"श्री रघुनाथ" मन्दिर कुल्लू का इतिहास

“श्री रघुनाथ” मन्दिर कुल्लू का इतिहास

  • श्री रघुनाथ मन्दिर मंदिर की विशेषता, भगवान रघुनाथ जी के विषय में जानकारी

  • आज भी जगतसिंह के वंशज का बड़ा सुपुत्र श्री रघुनाथ जी का छड़ीदार

हिमाचल देवभूमि है। यहां पर अनेकों देवी-देवताओं का वास है। वास्तव में यहां बसे हर मंदिर में सभी देवी-देवताओं की अपनी खास महिमा है। करीब कुछ समय पहले मुझे भी कुल्लू-मनाली जाने का अवसर मिला। चुनावी दौर था बहुत अधिक काम की वजह से व्यस्तता भी अधिक थी, लेकिन बचपन से जिन प्रसिद्ध मंदिरों के विषय में अपने बड़े-बुर्जुगों से सुना जाता था वहां हर हाल में जाने का मन भी करता था। शायद यही वजह रही कि रघुनाथ जी ने मुझे बुलावा भेजा और उनके दर्शन करने का सौभागय मुझे प्राप्त हुआ। मंदिर के बारे और भगवान रघुनाथ के बारे में अब तक सुना था, लेकिन आज यहां पहुंचकर खुद मुझे देखने और पुजारी जी से सब जानने का अवसर प्राप्त हो गया। मैंने पढ़ा है उसके मुताबिक कुल्लू में श्री रघुनाथ के आगमन से पूर्व राजा लोग नाथ या शैव सम्प्रदाय को मानते थे। नाथ ही राजाओं के गुरू थे। नाथों की मुद्राओं की पूजा होती थी। मुद्रा दर्शन के बिना राजा भोजन ग्रहण नहीं करते थे।

  • राजा जगतसिंह के समय हुआ श्री रघुनाथ का आगमन

सत्रहवीं शताब्दी में एकाएक परिवर्तन हुआ। राजा जगतसिंह 1637-1662 के समय अवधि से श्री रघुनाथ का आगमन हुआ। राजा वैष्णव हुआ और राजमहल में तभी मनाया जाने लगा प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा। इसी दशहरे के साथ वादी के सभी देवता श्री रघुनाथ के पास हाज़री देने लगे। ठारा करडू यह 18 करोड़ देवता की बात आगे आई और सभी देवता देव शिरोमणि रघुनाथ के पास नमन करने लगे।

  • सन् 1637 ई. में कुल्लू की राजगद्दी पर बैठे राजा जगतसिंह

  • जब राजा को लगा ब्रह्महत्या का शाप

     राजा जगतसिंह के समय हुआ श्री रघुनाथ का आगमन  

    राजा जगतसिंह के समय हुआ श्री रघुनाथ का आगमन

     

  • राजा रोग निवारण के लिए गया फुहारी बाबा के पास

खैर शाम को आरती और रघुनाथ जी के दर्शन करने के बाद पुजारी जी के साथ हम मंदिर के प्रांगण में बैठ गए और उन्होंने हमें इस मंदिर की विशेषता और भगवान रघुनाथ जी के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एक ऐतिहासिक मन्दिर है जो राजा जगतसिंह के शासन काल 1637-62 में बना। वे सन् 1637 ई. में कुल्लू की राजगद्दी पर बैठे। वे बहुत प्रतापी तथा पराक्रमी राजा थे। नगर इस राज्य की राजधानी थी। राज्य की सीमा बड़ी होने के कारण मकड़हार में भी अस्थाई राजधानी थी। एक बार टिपरी गांव के ब्राह्मण दुर्गादत्त के विरूध उसी के रिश्तेदारों ने राजा के पास झूठी शिकायत की कि उसके पास एक पथा (लगभग एक किलोग्राम) सुच्चे मोती हैं। राजा ने अपने कर्मचारी दुर्गादत्त के पास भेजे। ब्राह्मण के पास मोती नहीं थे, परंतु राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। राजहठ के कारण ब्राह्मण को अपना सर्वनाश स्पष्ट दिखलाई दे रहा था। उन्हीं दिनों राजा मणिकर्ण की यात्रा पर गया। उसने मणिकर्ण से वापसी पर शरशाड़ी में मोती लाने का आदेश दिया। राजा जब मणिकर्ण से वापस आ रहा था, तब ब्राह्मण ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को घर में बंद कर दिया और उसे आग लगा दी। स्वयं छत पर बैठकर शरीर के अंगों को काट-काट कर आग में डालता गया तथा कहने लगा, ले राजा तेरे मोती। इस प्रकार ब्राह्मण परिवार सहित जलकर भस्म हो गया तथा राजा को उसकी ब्रह्महत्या का शाप लगा।

  • राजा ने की राजगद्दी पर नरसिंह भगवान की स्थापना

जब वह मकड़ाहार पहुंचा तो उसे भोजन में छोटे-छोटे कीड़े दिखाई देने लगे, जल खून के समान दिखाई देने लगा तथा कुष्ट रोग भी हो गया। इससे वह बहुत घबराया। उन्होंने बताया कि उन्हीं दिनों नगर के निकट झीड़ी नामक स्थान में कृष्णदास पयहारी वैष्णव सम्प्रदाय के सिद्ध महात्मा रहते थे। वे स्थानीय बोली में फुहारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे। राजा रोग निवारण के लिए फुहारी बाबा के पास गया। उन्होंने अपनी साधना-शक्ति से भोजन में कीड़े दिखाई देना तथा जल का खून के समान दिखाई देने का निवारण कर दिया। राजा इस चमत्कार से बहुत प्रभावित हुआ। महात्मा जी ने उसे नरसिंह भगवान की मूर्ति दी। राजा ने राजगद्दी पर नरसिंह भगवान की स्थापना की और स्वयं छड़ीवरदार के रूप में सेवा करने लगा।

  • रघुनाथ मन्दिर में पूजा के समय ही होते हैं माता सीता के दर्शन

  • कहा जाता है, अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाई गई थीं ये मूर्तियां

फुहारी बाबा ने कुष्ठ रोग निवारण के लिए राजा को अवध (वर्तमान अयोध्या) के त्रेतानाथ मंदिर से श्रीरामचन्द्र तथा सीता जी की मूर्तियां लाने के लिए कहा। ये वही मूर्तियां हैं जोकि श्रीरामचन्द्र जी ने स्वयं अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाई थीं। ये अंगुष्ट मात्र हैं। वैदिक रीति अनुसार जब भी किसी व्यक्ति की मूर्ति बनाई जाती है, वह अंगुष्ट मात्र ही होनी चाहिए, क्योंकि आत्मा का आकार अंगुष्ट मात्र माना गया है और इस मूर्ति का पर्दे में रहने का कारण यह है कि आत्मा देखी नहीं जा सकती। इस मंदिर में माता सीता जी की मूर्ति परदे में रहती है केवल पूजा के समय पुजारी कुछ क्षणों के लिए मूर्ति को हाथ में रखकर दर्शन करवाता है। यही इस बात का प्रमाण है कि ये मूर्तियां अश्वमेध यज्ञ के लिए बनवाई गई थीं।

पैंतालीस के लगभग उत्सव मनाए जाते हैं यहां

पैंतालीस के लगभग उत्सव मनाए जाते हैं यहां

  • राजा ने अपने राज्य की सारी जागीर श्री रघुनाथ जी को कर दी अर्पण और स्वयं बन गया उनका सेवक

अयोध्या से मूर्तियां लाने के लिए फुहारी बाबा ने सुकेत (वर्तमान सन्दरनगर) के राजा के पास रह रहे अपने शिष्य पण्डित दामोदर दास गोसाईं को बुलाया और राजा से एक हजार रूपए खर्च के दिलवाकर अयोध्या भेजा। दामोदर दास ने गुटका सिद्धि प्राप्त की थी। गुटके को मुंह में रखकर अदृश्य हो गया और अयोध्या पहुंच गया। वहां वह एक पुजारी का शिष्य बन गया तथा प्रतिदिन मन्दिर में आने-जाने लगा। कुछ समय तक पूजा-विधि को देखता रहा तथा समय पाकर मूर्तियों को उठाकर हरिद्वार पहुंचा। दामोदर दास को पूजा करते हुए पकड़ लिया और कहा कि तू मूर्तियां क्यों चुरा लाया? दामोदर दास ने उत्तर दिया कि मैं इन मूर्तियों को कुल्लू के राजा जगतसिंह के रोग निवारण के लिए ले जा रहा हूं। यदि विश्वास नहीं है तो मूर्तियों को उठा ले। जोधावर से वे मूर्तियां नहीं उठाई गई, लेकिन दामोदर दास ने उन्हें एक हाथ से उठा लिया। दामोदर दास ने उसे विश्वास दिलाया कि आपको राजा जगत सिंह से गुजारे की रकम भिजवा दिया करेंगें। जोधावर ने उन मूर्तियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भगवान आप भी हमारे बिना नहीं रह सकेंगे और वापस अयोध्या को लौट गया। दामोदर दास मूर्तियां लेकर कुल्लू की ओर चल पड़ा। मकड़हार पहुंचने पर राजा ने मूर्तियों का भव्य स्वागत किया तथा उन्हें राजगद्दी पर नरसिंह भगवान के साथ स्थापित कर दिया। इस अवसर पर श्री रघुनाथ जी के सम्मान में एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन भी किया गया। राजा प्रतिदिन पूजाविधि देखता और चरणामृत का सेवन किया करता। कुछ समय बाद वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया। वह इस अदभुत घटना से बहुत प्रभावित हुआ और अपने राज्य की सारी जागीर श्री रघुनाथ जी को अर्पण कर दी और स्वयं उनका सेवक बन गया।

  • अयोध्यावासी को मूर्तियों को हाथ लगाने की आज्ञा नहीं

दामोदर दास गोसाईं को मूर्तियां लाने के लिए राजा ने भूईण (वर्तमान भून्तर) नामक स्थान पर एक मंदिर बनवा दिया तथा चौरासी खार अनाज की पैदावार वाली जमीन मुआफी के रूप में दी। आज भी इस वंश के पण्डित सालीग्राम गोसाईं के घर में यह प्राचीन मंदिर विद्यमान है। राजा ने कोठी जगतसुख की कुल आय धर्मार्थ लगा दी। वह श्री रघुनाथ जी को प्रतिदिन एक रूपया और एक टका भेंट करता था। वर्ष भर में वैष्णव सम्प्रदाय के सभी उत्सवों पर दिल खोलकर खर्च करता था। लगभग पांच सौ रूपए की राशि प्रतिवर्ष अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर में पहुंचा दी जाती। राजा को दामोदर दास ने यह बतला दिया था कि जोधावर ने हरिद्वार में यह संकल्प लिया था कि भगवान आप हमारे बिना नहीं रह सकेंगें। कुछ समय पश्चात राजा को यह आशंका हुई कि मूर्तियों का गला सूख रहा है। उसने फुहारी बाबा के परामर्श से अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर के पुजारी तथा उसके परिवार को कुल्लू बुलाया। पुजारी को अपना गुरू धारण कर लिया। उसे जमीन की मुआफी का ताम्र पत्र भी दिया। वह उस परिवार का बहुत सम्मान करता था। इन्हें अयोध्यावासी कहा जाने लगा। अयोध्यावासी को मूर्तियों को हाथ लगाने की आज्ञा न थी, क्योंकि राजा को शक था कि कहीं ये मूर्तियां उठाकर वापस अयोध्या न ले जाए।

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