चीलिंग यूनिट की आपूर्ति अब पूरी होने की कगार पर : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

प्रत्येक नए पौधों में 15-20 लिटर पानी पर्याप्त : बागवानी विशेषज्ञ डॉ. भारद्वाज

  • चीलिंग यूनिट की आपूर्ति अब पूरी होने की कगार पर
स्वस्थ , शशक्त स्पर

स्वस्थ , शशक्त स्पर

इस वर्ष सर्दियों के महीनों में केवल दो-तीन बार ही हिमपात हुआ है और यह सामान्य से बहुत ही कम है। हिमपात भी 10-65 सें.मी. तक हुआ है। लेकिन इस बार हिमपात कम होने के कारण भूमि में नमी की मात्रा भी कम है हालांकि वर्षा जल की कुछ मात्रा की प्राप्ति के कारण शीतोष्ण फलों में आवश्यक जल मात्रा की आपूर्ति कुछ स्तर तक हो पाई है। हिमपात के कारण एक मुख्य लाभ जो शीतोष्ण फल पौधों को मिल पाया है वह है चीलिंग यूनिट की  आपूर्ति, जो अब लगभग पूरी ही होने की कगार पर है। अभी 24-25 फरवरी को भी वर्षा व हिमपात की कुछ संभावना है और चीलिंग यूनिट की पूर्ति इस माह के अंत या मार्च के पहले सप्ताह तक पूरी हो जाएगी। यह निश्चित है इसलिए इसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

लम्बे, अधिक आयु के कमज़ोर स्पर

लम्बे, अधिक आयु के कमज़ोर स्पर

वर्षा जल कम होने के कारण नए पौधों के स्थापन का कार्य भी बागवानों द्वारा पूरा नहीं किया जा सका है। पौधों को मार्च के महीने तक बिना किसी संकोच के लगाया जा सकता है लेकिन पौधों के लगाते समय पर्याप्त नमी का  होना आवश्यक है। नमी कम होने पर पौधों के सूखने का भय बना रहता है। अत: पौधे तभी लगाएं जब भूमि में सही नमी हो। जिन स्थानों पर पानी की व्यवस्था उपलब्ध है वहां पौधे लगाए जा सकते हैं और इन पौधों को 7-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। प्रत्येक नए पौधों में 15-20 लिटर पानी पर्याप्त है।

  • कांट-छांट कार्य पूरा होने पर वोर्डो मिक्चर जिसमें 2 किलो नीला थोथा तथा दो किलो चूना मिलाया जाता है
बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

को 200 लिटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें, अभी इस छिडक़ाव को किया जा सकता है। इस छिडक़ाव से कैंकर रोग तथा अन्य फफूंद जनित रोगों को नियंत्रण करने में सहायता मिलती है और यह 85-90 दिन तक असरदार रहता है। बीमों की कांट-छांट विशेषकर 1 ईंच (2.5 सें.मी.) से अधिक लंबे जो पिछले 5-6 वर्षों से फल दे रहे हों, काट कर छोटा करें। बड़ी आयु के सेब बागीचों में 4-8 ईंच (10-20 सें.मी.) तक लंबे हो जाते हैं और यह सीधे न होकर छोटी-छोटी बीमें रूपी शाखओं में विभाजित हो जाते हैं। यह बीमें भोजन तो पूरा कर लेते हैं परंतु गुणवत्ता युक्त फल उत्पन्न नहीं कर पाते। इस प्रकार के बीमों को नया व सशक्त बनाना आवश्यक होता है जिससे अच्छी फल की प्राप्ति की जा सके। यह याद रखें कि कमजोर बीमे गुणवत्ता विहिन फल ही पैदा करते हैं और सशक्त व स्वस्थ बीमों से ही गुणवत्ता फल प्राप्ति की जा सकती है। अधिकतर बागवान इस पहलू पर ध्यान नहीं देते और कमजोर फल का ही उत्पादित कर पाते हैं। यदि बीमों की कांट-छांट कई वर्षों से ही नहीं की गई है तो केवल 35 प्रतिशत तक ही इनमें सुधार करें यानि पूरे बागीचे के बीमों में तीन वर्षों में सुधार करके इन्हें नयापन देकर स्वस्थ करके अच्छा फल प्राप्त किया जा सकता है। अत: बीमों की कांट-छांट पर विशेष ध्यान दें और यह कार्य आजकल सफलता पूर्वक किया जा सकता है। कांट-छांट का यह कार्य उन बीमों में सबसे पहले करें जो सबसे पुराने हैं और अधिक लंबे हैं। यह कार्य पूरे पौधों में अधिक से अधिक 35 प्रतिशत ही करें। बाकि बचे बीमों को अगले वर्ष तथा उसके बाद के बीमों को तीसरे वर्ष में पूर्व करें। इस विधि से हर वर्ष फल की प्राप्ति होती रहेगी और पौधों में नए बीमों के बनने की प्रक्रिया भी सुचारू रूप से चलती रहेगी। तीन वर्ष के बाद सभी बीमें सशक्त, सुदृढ़ व स्वस्थ होंगे और फल उत्पादन में भी गुणात्मक सुधार देखने को मिलेगा।

अधिक स्पर संख्या

अधिक स्पर संख्या

ऐसे सेब व अन्य शीतोष्ण फलों के बागीचे जिनमें खाद या सुपर फास्फेट की मात्रा नहीं डाली गई है, नमी के मिलने तक रूके रहें, नमी की उपलब्धता होने पर खाद व उर्वरकों का प्रयोग स्वीकृत मात्रा में करें। अगर नमी देरी से मिलती है तो इस कार्य को मार्च में भी किया जा सकता है। यह इसलिए आवश्यक है कि अभी पौधों की नमी को बचाकर रखना महत्वपूर्ण है। खाद व उर्वरकों का लाभ भी पौधों को नमी मिलने के उपरांत ही है। गोबर की गली-सड़ी खाद 100 किलो.ग्रा. तथा सुपर फास्फेट 2 किलो 200 ग्राम प्रति पौधे की दर से प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त क्यूरेट आफ पोटाश 1.500 ग्राम प्रति पौधे की दर से पौधों के बाहरी घेरे में तने से कम से कम 1 से 1.5 मीटर दूरी पर फैलाकर डालें और मिटटी की पर्त से ढक दें।

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