उपजाऊ खेत हैं पर बोने के लिए बीज नहीं, कहीं बच्चों में शिक्षा पाने की ललक है पर मां-बाप के पास फीस के पैसे नहीं। ऐसी ही अनेक समस्याएं उतनी जटिल नहीं हैं जितनी मन-ही-मन में पैदा होने वाली समस्याएं हैं। क्योंकि इनका असर शरीर और मन दोनों पर दिखता है। कभी-कभी यह संवदेना इतनी प्रभावशाली होती है कि व्यक्तित्व का हिस्सा बनकर अस्तित्व के लिये ही खतरा बन जाती है। ऐसे में मन के भीतर कहीं यह एहसास मजबूत होने लगता है कि समस्या आपके साथ ही खत्म होगी। यदि इस बात पर यकीन हो जाए कि समस्याओं का समाधान है और वह भी आपके द्वारा ही है तो जिंदगी को एक दिशा मिल जाती है। स्वयं को सिद्ध करने का अवसर भी तभी मिलता है। हम मनुष्य की सोच पर छाये अंधेरों एवं धुंधलकों को हटा सकें तो यह मानवता की वास्तविक सेवा होगी।

समस्याएं उतनी जटिल नहीं हैं जितनी मन-ही-मन में पैदा होने वाली समस्याएं हैं। क्योंकि इनका असर शरीर और मन दोनों पर दिखता है। कभी-कभी यह संवदेना इतनी प्रभावशाली होती है कि व्यक्तित्व का हिस्सा बनकर अस्तित्व के लिये ही खतरा बन जाती है। ऐसे में मन के भीतर कहीं यह एहसास मजबूत होने लगता है कि समस्या आपके साथ ही खत्म होगी। यदि इस बात पर यकीन हो जाए कि समस्याओं का समाधान है और वह भी आपके द्वारा ही है तो जिंदगी को एक दिशा मिल जाती है। स्वयं को सिद्ध करने का अवसर भी हमें तभी मिलता है। हम मनुष्य की सोच पर छाये अंधेरों एवं धुंधलकों को हटा सकें तो यह मानवता की वास्तविक सेवा होगी।
एक लडक़ा दुकान पर एक कुत्ता खरीदने गया। वहां अच्छी नस्ल के चार कुत्ते एक साथ खेल-कूद रहे थे। एक अकेला कुत्ता कोने में दुबक कर बैठा हुआ था। गौरव ने पूछा-इन कुत्तों की क्या कीमत है? दुकानदार ने कहा-हर कुत्ते की पांच हजार रुपये। गौरव का दूसरा सवाल था, जो कुत्ता कोने में बैठा है उसकी क्या कीमत है? उत्तर मिला उसकी कोई कीमत नहीं, क्योंकि वह बिकाऊ नहीं है, अपाहिज है। गौरव ने कहा-अंकल मुझे तो वही कुत्ता खरीदना है। मैं पूरे पांच हजार रुपए दूंगा। दुकानदार ने कहा-बच्चे! जिद क्यों करते हो? यह कुत्ता तुम्हारे किस काम का? न खेल-कूद सकता है, न दौड़ सकता है। इस बार गौरव ने कुछ जवाब नहीं दिया, बस अपने दाहिने पैर से पैंट ऊपर खींच ली। पांव की हालत देख कर दुकानदार उसकी भावना समझ गया। दुबके हुए कुत्ते को बच्चे की गोदी में देते हुए दुकानदार ने कहा-बेटे तुम्हारी अनमोल भावना ही इस कुत्ते की कीमत है। एक कुत्ते के लिए इतनी संवेदना हो सकती है तो फिर मनुष्य के लिए तो होगी ही।

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