“स्ट्रॉबेरी की खेती”….

“स्ट्रॉबेरी की खेती”….

  • हिमाचल में स्ट्रॉबेरी उत्पादन की अपार संभावनाएं….
  • हिमाचल में बागवान स्ट्राबेरी की मिश्रित खेती कर कमा सकते हैं अतिरिक्त लाभ

हिमाचल में बागवानों द्वारा पिछले कुछ वर्षों से स्ट्राबेरी की खेती की जा रही है। स्ट्रॉबेरी की खेती समशीतोष्ण एवं शीतोष्ण जलवायु में की जा सकती है। जहां सर्दियों में अधिक ठंड पड़ती है तथा फरवरी-मार्च महीने में गर्मी आरंभ हो जाती है। किन्तु ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी नहीं पड़ती हो। स्ट्राबेरी हिमाचल की बागवानी में एक नया फल है। बागवान अपने नये बगीचों में 5-6 वर्ष तक स्ट्राबेरी की मिश्रित खेती कर अतिरिक्त लाभ/आय कमा सकते हैं। इसे किचन गार्डन में भी लगाया जा सकता है। स्ट्राबेरी बहुत ही सुन्दर एवं पौष्टिक फल है तथा इसका स्वाद काफी अच्छा है।

  • हिमाचल में अभी बहुत कम बागवान करते हैं स्ट्राबेरी की खेती
हिमाचल में स्ट्रॉबेरी उत्पादन की अपार संभावनाएं….

हिमाचल में स्ट्रॉबेरी उत्पादन की अपार संभावनाएं….

स्ट्राबेरी एक शीघ्र खराब होने वाला फल है तथा प्रदेश में उचित परिवहन, शीत भण्डारण व विपणन की व्यवस्था न होने के कारण इसकी खेती अभी बहुत कम बागवानों द्वारा की जा रही है। इसके अन्तर्गत बहुत कम क्षेत्रफल लाया जा सका है। हिमाचल प्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों जैसे सोलन, सिरमौर, शिमला, चम्बा, मण्डी, कांगड़ा व कुल्लू  के कुछ भागों में इसकी खेती बड़ी सफलतापूर्वक की जा सकती है।

  • पॉलीहाऊस तथा खुले में भी लगा सकते हैं स्ट्राबेरी
  • बेरोजगार युवाओं के लिए स्ट्रॉबेरी की खेती रोजगार का अच्छा जरिया

प्रदेश में स्ट्रॉबेरी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। किसान इसकी खेती पॉलीहाऊस तथा खुले में भी कर सकते हैं। प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के लिए स्ट्रॉबेरी की खेती रोजगार का अच्छा जरिया साबित हो सकती है। इसकी खेती करके युवा आत्मनिर्भर बन सकता है। कृषि और बागवानी विभाग भी किसानों-बागवानों को बार-बार फसल विविधीकरण के लिए प्रेरित करते हैं। किसानों-बागवानों को अलग-अलग फसलों के उत्पादन पर जोर देना चाहिए।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार की गई स्ट्रॉबेरी की नई किस्में लगाकर किसान अपनी आय में इजाफा कर सकते हैं। पॉलीहाऊस में इसकी खेती करके ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। पॉलीहॉऊस के लिए सरकार किसानों को 85 फीसदी अनुदान देती है।

  • पौधे की रोपाई करते समय अंकुरित भाग रखें जमीन से बाहर
  • सप्ताह में दो बार सिंचाई की आवश्यकता

पौधे की रोपाई करते समय उसके अंकुरित भाग को जमीन से बाहर रखना चाहिए व तुरंत हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। पॉलीथिन लगी क्यारियों में पौधा लगाने से पूर्व पौधे के लगाने के स्थान पर एक क्रॉस कट लगाने के बाद पौधा लगाना चाहिए। गर्मियों में सप्ताह में दो बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पौधे लगाने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए। इसके पश्चात 10-15 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।

  • कैसे तैयार कर सकते हैं रोग रहित व स्वादिष्ट फल

सबसे पहले समान मात्रा में जुताई कर खेत तैयार करके बुआई या रोपाई करनी चाहिए। 15-20 दिन बाद 500 मिलीलीटर माइक्रो झाइम और दो किलो सुपर गोल्ड और पांच लीटर नीम का काढ़ा 400 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर प्रति सप्ताह या 15-20 दिन बाद लगातार छिड़काव करते रहें। इस तरह से आप रोग रहित व स्वादिष्ट फल तैयार कर सकते हैं।

  • तीन साल तक फल ले सकते हैं स्ट्राबेरी पौधों से
  • कुल्लू जिला के बजौरा में तैयार किए जाते हैं स्ट्राबेरी के पौधे

स्ट्राबेरी के पौधे रनर द्वारा तैयार किए जाते हैं। एक पौधे से औसतन पांच रनर तैयार कर सकते हैं। स्ट्राबेरी पौधों से तीन साल तक फल ले सकते हैं। उसके बाद इसकी पैदावार में कमी आती है। इसलिए तीन साल बाद पुराने पौधे बदल कर नए पौधे लगाने चाहिए। अगर पौधों से रनर अधिक लेने हों तो अप्रैल-मई के महीनों में पौधों के फूल तोड़ देते हैं जिससे इनके फल नहीं बनते और ज्यादा से ज्यादा रनर बनते हैं। हिमाचल प्रदेश में स्ट्राबेरी के रनर भारत-इटली फल विकास परियोजना बजौरा जिला कुल्लू में तैयार किए जाते हैं तथा दूसरे जिलों को भी भेजे जाते हैं।

  • जिला कुल्लू में वर्ष 1993-94 में शुरू की गई स्ट्राबेरी की खेती
  • सेलमा व फर्न डे-न्यूटूल किस्मों से वर्ष में दो बार ले सकते हैं फल

जिला कुल्लू में स्ट्राबेरी की खेती भारत-इटली फल विकास परियोजना बजौरा द्वारा वर्ष 1993-94 में शुरू की गई। इस परियोजना में स्ट्राबेरी की चन्दलर, फर्न पजारो, गोरिला,

सैलमा, कनकीथरा, वरीघटन, डुगलसे व सऊदी किस्मों पर कार्य किया गया तथा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, मण्डी व शिमला जिलों में इसकी सम्भावनाओं का पता लगाने हेतु प्रदर्शन स्थल/ट्रायल लगाए गए। सेलमा व फर्न डे-न्यूटूल किस्म के पौधे हैं, जिनसे वर्ष में (मई-जून तथा सितम्बर-अक्तूबर) दो बार फल ले सकते हैं और इस तरह इस फसल से ज्यादा से ज्यादा फायदा हो सकता है। स्ट्राबेरी की खेती प्रति बीघा अधिक उत्पादन देती है अर्थात एक बीघे में लगभग 3920 पौधे लगाए जा सकते हैं जिससे 39,200 रूपए से 58,800 रूपए प्रति बीघा आय हो सकती है। स्ट्राबेरी की खेती खुले या ग्रीन हाऊस में की जा सकती है। स्ट्राबेरी की खेती के लिए सिंचाई की सुविधा तथा मल्चिंग की आवश्यकता होती है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आई.ए.आर.आई.) ने स्ट्रॉबेरी की 2 नई किस्में जतोग स्पैशल और शिमला डिलीशियस तैयार की है। इन दोनों किस्मों पर लंबे समय से आई.ए.आर.आई. ढांढा स्थित रिसर्च सैंटर में अनुसंधान कार्य चल रहा था। यह नई किस्में रंग में बेहतर है। खाने में बेहद स्वादिष्ट और ज्यादा उत्पादन देने वाली हैं। इनकी खेती प्रदेश के मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों के साथ-साथ मैदानी क्षेत्रों में भी की जा सकती है।

पौधे की रोपाई करते समय अंकुरित भाग रखें जमीन से बाहर

पौधे की रोपाई करते समय अंकुरित भाग रखें जमीन से बाहर

जलवायु व मिट्टी- स्ट्राबेरी की खेती के लिए उप-शीतोष्ण व शीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। स्ट्रॉबेरी की खेती हिमाचल में सबसे अधिक क्षेत्रफल यानि बड़े पैमाने पर होती है। हिमाचल प्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्र जैसे सोलन, सिरमौर, चम्बा, मण्डी, कांगड़ा व कुल्लू के कुछ भाग जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधा है उपयुक्त पाए गए हैं। खेती के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी का होना अति आवश्यक है। मिट्टी की पी.एच. 5.5-6.5 के बीच होनी चाहिए। स्ट्रॉबेरी की खेती उसर एवं मटियार भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। हल्की दोमट भूमि जिसमें जल निकास की समुचित व्यवस्था हो, स्ट्रॉबेरी के लिए अच्छी होती है।

हिमाचल में स्ट्राबेरी की किस्में-हिमाचल प्रदेश की बागवानी में स्ट्राबेरी नया फल होने से अब तक यहां सिर्फ दो किस्मों को लगाने हेतु सिफारिश की गई है। ये किस्में हैं टियोगा और टोरी। इसके अलावा बेलरूपी व डार्ना किस्में भी हैं जो काफी अच्छी पैदावार देती है।

पौधे लगाने का उपयुक्त समय – स्ट्राबेरी के पौधे लगाने का उपयुक्त समय अगस्त-सितम्बर है इसके पौधे से पौधे तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30×60 सेंटीमीटर होनी चाहिए।

पौधे लगाने की विधि : पौधे की रोपाई करते समय उसके अंकुरित भाग को जमीन से बाहर रखना चाहिए व तुरंत हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए, पौधे हमेशा शाम के समय ही लगाने चाहिए, पॉलीथिन लगी क्यारियों में पौधा लगाने से पूर्व पौधे के लगाने के स्थान पर एक क्रॉस कट लगाने के बाद पौधा लगाना चाहिए।

सिंचाई : पहली सिंचाई पौध लगाने के तुरंत बाद करनी चाहिए, इसके पश्चात 10-15 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए, गर्मियों में सप्ताह में दो बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

  • गोबर की खाद का प्रयोग करना आवश्यक

स्ट्रॉबेरी में गोबर की खाद का प्रयोग करना आवश्यक माना जाता है। बुआई से 10-15 दिन पहले प्रति एकड़ खेत में 10-12 टन गोबर की सड़ी हुई खाद सामान मात्रा में खेत में बिखेर दें। उसके उपरांत जुताई कर खेत तैयार कर लें। अंतिम जुताई से पहले दो बैग-माइक्रो फर्टी सिटी कंपोस्ट वजन 40 किलोग्राम, 2 बैग माइक्रो नीम वजन 20 किलोग्राम, दो बैग-माइक्रो भू-पावर वजन 10 किलोग्राम, दो बैग-भू-पावर वजन 5 0 किलोग्राम, 2 बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट वजन 10 किलोग्राम इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें।

  • आभार: हिमाचल प्रदेश : एक बहु-आयामी परिचय

 

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