मधुमक्खी प्रजाति का तेज़ी से वृद्धि करने पर प्रशिक्षण

मधुमक्खी प्रजाति का तेज़ी से वृद्धि करने पर प्रशिक्षण

  • देशी मधुमक्खियों के संरक्षण और प्रचार पर प्रशिक्षण
  • पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं देशी मधुमक्खियां

नौणी: पूर्वोत्तर राज्य मेघालय में स्वदेशी मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने की आधिकारिक नीति से एपिस सेराना- देशी एशियाई मधुमक्खी की प्रजाति का मौनपालन ज़ोर पकड़ रहा है। इसी कड़ी में मेघालय के लाइन विभागों के अधिकारियों और मास्टर्स मौनपालक का 17 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल वर्तमान में नौणी स्थित डॉ वाईएस परमार औदयानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय में इस मधुमक्खी प्रजाति का तेज़ी से वृद्धि करने के ऊपर प्रशिक्षण ले रहे हैं।

शिलांग के मेघालय इंस्टीट्यूट ऑफ एंटरप्रेनरशिप (एमआईई) द्वारा प्रायोजित यह सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एपिस सेराना रानी मधुमक्खी की तेजी से वृद्धि पर केंद्रित रहेगा। प्रशिक्षण का उद्देश्य प्रतिभागियों, जो की मौनपालक है और सभी के पास 14 से 40 मधुमक्खीयों की कॉलोनी हैं, को एपिस सेराना मधुमक्खीयों की कॉलोनी में वृद्धि करने का प्रशिक्षण देना है। मेघालय में यूरोप से लायी गई एपिस मेलिफेरा मधुमक्खी प्रजाति नहीं है।  प्रशिक्षण के बारे में बताते हुए, वरिष्ठ कीट वैज्ञानिक और कार्यक्रम के समन्वय डा॰ हरीश शर्मा ने बताया कि एपिस सेराना प्रजाति परागण और छोटे पैमाने पर मधुमक्खी पालन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ये स्थानीय परिस्थितियों,विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भी अनुकूल हैं।

उन्होनें बताया कि एक कॉलोनी में एक युवा और प्रबल रानी रखकर और जिसका सालाना आधार पर प्रतिस्थापन करके, इस प्रजाति में प्रबंधन, तेजी से वृद्धि और व्यवहार संबंधित समस्यायों को संबोधित किया जा सकता हैं। डा॰ शर्मा ने बताया कि बेहतर प्रदर्शन वाली कॉलोनियों और बड़ी संख्या में रानियों का उत्पादन से यह हासिल किया जा सकता है। विश्वविद्यालय को महत्वपूर्ण मधुमक्खी प्रजातियां – एपिस सेराना और एपिस मेलिफेरा की सामूहिक रानी पालन में विशेषज्ञता हासिल है। एमआईई के अनुरोध पर यह प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है जहां वैज्ञानिक मधुमक्खी प्रबंधन के अलावा,प्रतिभागियों को विशेष रूप से सामूहिक रानी पालन में प्रशिक्षित किया जाएगा।

  • एपिस सेराना क्यों?

यह देशी मधुमक्खी है, जो मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका सहित एशियन मेनलैंड में पाई जाती है। प्राकृतिक परिस्थितियों में हर जगह पाई जाने वाली ये पर्वतीय मधुमक्खी स्थिर छोटे स्तर पर मधुमक्खी पालन के लिए अनुकूल हैं। पहले, पारंपरिक घरों की मोटी बाहरी दीवारों में इन मधुमक्खीयों को होना एक आम बात होता था। ये मधुमक्खीयां ठंड को भी काफी हद तक सहन कर सकती है और वरुरो पतंग, जो एपिस मेलिफेरा को प्रभावित करती हैं, की प्रतिरोधी हैं।

हिमाचल प्रदेश में एपिस सेराना मधुमक्खी पालन ज्यादातर गांवों में पारंपरिक तरीकों से होता है। हालांकि,एपिस मेलिफेरा के आगमन के बाद से इसके मौनपालन में गिरावट आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रचार की बड़ी संभावना है क्योंकि ये मधुमक्खी फूलों वाले पेड़ों की कम उपलब्धता पर भी जीवित रह सकती हैं। विशेषज्ञ इस प्रजाति को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी ज़ोर देते हैं क्योंकि शहद के अलावा यह विभिन्न प्रकार के मधुमक्खी परागणित पौधों में अमूल्य सेवाएं प्रदान करती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास कार्यक्रम (एचपी एचडीपी) और अखिल भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजना के तहत विश्वविद्यालय में चल रहे कार्यक्रमों में भी इन देशी मधुमक्खियों की सुरक्षा और संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

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