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केन्द्र प्रायोजित योजनाएं कृषि-विकास के लिए बनीं वरदान

प्रदेश में कृषि क्षेत्र में कार्यान्वित की जा रहीं दर्जन भर केन्द्र प्रायोजित योजनाएं कृषि-विकास की दिशा में वरदान सिद्ध हो रही हैं। राज्य सरकार ने आगामी पांच वर्षों में कृषकों की आय को दोगुणा करने के उद्देश्य से कृषि-विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की है।

प्रदेश में 90:10 प्रतिशत की भागीदारी से कार्यान्वित की जा रहीं इन महत्वपूर्ण योजनाओं का मुख्य उद्देश्य सिंचाई सुवधिओं को बढ़ावा देना, गौर-मौसमी सब्जियों के उत्पदान को प्रोत्साहित करना तथा प्रदेश में परम्परागत खेती के साथ-साथ नकदी फसलों को उगाने के प्रति किसानों को जागरूक करना है। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 5.42 लाख हैक्टेयर भूमि कृषि-योग्य है जिसमें से 80 प्रतिशत क्षेत्र सिंचाई के लिए वर्षार्ं पर आधारित है।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री कृषि-सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा मृदा परीक्षण कार्यक्रम जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के सफल कार्यान्वयन ने किसानों को विशेष रूप से प्रभावित किया है तथा उन्हें कृषि की नई तकनीकों को अपनाने तथा नकदी फसलों को उगाने के प्रति प्रेरित किया है। इससे कृषकों की आय में बदलाव देखने को मिल रहा है।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत, प्रदेश में पहली बार स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ जरूरत के अनुसार कृषि योजनाएं तैयार की जा रही हैं जिससे स्थानीय लोगों की भागीदारी तो सुनिश्चित हो ही रही है, बल्कि इससे कृषि क्षेत्र में 4 प्रतिशत विकास दर हासिल करने में भी मदद मिलेगी। इस योजना के तहत इस वर्ष लगभग 25.50 करोड़ रुपये केन्द्र से प्राप्त हो चुके हैं। इसके अलावा, 12.14 करोड़ रुपये की पांच परियोजनाएं भी स्वीकृत हुई हैं।

प्रदेश में ‘हर खेत को पानी’ उपलब्ध करवाने की अवधारणा से आरम्भ की गई ‘प्रधानमंत्री कृषि-सिंचाई’ नामक एक अन्य महत्वपूर्ण योजना के उत्साहवर्धक परिणाम सामने आने लगे हैं। इस योजना के तहत इस वर्ष 11.50 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। योजना के तहत कृषकों को खेत में हर बूंद का सदुपयोग करके उत्पादन बढ़ाने के प्रति प्रेरित किया जा रहा है।

कृषि उत्पादन में मृदा-परीक्षण के महत्व को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में कृषकों को निःशुल्क मृदा-परीक्षण सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है। अब तक, 6.15 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड कृषकों को उपलब्ध करवाए जा चुके है। प्रदेश में 11 स्थाई मृदा-परीक्षण प्रयोगशालाएं, 9 स्वाचालित परीक्षण-प्रयोगशालाएं तथा 47 मिनी प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं, जिसके माध्यम से कृषकों को परीक्षण की सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है। युवाओं को स्वरोज़गार अपनाने के उद्देश्य से अपनी मृदा-परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित करने के प्रति भी प्रेरित किया जा रहा है। ऐसे युवाओं को 25 लाख रुपये तक 40 प्रतिशत तक उपदान प्रदान किया जा रहा है।

कृषकों को मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में फसलों की क्षति पर उपलब्ध करवाने के लिए ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा’ एक महत्वपूर्ण योजना आरम्भ की गई है। इससे नकदी फसलें उगाने वाले कृषकों को बड़ी राहत पहुंची है। ऋण लेने वाले कृषकों के लिए यह बीमा योजना आवश्यक है जबकि अन्य कृषक इसे स्वैच्छा से अपना सकते हैं। टमाटर, अदरक, मटर, शिमला मिर्च तथा लहसुन जैसी फसलों को इस योजना में शामिल किया गया है। इस बीमा योजना की और विशेषता यह भी है कि इसमें खेतों में पड़ी फसलों को प्रतिकूल मौसम के कारण होने वाले नुक्सान की स्थिति में भी मुआबजा उपलब्ध करवाया जाता है।

प्रदेश में कार्यान्वित की जा रहीं फसलों में विविधता लाने के लिए ‘जिका’ तथा कृषि विस्तार गतिविधियों के लिए ‘आत्मा’ जैसी अन्य महत्वपूर्ण योजनाओं के सफल कार्यान्वयन के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं तथा कृषक नई कृषि-तकनीकी अपनाने तथा नकदी फसलें उगाने के प्रति बड़ी संख्या में आगे आए हैं। हिमाचल प्रदेश ने गैर-मौसमी सब्जियां उगाने तथा खुम्ब उत्पादन में पहले ही देश में नाम कमाया है ओर वह दिन दूर नहीं जब यह प्रदेश जैविक खेती में भी देशभर में एक अग्रणी राज्य के रूप में उभरेगा।

प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने पर भी सरकार विशेष ध्यान दे रही है तथा कृषकों को जैविक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाने के प्रति प्रोत्साहित किया जा रहा है। अब तक प्रदेश में लगभग 40 हजार कृषक जैविक खेती के लिए पंजीकृत किया जा चुके हैं तथा लगभग 22 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती होने लगी है, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है।

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