मॉनसून के दौरान सेब बागीचों के आवश्यक कार्य... : बागवानी विशेषज्ञ: डॉ. एस.पी. भारद्वाज

मॉनसून के दौरान सेब बागीचों के आवश्यक कार्य… बागवानी विशेषज्ञ: डॉ. एस.पी. भारद्वाज

  • सूखे जैसी परिस्थिति के पश्चात मॉनसून का आगमन सेब बागीचों में लाभप्रद
  • मॉनसून में बागीचों में क्या-क्या आवश्यक कार्य करने हैं इसका आंकलन करना अत्यंत महत्वपूर्ण

लंबे समय से चल रहे सूखे जैसी परिस्थिति के पश्चात मॉनसून का आगमन सेब बागीचों में लाभप्रद होने वाला है। मानसून के आने पर हवा में आद्र्रता का बढऩा स्वभाविक है और भूमि में आवश्यकता

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

से अधिक जल संग्रहण भी निश्चत है। ऐसी परिस्थिति में बागीचों में क्या-क्या आवश्यक कार्य करने हैं इसका प्रत्येक बागवान को आंकलन करना निहित महत्वपूर्ण है। लंबे सूखे के पश्चात एकदम अधिक मात्रा में वर्षा जल की प्राप्ति पौधों की पत्तियों को पीला कर देती है और वह गिर जाती हैं, ऐसी पत्तियां केवल पीली ही होती है और इन पर कोई दाग या धब्बा नहीं होता। यदि बागीचों में ऐसे लक्षण हैं और केवल मात्र 5-8 प्रतिशत पत्तियां ही ग्रसित हैं तो यह एक स्वभाविक प्रक्रिया है, इससे चिंतित न हों और किसी छिडक़ाव की भी आवश्यकता नहीं है।

  • पूर्वपत्ती झडऩ रोग प्रकोप से बचने के लिए फफूंदनाशक का प्रयोग करना अत्यंत आवश्यक
  • मौसम साफ होने पर ही करें छिडक़ाव
  • छिडक़ाव करते समय पत्तियां सूखी हों व छिडक़ाव के पश्चात कम से कम 4-6 घंटे मौसम साफ रहे

मौसम के इस परिवर्तन के कारण पूर्वपत्ती झडऩ रोग जो मारसोनीना फफूंद के कारण होता है इस समय पनपता है और पत्तियों में स्थापित हो जाता है। इस प्रकोप से बचने के लिए फफूंदनाशक का प्रयोग करना अत्यंत आवश्यक है। फफूंदनाशकों में स्कोर 50 मि.लि. या कम्पेनियन 500 ग्राम या एन्ट्राकाल 600 ग्राम या नेटिवो 50ग्राम या कैवरियोटाप 300 ग्राम प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें। पौधों पर छिडक़ाव करते समय यह ध्यान रखें कि पत्तियां सूखी हों और छिडक़ाव के पश्चात कम से कम 4-6 घंटे मौसम साफ रहे। सुबह भी पत्तियां गीली होती हैं अत: मौसम साफ होने पर ही छिडक़ाव करें ताकि फफूंदनाशक का असर सही ढंग से प्राप्त हो सके।

  • पूर्व पत्ती झडऩ रोग से बचने के लिए तौलिए से पूरी तरह उखाड़ दें घास

वर्षा होने के साथ-साथ तौलियों में घास अधिक मात्रा में बढ़ती है। पूर्व पत्ती झडऩ रोग से बचने के लिए तौलिए से घास पूरी तरह उखाड़ दें तथा इसे तौलिए से बाहर रखें। तौलिया जितना साफ रहेगा। रोग पनपने की आशंका उतनी ही कम होगी। कुछ बागवान आजकल तौलिए को खोदकर खाद व उर्वरकों का प्रयोग करते हैं जो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। तौलिए में किसी प्रकार की छेडख़ानी न करें।

  • पौधों के तने के चारों ओर पनप रही अवांछित टहनियों को तुरन्त हटा दें

पौधों के अन्दरूनी भाग से जड़वों को हटा दें। पौधों के तने के चारों ओर पनप रही अवांछित टहनियों को जो इसी वर्ष निकली हैं तुरन्त हटा दें, उन पर किसी लेप को लगाने की आवश्यकता नहीं है। अवांछित टहनियों को निकालने से हवा का आदान-प्रदान सुचारू रूप से होगा और प्रकाश भी आ पाएगा, जिससे रोग नियंत्रित रहेगा और फलों का आकार बढ़ेगा और रंग में भी वांछित वृद्धि होगी। ऐसी कोमल टहनियों पर वूली एफिड  का भी आक्रमण होता है, अत: इससे कीट पर भी नियंत्रण बना रहेगा।

  • मौसम की परिस्थिति वूली एफिड तथा रैड माईट प्रकोप बढ़ाने में सहायक
रेड माइट के प्रकोप के पत्तों व फल पर लक्षण

रेड माइट के प्रकोप के पत्तों व फल पर लक्षण

वर्तमान में मौसम की परिस्थिति वूली एफिड तथा रैड माईट के प्रकोप को बढ़ाने में सहायक है। वूली एफिड पौधों के कटे-फटे भागों व नरम टहनियों या पत्ती कक्ष व बीमों के पास अपने झुण्ड बनाकर पौध रस निरन्तर चूसता रहता है। लगभग एक महीने में छाल में उभार आ जाता है और तीन महीने के अन्दर ग्रसित भागों पर गांठे बननी आरंभ हो जाती है। अत: इस कीट का नियंत्रण शीघ्र करें। वूली एफिड के नियंत्रण के लिए यदि प्रकोप कम है और किसी-किसी पौधे पर दिखाई दे रहा है तो, पानी द्वारा मोटा छिडक़ाव यानि प्रैशर से मोटी धारी बनाकर भी किया जाए तो भी, जाता है ऐसी स्थिति में किसी कीटनाशक का प्रयोग न करें।

दूसरे किसी भी फफूंदनाशक का यदि छिडक़ाव रोग नियंत्रण हेतु किया जा रहा है तो इसी छिडक़ाव को मोटी धारी बनाकर वूली एफिड कालोनी पर प्रहार करें, एक बार यदि एफिड हिल गए तो यह मर जाते हैं।

  • बरसात होने की संभावना कम है तो मेटासिस्सटॉक्स या रोगर पानी में मिलाकर ग्रसित पौधों पर छिडक़ें

जब लगातार वर्षा हो रही हो तब भी उस कीट का प्रकोप बहुत कम हो जाता है क्योंकि निरन्तर नमी व वर्षा जल के कारण उस कीट के द्वारा निर्मित बूल-ऊन समाप्त हो जाती है और कीड़ों की जीव संख्या में कमी हो जाती है। इसीलिए इस समय कीटनाशक का छिडक़ाव करना वांछित नहीं है। यदि वूली एफिड की जीवसंख्या अत्याधिक है और बरसात होने की संभावना कम है तो मेटासिस्सटॉक्स (Metasystox 25 डिग्री सेल्सियस)200 मि.लि. या रोगर 30 ई.सी (200 मि.लि.) प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर ग्रसित पौधों पर छिडक़ें।

  • रैड माईट की जीवसंख्या बढ़ाने में सहायक है बरसात का मौसम

बरसात का मौसम रैड माईट की जीवसंख्या व प्रकोप को बढ़ाने में अहम योगदान करता है। आम बागवान यह समझते हैं कि वर्षा होने पर माईट धुल जाती है और इसकी जीवसंख्या कम हो जाती है यह धारणा गलत है। ऐसा मौसम रैड माईट की जीवसंख्या को बढ़ाने में सहायक है क्योंकि 80-90 प्रतिशत आद्र्रता तथा 20-27 डिग्री सेल्सियस इसके लिए अत्यंत उपयुक्त है।

  • सावधानी से करें रैड माईट की जीवसंख्या का आंकलन
  • पत्तियों में औसतन 7-8 माईट प्रति पत्ती जीवसंख्या मिलती है तो माईटनाशक का छिडक़ाव आवश्यक
  • माईट के प्रकोप के कारण फलों का आकार तथा रंग होता है प्रभावित
  • माईट नियंत्रण के लिए मेडन 200 मि.लि. या ओवेरान 60 मि.लि. प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें

रैड माईट की जीवसंख्या का आंकलन सावधानी से करें और यह जांच लें कि यदि रैड माईट की जीवसंख्या प्रति पत्ती 7-8 से अधिक है तभी किसी माईटनाशक की आवश्यकता होगी। बागीचे में किन्ही 25 पौधों से 4-4 पत्तियां प्रत्येक पौधे के मध्य भाग से यानि तने व टहनी के बाहरी भाग के मध्य से, पत्तियों का चयन करें तथा इन 25 पौधों से एकत्र की गई 100 पत्तियों के निचले सतह

माइट आक्रमण के लक्षण

माइट आक्रमण के लक्षण

की जांच करें। यदि इन पत्तियों में औसतन 7-8 माईट प्रति पत्ती जीवसंख्या मिलती है तो माईटनाशक का छिडक़ाव आवश्यक है अन्यथा नहीं। माईट के अधिक जीवसंख्या होने पर पत्तियों के गहरे हरे रंग में परिवर्तन होता और यह हल्की हरी तथा आक्रमण की स्थिति में तांविया रंग की हो जाती है। ऐसी स्थिति में पौधों की पत्तियों को न आने दें। माईट के प्रकोप के कारण फलों का आकार तथा रंग प्रभावित होकर कम रहता है और आगामी वर्ष बीमे कमजोर हो जाते हैं और फल बनने की संभावना घट जाती है। माईट नियंत्रण के लिए मेडन 200 मि.लि. या ओवेरान 60 मि.लि. प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें।

  • आवश्यकतानुसार करें रसायनों व फफूंदनाशकों का प्रयोग

यह भी देखा गया है कि बागवान आवश्यकता से अधिक कीटनाशकों/ माईटनाशकों/ फफूंदनाशकों व पोषक तत्वों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण पौधों की प्रतिरोधक शक्ति प्रभावित होती है, मित्र कीट की जीवसंख्या बहुत कम हो जाती है और खर्चा अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। इसके साथ-साथ पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ता है। अत: रसायनों व फफूंदनाशकों का प्रयोग आवश्यकतानुसार करें और पर्यावरण संरक्षित व संरक्षण में सहयोग करें। संशय की स्थिति में वैज्ञानिक सलाह लेना न भूलें।

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