गरीबों के लिए हुआ याचिका दाखिल करना आसान

किशोर न्याय कानून पर पुनर्विचार आवश्यक

अपराध संबंधी कानूनों के बारे में शुरू से यह बहस चलती रही है कि उन्हें दंडात्मक होना चाहिए या सुधारात्मक। हर व्यक्ति में सुधार की गुंजाइश होती है और इसी कारण मृत्युदंड का विरोध होता है। बच्चों के मामले में तो यह मुद्दा और समीचीन हो जाता है कि उन्हें कठोर दंड दिया जाना चाहिए या नहीं। हाल ही में दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के एक आरोपी के नाबालिग होने के कारण यह बहस तेज हो गई थी। समाज का एक बड़ा वर्ग किशोर न्याय कानून में संशोधन की मांग थी कि किशोर की परिभाषा में उम्र 18 से कम हो और ऐसे नृशंस अपराधि

अधिवक्ता - रोहन सिंह चौहान

अधिवक्ता – रोहन सिंह चौहान

यों को फांसी जैसी सख्त सजा मिले। अपराध कानून में कोई भी संशोधन पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होता और यह छठा अभियुक्त अंतत: नाबालिग ही पाया गया तो सजा के नाम पर उसे अधिकतम तीन वर्ष तक बाल सुधार गृह में रखा जा सकेगा। उसे जमानत पाने का भी अधिकार होगा, अर्थात कुछ महीने में ही अपराधी छूट जाएगा। इस संभावना से समाज उद्वेलित है और कानून में बदलाव की मांग कर रहा है ताकि आगे कोई किशोर अपराधी इतने सस्ते में न छूट जाए। इसके विपरीत बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक घटना के आधार पर इतना बड़ा संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। यह किशोरों द्वारा जघन्य अपराध का यह कोई पहला मामला नहीं है। इस बार हमें किशोर न्याय कानून पर विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शिमला के अधिवक्ता रोहन सिंह चौहान।

हाल के वर्षों में किशोर अपराधियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है, इसलिए कानून पर पुनर्विचार जरूरी है। वैसे एक घटना भी कानून बदलने या नया कानून बनाने के लिए काफी है। इंग्लैंड में फरवरी 1993 जेम्स बलजर नामक एक बच्चे की दो 10 वर्ष के बच्चों ने अपहरण कर हत्या कर दी। इस घटना के एक वर्ष के अंदर वहां क्रिमिनल जस्टिस एंड पब्लिक ऑर्डर एक्ट, 1994 बनाया गया जिसमें किशोर अपराधियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। उस घटना के पहले वहां भी किशोर अपराधियों के लिए सजा के बजाय पुनर्वास की ही व्यवस्था हुआ करती थी। 1990 के दशक में इस अवधारणा पर सवाल उठने लगे क्योंकि किशोरों द्वारा किए जाने वाले अपराधों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होने लगी। फरवरी 1993 की घटना बहस को उसकी परिणति तक ले गई।

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड में पुलिस ने पांच अभियुक्तों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर दिए, किंतु छठे को इसमें शामिल नहीं किया गया है क्योंकि वह नाबालिग होने का दावा कर रहा है। पुलिस ने किशोर न्याय बोर्ड से उसकी हड्डी की जांच कराने की अनुमति मांगी है। जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार उसकी उम्र 18 वर्ष से कुछ महीने कम है। किशोर न्याय (बाल सुरक्षा) कानून, 2000 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति किशोर माना जाएगा और यदि वह कोई अपराध करता है तो उसका विचारण किशोर (जुवेनाइल) अदालत में होगा। भुक्तभोगियों के अनुसार इस छठे अपराधी ने ही सबसे ज्यादा बर्बरता दिखायी। किशोर की परिभाषा बदलने की मांग उसके इस वहशीपन के कारण ज्यादा जोर पकड़ गई है। एक और सवाल उठा है कि जब जन्म प्रमाणपत्र की उपस्थिति में मेडिकल जांच की जरूरत क्यों महसूस की गई। 2007 में बनी मॉडल नियमावली के नियम 12 के तहत जन्म का यदि कोई प्रमाणपत्र हो तो उसे मेडिकल जांच के बनिस्बत प्राथमिकता दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने हरिराम मामले में इसे सही माना।

जहां तक सवाल बाल अपराधियों के लिए अलग कानून का है तो ए.जी. कार्ड्यू की अध्यक्षता में बनी भारतीय जेल कमिटी (1919-20) की रिपोर्ट में बाल अपराधियों को दुर्दांत अपराधियों से अलग रखने का सुझाव दिया गया था, क्योंकि जेल में उनका यौन शोषण सहित कई प्रकार का शोषण होता है। 1921 में सबसे पहले मद्रास ने बाल अधिनियम बनाया, फिर अन्य राज्यों ने ऐसे कानून बनाए। तब यह राज्य का विषय माना जाता था और इस पर कोई केंद्रीय कानून नहीं बना। नवंबर 1985 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने किशोर न्याय के लिए मानक न्यूनतम नियम का अनुमोदन किया जिसे पेइचिंग रूल्स भी कहते हैं। इसके आधार पर भारत में 1986 में किशोर न्याय कानून बनाया गया, जिसमें 16 वर्ष से कम उम्र के लड़के और 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को किशोर माना गया।

यह भारतीय दंड विधान की धारा 361 पर आधारित था, जिसके अनुसार लड़कियों को लंबे समय तक सुरक्षा की ज़रूरत है। इसमें यह भी प्रावधान किया गया कि किशोर की गिरफ्तारी की प्रक्रिया अलग होगी तथा उनका मुकदमा किशोर न्याय बोर्ड में चलेगा। 1989 में बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र का अगला अधिवेशन हुआ जिसमें लड़का-लड़की दोनों को 18 वर्ष में किशोर माना गया। भारत सरकार ने 1992 में इसे स्वीकार किया और सन् 2000 में 1986 के अधिनियम की जगह एक नया किशोर न्याय कानून बनाया गया। फिर 2006 में इसमें संशोधन किया गया तथा 2007 में मॉडल नियम बनाए गए। यानी करीब 90 साल में एक किशोर न्याय कानून आकार ले पाया। जो भी हो इस कानून में पुनः संशोधन की मांग की जा रही है

किशोर अपराध के मामले ने अब नवीन परिदृश्य ग्रहण कर लिया है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय देश में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में किशोर लडकों की बढ़ती भागीदारी के मद्देनजर किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु घटाकर 16 साल करने से इंकार करते हुये फिलहाल इस मांग और विवाद पर विराम लगा दिया है। बलात्कार और बलात्कार के प्रयास तथा महिलाओं का शील भंग करने के प्रयास जैसे संगीन अपराधों में किशोरों की भूमिका के मद्देनजर ऐसे मामलों में लिप्त होने की स्थिति में 18 से 16 साल की आयु के किशोर को किशोर न्याय कानून के दायरे से बाहर रखने की मांग की जा रही थी।

पिछले एक साल की घटनाओं पर यदि नजर डालें तो पता चलता है कि महिलाओं के प्रति होने वाले यौन अपराधों में 16 से 18 साल की आयु के किशोरों की भूमिका में तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन मौजूदा आंकडों के आलोक में देश की शीर्ष अदालत की राय है कि ऐसे अपराधों में किशोरों की भागीदारी में जबरदस्त बढोत्तरी होने का तर्क सही नहीं है क्योंकि इनमें करीब दो फीसदी की ही वृद्धि हुई है।

किशोर बच्चों को अपराधियों के बीच रखने की बजाए उन्हें सुधारने की उम्मीद से ही वर्ष 2000 में किशोर न्याय: बच्चों की देखभाल और संरक्षण कानून बनाया गया था। किशोर न्याय कानून के प्रावधानों के तहत किशोर की परिभाषा अलग है, इसलिए संगीन अपराध के बावजूद भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत उन्हें दंडित नहीं किया जाता। किशोर न्याय कानून के तहत किसी अपराध में 18 साल से कम आयु के किशोर के शामिल होने पर उसे बाल सुधार गृह भेजा जाता है। इसी कानून के तहत ही उसके खिलाफ किशोर न्याय बोर्ड में कार्यवाही होती है।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय: बच्चों की देखभाल और संरक्षण कानून 2000 की धारा 15:1::जीः के तहत जघन्य अपराध में दोषी पाये जाने के बावजूद एक किशोर 18 साल का होते ही रिहा कर दिया जाता था लेकिन इस कानून में 2006 में संशोधन के बाद स्थिति बदली है। अब यदि कोई किशोर ऐसे अपराध में दोषी पाया जाता है तो उसे तीन साल की सजा काटनी ही होगी भले ही वह 18 साल का हो चुका हो।

न्यायालय की इस व्यवस्था से स्पष्ट है कि यदि किसी किशोर ने 17 साल की आयु में अपराध किया है तो उसे दोषी पाये जाने की स्थिति में 18 साल की उम्र के बाद भी दो साल सलाखों के पीछे गुजारने ही होंगे। राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार 2012 में भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोपों में 18 साल से कम आयु के 35465 किशोर गिरफ्तार किये गये थे। इनमें 33793 लड़के और1672 लड़कियाँ थीं। ब्यूरो के आँकड़ों के मुताबिक भारतीय दंड संहिता के तहत हुए अपराधों में किशोरों की भागीदारी 1.2 फीसदी थी जबकि प्रत्येक एक लाख किशोरों में इनकी अपराध दर 2.3 फीसदी थी। यदि पिछले एक दशक के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि इस दौरान इसमें काफी वृद्धि हुई है। वर्ष 2011 की तुलना में 2012 में किशोरों द्वारा किये गए अपरधों में भी 11.2 फीसदी की वृद्धि हुई है। इन आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि 2002 से यौन अपराधों में किशोरों की संलिप्तता में वृद्धि हो रही है। पिछले साल ऐसे अपराधों में 2239 किशोर गिरफ्तार किये गये थे। इनमें से 1316 किशोरों पर बलात्कार के आरोप थे जबकि 2011 में बलात्कार के आरोप में 1149, 2010 में 858, 2009 में 798और 2002 में 485 किशोर ही गिरफ्तार किये गये थे।

पिछले एक दशक में यौन अपराधों में इन किशोरों की भूमिका में तेजी से इजाफा हुआ है। वर्ष 2001 में बलात्कार के आरोप में करीब 400 किशोर पकड़े गये थे जबकि 2011 में इनकी संख्या बढ़कर 1149 तक पहुंच गयी थी। शायद यही वजह थी कि दुष्कर्म और जघन्य अपराधों में किशोर लड़कों के शामिल होने की बढ़ती घटनाओं के कारण किशोर की आयु सीमा को नये सिरे से परिभाषित करने की मांग जोर पकड़ रही थी।

महिलाओं के साथ यौन अपराधों में किशोरों की बढती भूमिका पर संसदीय समिति ने भी चिंता व्यक्त की थी। संसद की महिला सशक्‍तिकरण मामलों पर गठित समिति ने भी महिलाओं के प्रति यौन अपराधों में 16 से 18 साल की उम्र के किशोरों की भूमिका के मद्देनजर पुरूष किशोर की आयु 18 साल से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की थी। समिति का मानना था कि किशोर न्याय कानून के तहत लड़के और लड़कियों की किशोर उम्र एक समान यानी 18 साल करने के अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं।

कुछ समय पहले तक अपराध की दुनिया में किशोरों के शामिल होने का ठीकरा उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, गरीबी, निरक्षरता और अभावों पर फोड़ा जाता था लेकिन अब देखा जा रहा है कि संभ्रांत परिवार के किशोरों में भी इस तरह की आपराधिक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।

मौजूदा कानून के तहत किसी भी किशोर आरोपी का न तो नाम सार्वजनिक किया जा सकता है और न ही उसे सामान्य आरोपियों के साथ जेल में रखा जा सकता है। संगीन अपराध में लिप्त होने के बावजूद नाबालिग को उम्र कैद जैसी सजा भी नहीं दी जा सकती है। किशोर न्याय कानून के तहत उसे तीन साल तक ही बाल सुधार गृह में रखा जा सकता है और दोष सिद्ध होने के बावजूद उसे सरकारी नौकरी या दूसरी सेवाओं से न तो वंचित किया जा सकता है और न ही चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है।

सवाल यह है कि आखिर अपराध और विशेषकर महिलाओं के प्रति अपराधों में किशोर युवकों की भूमिका में तेजी से इजाफा कैसे हो रहा है। समाज में ऐसे तत्वों की कमी नहीं है जो इन किशोरों को पथभ्रष्‍ट करने और अपनी विकृत मानसिकता से उपजे मंसूबों को पूरा करने के लिये उन्हें अपराध की दुनिया में ढकेलने से गुरेज नहीं करते है। इसके अलावा समाज में आ रहे खुलेपन, सिनेमा और टेलिविज़न पर दिखाये जा रहे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों और इंटरनेट की दुनिया के कारण किशोरो में बढ़ रही उत्सुकता को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।

अकसर देखा गया है कि गंभीर अपराध में किसी किशोर के गिरफ्तार होने पर सबसे पहले उसके नाबालिग होने की दलील दी जाती है। इस संबंध में स्कूल में दर्ज आरोपी की उम्र का हवाला दिया जाता है। कई मामलों में ऐसा भी हुआ है कि स्कूल में कम उम्र दर्ज कराई गयी लेकिन वैज्ञानिक तरीके से आरोपी की आयु का पता लगाने की कवायद में दूसरे ही तथ्य सामने आये।

सवाल उठता है कि क्या किशोर की परिभाषा में उम्र घटाई जानी चाहिए? यह एक तथ्य है कि आजकल बच्चे बहुत जल्द प्रौढ़ हो रहे हैं। पेशेवर अपराधी किशोरों का इस्तेमाल जघन्य अपराधों के लिए करते हैं। उन्हें धन का प्रलोभन देकर बताया जाता है कि उन्हें काफी सजा कम होगी और जेल में भी नहीं रखा जाएगा। इसे ध्यान में रखते हुए किशोर अपराधियों का वर्गीकरण तो किया ही जाना चाहिए। भारतीय दंड विधान में सात साल तक की उम्र के बच्चे द्वारा किए गए अपराध को अपराध नहीं माना जाता। सात से अठारह साल के बीच 7 से 10 और 11 से 14 तथा 15-16 और 17-18 के चार आयु वर्ग बनाए जा सकते हैं और उसी के अनुरूप बढ़ती उम्र के साथसजा को सख्त किया जा सकता है। इंग्लैंड में इसी तरह का वर्गीकरण है।

चूंकि देश की सर्वोच्च अदालत ने जघन्य अपराधों में किशोरों की संलिप्तता के बारे में उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर किशोर कानून में परिभाषित किशोर की परिभाषा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप से इंकार करते हुए कहा है कि पर्याप्‍त आँकड़े उपलब्ध होने तक ऐसा नहीं किया जा सकता है, इसलिए अब महिलाओं के प्रति यौन हिंसा के अपराधों में किशोरों की संलिप्तता के बारे में राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के पिछले एक दशक के आँकड़ों के साथ ही तमाम तथ्यों और आँकड़ों तथा संसदीय समिति की सिफारिश के आलोक में संसद को ही किशोरों की मनःस्थिति में सुधार और उनके कल्याण के लिये नये उपायों पर विचार करना होगा।

हमारा कानून भी यह स्वीकार करता है कि किशोरों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार के लिये किशोर बालक स्वयं नहीं बल्कि उसकी परिस्थितियां उत्तरदायी होती हैं। इसी वजह से भारत समेत अनेक देशों में किशोर अपराधों के लिए अलग कानून और न्यायालय और न्यायधीशों की नियुक्ति की जाती है। उनके न्यायाधीश और संबंधित वकील बाल मनोविज्ञान के अच्छे जानकार होते हैं। किशोर-अपराधियों को दंड नहीं, बल्कि उनकी केस हिस्ट्री को जानने और उनके वातावरण का अध्ययन करने के बाद उन्हें “सुधार गृह” में रखा जाता है जहां उनकी दूषित हो चुकी मानसिकता को सुधारने का प्रयत्न किए जाने के साथ उनके साथ उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है। ऐसे बच्चों के साथ घृणित बर्ताव ना अपना कर उनके प्रति सहानुभूति, प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययनों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि मनुष्य में अपराधवृत्तियों का जन्म बचपन में ही हो जाता है। अंकेक्षणों (स्टैटिस्टिक्स) द्वारा यह तथ्य प्रकट हुआ है कि सबसे अधिक और गंभीर अपराध करनेवाले किशोरावस्था के ही बालक होते हैं। इस दृष्टि से कैशोर अपराध (जुवेनाइल डेलिंक्वेंसी) को एक महत्वपूर्ण कानूनी, सामाजिक, नैतिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्या के रूप में देखा जाने लगा है।

किशोर अपराधों का स्वरूप सामान्य अपराधों से भिन्न होता है। कानूनी शब्दावली में देश के निर्धारित कानूनों के विरुद्ध आचरण करना अपराध है, किंतु कैशोर अपराध समाजशास्रीय एवं मनोवैज्ञानिक प्रत्यय है। किशोर अवस्था के बालकों द्वारा किए गए वे सभी व्यवहार जो कानूनी ही नहीं वरन् किसी भी दृष्टि से समाज तथा व्यक्ति के लिये अहितकर हों, कैशोर अपराध की सीमा में आते है। यथा विद्यालय से भागना कानूनी दृष्टि से अपराध नहीं है, किंतु सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हानिकर है। यह एक ओर तो सभी प्रकार के उत्तरदायित्वों से भागना सिखाती है और दूसरी ओर बालक को उचित कार्य से हटाकर अनुचित कार्यों की ओर प्रेरित करती है। इस प्रकार कैशोर अपराध का क्षेत्र अधिक व्यापक है।

किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण तथा व्यवहार के निर्धारण में वातावरण का बहुत हाथ होता है अत: अपने उचित या अनुचित व्यवहार के लिये किशोर बालक स्वयं नहीं वरन् उसका वातावरण उत्तरदायी होता है। इस कारण अनेक देशों में कैशोर अपराधों का अलग न्यायाविधान है; उनके न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधिकारी बाल मनोविज्ञान के जानकार होते है। वहाँ बाल-अपराधियों को दंड नहीं दिया जाता, बल्कि उनके जीवनवृत्त (केस हिस्ट्री) के आधार पर उनका तथा उनके वातावरण का अध्ययन करके वातावरण में स्थित असंतोषजनक, फलत: अपराधों को जन्म देनेवाले, तत्वों में सुधार करके बच्चों के सुधार का प्रयत्न किया जाता है। अपराधी बच्चों के प्रति सहानुभूति, प्रेम, दया और संवेदना का व्यवहार किया जाता है। भारत में भी कुछ राज्यों में बालन्यायालयों और बालसुधारगृहों की स्थापना की गई है।

किशोर बालक अपराध क्यों करते है, इस संबंध में विभिन्न मत हैं। मानवशस्रियों (ऐंथ्रोपालोजिस्ट्स्) ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अपराध का संबंध वंशानुक्रम, शारीरिक बनावट एवं जातिगत विशेषताओं से है। इसी कारण अपराधी जाति (क्रिमिनल ट्राइब्ज़) के सभी व्यक्ति एक ही जातिगत विशेषताओं और एक सी शारीरिक बनावट के होते हैं तथा वे एक सा अपराध करते हैं। शरीर वैज्ञानिकों का मत भी इसी से मिलता जुलता है। उनके मतानुसार विशेष प्रकार की शारीरिक बनावट और प्रक्रियावाला व्यक्ति विशेष प्रकार का अपराध करेगा। किंतु मनोविज्ञान ने सिद्ध किया है कि अपराध का संबंध न तो उत्तराधिकार से होता है और न शारीरिक बनावट से ; उत्तराधिकार में केवल शारीरिक विशेषताएँ ही प्राप्त होती हैं, उनका व्यक्ति की भावनाओं, आकांक्षाओं, प्रवृत्तियों एवं बुद्धि से सीधा संबंध नहीं होता। समाजशास्रियों का कथन है कि अपराध का जन्मदाता दूषित वातावरण, यथा गरीबी, उजड़े परिवार, अपराधी साथी आदि है। किंतु आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोधों द्वारा यह जाना गया है कि एक ही वातावरण ही नही वरन् एक ही परिवार में पले, एक ही मातापिता के बच्चों में से एकआध ही अपराधी होता है, सभी नहीं। यदि अपराध का जन्मदाता वातावरण होता है तो अन्य भाई बहिनों को भी अपराधी बनना चाहिए।

आधुनिक मनोविज्ञान कैशोर अपराधों का मूल मनोवैज्ञानिक स्थितियों में ढूँढ़ता है। उसके अनुसार हर बच्चे की कुछ इच्छाएँ, आकांक्षाएँ और आवश्यकताएँ होती हैं। उन्हें पूरा करने का वह प्रयत्न करता है। उसके इस प्रयास में अनेक बाधाएँ आती हैं, जिन्हें वह जीतने का प्रयत्न करता है। अपने प्रयत्नों के फल से वह या तो संतुष्ट होता है या असंतुष्ट अथवा उदासीन। किंतु उदासीनता के भाव कम ही हो पाते है। संतोष और असंतोष का संबंध सफलता या उपलब्धि से नहीं हैं वरन् संतोष आपेक्षिक प्रत्यय है। निर्धन किसान अपनी स्थिति में संतुष्ट रह सकता है किंतु करोड़पति व्यवसायी नहीं। असंतोष को दूर करने का प्रयास मानव स्वभाव है। इसे दूर करने के समाज द्वारा स्वीकृत ढंग जब असफल हो जाते है तब व्यक्ति ऐसा ढंग अपनाता है जो सफल हो, भले ही वह समाज के लिये हानिकर और उसके द्वारा अस्वीकृत ही क्यों न हो। तभी वह अपराधी बन जाता है। यथा-कोई कमजोर विद्यार्थी अनुत्तीर्ण होने पर अपनी कमजोरी का ध्यान करके अपनी स्थिति में संतुष्ट रह सकता है किंतु कक्षा का तेज विद्यार्थी तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर आत्महत्या तक कर सकता है। प्रश्न संतोष और असंतोष की मात्रा का है।

निष्कर्ष यह कि बच्चा चाहे शारीरिक कमजोरी से पीड़ित हो, उसकी बुद्धि कम हो, उसके माता पिता अपराधी हों, उसका वातावरण खराब हो, उसकी उपलब्धियाँ निम्न स्तर की हों, फिर भी वह तब तक अपराधी नहीं बनेगा, जब तक कि वह अपनी स्थिति से असंतुष्ट न हो और असंतोष को दूर करने के उसके समाज स्वीकृत प्रयास असफल न हो चुके हों।

 

भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम,

2000 के स्थान पर नया कानून (किशोर न्याय विधेयक, 2014) लाने की तैयारी कर ली है। प्रस्तावित कानून का प्रारूप इंटरनेट पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए उपलब्ध करा दिया गया है। इस पहल की पृष्ठभूमि में बहुचर्चित निर्भया बलात्कार कांड और हत्या का प्रकरण प्रतीत होता है जिसमें दोषी एक किशोर अपराधी को मात्र तीन वर्ष के लिए सुधार गृह में बंद रखने की सजा मिली थी। अधिसंख्य लोगों का मानना था कि यह सजा अपराध की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत कम है। उसी दिन से ही किशोर न्याय अधिनियम, 2000 में परिभाषित किशोरावस्था की अठारह वर्ष की उम्र को घटा कर सोलह वर्ष करने की वकालत शुरू हो गई थी। यह कवायद अब जिद में बदल गई लगती है।

निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद उपजे जनाक्रोश को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन सरकार ने न्यायमूर्ति वर्मा समिति का गठन किया था। समिति को स्त्री-विरोधी अपराधों से संबंधित कानूनी प्रावधानों को और कठोर बनाने के उपाय सुझाने का जिम्मा दिया गया था। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन किए गए हैं। वर्मा समिति के समक्ष एक प्रश्न यह भी था कि क्या किशोरावस्था की उम्र को अठारह वर्ष से घटा कर सोलह वर्ष किया जाना चाहिए? बहुत विचार-विमर्श के बाद समिति ने किशोरावस्था की उम्र अठारह वर्ष ही रखने का सुझाव दिया था। इसी विषय को लेकर उच्चतम न्यायालय में सात याचिकाएं भी दायर की गई थीं, जिनमें किशोरावस्था की अधिकतम उम्र सोलह वर्ष करने की गुहार लगाई गई थी। उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों के एक खंडपीठ ने इन सभी याचिकाओं को एक साथ सुनते हुए किशोरावस्था की उम्र को पुन: परिभाषित करने से इनकार कर दिया था। खंडपीठ ने कहा था कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रख कर बनाए गए तर्क-संगत प्रावधान हैं, जिनमें फिलहाल हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

किशोरावस्था की अधिकतम सीमा अठारह वर्ष निर्धारित करते समय बाल-मनोवैज्ञानिकों और व्यवहार-विशेषज्ञों की राय को आधार बनाया गया है। उच्चतम न्यायालय का मत था कि अठारह वर्ष तक की आयु वाले किशोरों को सुधार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने की बहुत गुंजाइश बाकी रहती है। निर्भया कांड जैसे गंभीर अपराधों को रोकने की पृष्ठभूमि में किशोरावस्था की उम्र कम किए जाने की दलील को खंडपीठ ने यह कह कर नकार दिया था कि इस प्रकार के गंभीर अपराध ऐसे घटित हो रहे कुल संगीन अपराधों की संख्या के मुकाबले बहुत कम हैं और अपवाद-स्वरूप ही सामने आते हैं। अपवादों को आधार बना कर सामान्य कानून में परिवर्तन करना विधिशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत होगा।

पर मीडिया में जब भी किसी किशोर द्वारा गंभीर अपराध करने की खबर आती है, जनमत न्यायमूर्ति वर्मा समिति और उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था को मानने से इनकार करता नजर आता है। जनता का तर्क होता है कि संगीन अपराधों में किशोरों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। समय आ गया है कि किशोरावस्था की आयु-सीमा घटा कर उन्हें उचित दंड देने की व्यवस्था की जाए। इसी को वजन देते हुए सरकार अब कानून में फेरबदल करने के बारे में सोच रही है। कानून में कोई भी परिवर्तन करने से पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता की राय हमेशा तर्क-संगत और न्याय-सम्मत नहीं होती। जनता की राय को कानून और न्याय की कसौटी पर परखना प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है।  निर्णय लेते समय उसी जनमत को महत्त्व दिया जाना चाहिए, जो प्रगतिशील और विवेकपूर्ण हो और सामुदायिक विकास और मानवता के सामूहिक मापदंडों पर खरा उतरता हो। वरना भीड़-तंत्र जनमत का अपहरण करके लोकतंत्र को मजबूरी की जंजीरों में जकड़ लेगा और तालिबानी और खाप-मानसिकता न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बनने लगेगी। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की जरूरत है।

किशोर अपराधियों को वयस्क अपराधियों से अलग रख कर उनके साथ न्याय करने की अवधारणा का मूल सिद्धांत यह है कि अठारह वर्ष की उम्र तक व्यक्तिका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पूर्ण नहीं होता है। उसे अच्छे-बुरे और गुण-दोष को परखने के लिए आवश्यक ज्ञान नहीं होता है। उसका आपराधिक मंतव्य अपरिपक्व और अपूर्ण होता है। किशोर के कुकृत्य को आपराधिक-मानसिकता का प्रतिफल मान लेना उचित नहीं होगा। अपराध-विज्ञानियों का मत है कि आधी-अधूरी अपराध-मानसिकता पर आधारित कुकृत्य को अपराध नहीं, व्यवहार-विचलन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। तर्क में दम प्रतीत होता है। फिर क्या यह न्याय-सम्मत होगा कि अपराध की गंभीरता को आधार बना कर अधूरी आपराधिक मानसिकता को संपूर्ण मानते हुए किशोरावस्था की उम्र घटा दी जाए? अगर ऐसा किया जाता है तो यह किशोर-न्याय की मूल अवधारणा के विरुद्ध होगा।

समाजशास्त्री और अपराध-विज्ञानी चिंतित हैं कि पिछले एक दशक से समाज में यह सोच विकसित हो रहा है कि कठोर सजा देकर ही अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। कठोर सजा देकर अपराधों को रोकने की अवधारणा उन्नीसवीं शताब्दी में ही नकार दी गई थी। पर उसके कुछ कीटाणु अब भी जन-मानसिकता में स्थापित हैं जो संगीन अपराध की पृष्ठभूमि में पुन: जीवित हो जाते हैं। दुनिया भर में विधि-शास्त्र का यही तकाजा है कि सुधरने योग्य अपराधियों को सजा के बजाय सुधार प्रक्रिया से गुजार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के अवसर प्रदान किए जाएं। यह स्थापित सिद्धांत किशोर अपराधियों की बाबत सबसे ज्यादा लागू होता है। संगीन अपराधों में संलिप्त किशोरों को कठोर सजा देने के पक्षधर इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को समझने में चूक कर बैठते हैं कि सजा की कठोरता नहीं, सजा की सुनिश्चितता अपराधों को रोकने में ज्यादा कारगर साबित हो सकती है। और यह एक हकीकत है कि वर्तमान कानून में किशोरों की सजा लगभग सुनिश्चित होती है।

किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के स्थान पर नया कानून लाने से पहले यह समीक्षा करना भी जरूरी हो जाता है कि पुराने कानून में क्या कमी रह गई थी? सच्चाई यह है कि कानून में कमी नहीं थी, बल्कि संबंधित कानून के अधिकतर प्रावधानों को लागू ही नहीं किया जा सका है। इस कानून के बन जाने के तेरह वर्ष बाद भी पुलिस, अभियोजन पक्ष, अधिवक्ताओं, दंडाधिकारियों और अदालतों को कानून के प्रावधानों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। किशोरों के विरुद्ध दर्ज हो रहे लगभग तीन चौथाई मुकदमे ऐसे हैं जो दर्ज ही नहीं होने चाहिए थे। किशोरों की दो तिहाई गिरफ्तारियां गैर-कानूनी हैं। किशोरों को सरकारी संरक्षण में रखने के लिए कानून में बताई गई व्यवस्था कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इस कानून के लगभग अस्सी प्रतिशत प्रावधान देश में लागू ही नहीं हो पाए हैं। फिर यह समझ से परे है कि पुराना कानून बदल कर नया कानून लाने की तैयारी क्यों चल रही है?

कानून बनाने वालों को कानून लागू करने वालों से यह जरूर पूछना चाहिए कि अब तक जिला मुख्यालयों पर किशोर अपराधियों को रखने के लिए ‘निरीक्षण गृह,’ ‘विशेष गृह,’ ‘सुरक्षित स्थान,’ ‘बाल भवन,’ और देखभाल के बाद रखने के लिए कानून-सम्मत मुकम्मल व्यवस्था क्यों उपलब्ध नहीं है। सामुदायिक सेवा, परामर्श केंद्र और किशोरों की सजा से संबंधित अन्य साधन अभी तक क्यों विकसित नहीं हो पाए हैं? कितने प्रतिशत किशोर बार-बार अपराधों में शामिल हो रहे हैं और क्यों? राज्य का संरक्षण पाने के हकदार कितने बच्चों को सरकारी संरक्षण में रखने के उचित साधन राज्यों के पास हैं? इन प्रश्नों का सही उत्तर मिलने के बाद ही इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा कि क्या पुराने कानून को बदलने की जरूरत है? हमें यह समझ लेना चाहिए कि अगर कानून पूर्ण रूप से लागू ही नहीं होंगे तो उन्हें बार-बार बदलने से कोई फायदा नहीं होने वाला है।

किसी भी कानून को बदलने से पहले उसके प्रभाव का आकलन जरूरी होता है। उच्च स्तर पर निगरानी करके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कानून का एक-एक प्रावधान सत्यनिष्ठा से क्रियान्वित किया गया है। फिर यह समीक्षा होनी चाहिए कि कानून अपने निर्धारित उद्देश्यों में कितना सफल हो पाया है? इसके बाद ही यह निर्णय होना चाहिए कि उस कानून को बदलने की जरूरत है, या नहीं। कानून आपराधिक मंशा को सजा देता है, न कि व्यक्तिको। दस से अठारह वर्ष की उम्र के बच्चों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत है, जबकि इस उम्र के किशोरों की कुल घटित अपराधों में भागीदारी लगभग एक प्रतिशत है।

यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि बचपन अबोध होता है। आपराधिकता बच्चों का स्वाभाविक गुण नहीं है। किशोर किसी के बहकावे में आकर, अज्ञानवश या उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपराध करते हैं। इसके लिए सामान्य कानूनों के तहत उन्हें दंडित करना उचित नहीं होगा। दंड उन लोगों को मिलना चाहिए जो किशोरों को बहकाने या उनका उचित लालन-पालन करने में कोताही बरतते हैं।अपराध जगत में प्रवेश कर गए किशोरों को सुधार कर सही रास्ते पर लाना राष्ट्रीय दायित्व है। उन्हें अपराधियों की तरह कारागार में ठूंसने के उपाय ढूंढ़ना अपरिपक्व सोच का ही परिचायक कहा जा सकता है।

वर्तमान किशोर न्याय अधिनियम, 2000 बहुत सोच-समझ कर बनाया गया है। इसमें किशारों और बच्चों के संपूर्ण विकास को ध्यान में रखा गया है। अलबत्ता शायद धन और शासकीय प्राथमिकता के अभाव में यह कानून ठीक से लागू नहीं हो पाया है। इसे बदलने से कुछ नहीं होगा। अपराध-मानसिकता के मूल कारणों को समझते हुए उन्हें दूर करने के उपाय करना, कानून में कठोर सजा के प्रावधान करने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर किशोरों के मामलों में। बचपन को नाथने की जिद में बचपन को छोटा करना गलत अवधारणा है। अपराध की गंभीरता को आधार बना कर किशोरों का वर्गीकण करना और भी अधिक गलत सोच का परिचायक है। अगर ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमारी भरी गई हामियां झूठी पड़ जाएंगी। अनेक किशोर सभ्य समाज का हिस्सा बनने के

अपराध एक प्रकार का आत्मप्रकाशन तथा व्यवहार है। किशोर अवस्था के अपराध भी स्वाभाविक व्यवहार के ढंग हैं, केवल उनका परिणाम समाज तथा व्यक्ति के लिये अहितकर होता है। अत: समाज को इस अहितकर स्थिति से बचाने के लिये मनावैज्ञानिक की सहायता से अभिभावकों तथा अध्यापकों को यह देखना होगा कि बच्चे के अपराधी आचरण की कारणभूत कौन सी असंतोषजनक स्थितियाँ विद्यमान है। रोग के कारण को दूर कर दीजिए, रोग दूर हो जाएगा, यह चिकित्साशास्र का सिद्धांत है। अपराधी व्यवहार भी सामाजिक रोग हे। इसके कारण असंतोषजनक स्थिति को दूर करने पर अपराधी व्यवहार स्वयं समाप्त हो जाएगा और अपराधी बालक बड़ा बनकर समाज का योग्य सदस्य तथा देश का उत्तरदायित्वपूर्ण नागरिक बन सकेगा।

 

 

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