तापमान गिरावट के चलते बाग़ीचों में कांट-छांट का कार्य शुरू करना अनुचित : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

तापमान गिरावट के चलते बाग़ीचों में इस वक्त कांट-छांट का कार्य करना अनुचित : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

  •  जब फल-पौधों की पूरी पत्तियां भी नहीं गिरी हों, कांट-छांट पौधों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक
बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

 हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले पंद्रह दिनों से न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेल्सियस  के आसपास और अधिकतम तापमान 16 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है, यह इस कारण भी हुआ है कि ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं पर हल्का हिमपात हुआ है। लगातार तापमान की गिरावट के फलस्वरूप यह भी निश्चित है कि दिसंबर माह के मध्य तक तापमान में और गिरावट देखने को मिलेगी और यह संभावना है कि इस वर्ष शीत स्वॉप के लिए आवश्यक चिलिंग ऑवर्स अन्य वर्षों की अपेक्षा शीघ्र मिलने आरंभ हो जाएंगे। बरसात के बाद पिछले लगभग तीन महीनों से सूखे की स्थिति चल रही थी जिसके कारण बागवान व किसान वर्षा जल ना मिलने के कारण चिंतित थे। वर्षा न होने के कारण बागवान बागीचों में कोई भी कार्य नहीं कर पा रहे थे।

  • आजकल की कांट-छांट करने पर वुली ऐफ़िड, केंकर का बढ़ता है प्रकोप  

तापमान की इस गिरावट के फलस्वरूप कुछ बाग़वानों ने अपने सेब के बाग़ीचों में कांट-छांट का कार्य भी आरंभ कर दिया है जो सर्वथा अनुचित है। इतनी जल्दी जब फल-पौधों की पूरी पत्तियां भी नहीं गिरी हों, में की गई कांट-छांट पौधों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। ऐसे पौधों में आजकल की गई कांट-छांट के बाद वुली ऐफ़िड, केंकर का प्रकोप तो बढ़ता ही है, इसके अतिरिक्त कांट-छांट द्वारा हुए जख्मों की भरपाई भी नहीं हो पाती और पौधों में फल बनाने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है जिसके कारण ऐसे पौधों में हल्की क़िस्म के फल जो गुणवत्ता से परिपूर्ण नहीं होते, प्राप्त होते हैं और इन पौधों की आयु सामान्य से बहुत कम हो जाती है।

 

  • वुली ऐफ़िड के शरीर पर तेज़धार से छिड़काव करना अतिआवश्यक

आजकल वुली ऐफ़िड का प्रकोप सामान्य से अधिक दिखाई देता है क्योंकि कम वर्षा या हवा में कम आर्द्रता होने के कारण और तापमान14 डिग्री सेल्सियस से नीचे होने पर इस कीट

वुली ऐफ़िड का प्रकोप

वुली ऐफ़िड का प्रकोप

की जीव संख्या बहुत अधिक बढ़ती है और पौधों  के कटे-फटे या कोमल भागों पर सफ़ेद रूई के रूप में दिखाई देती है। यदि इस कीड़े की जीव संख्या बाग़ीचे में या पौधों पर अधिक दिखाई दे रही है तो इसमें किसी कीटनाशक का प्रयोग न करें अपितु इसे सामान्य पानी के छिड़काव द्वारा या आठ लीटर से दस लीटर गोमूत्र प्रति 190 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कने से भी संतोषजनक नियंत्रण मिलता है। इस स्थिति में केवल एक बात का ध्यान रखना अतिआवश्यक है कि जब भी छिड़काव करें तो वह वुली ऐफ़िड के शरीर पर तेज़धार के रूप में हो ताकि वह इसे अच्छी तरह से छू जाए जिससे उस पर नियंत्रण प्राप्त हो सके, हल्के फुहार वाली छिड़काव करने से इसमें पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं प्राप्त होगा। अतः इस कीट के सफल नियंत्रण के लिए छिड़काव विधि पर विशेष ध्यान देना अति आवश्यक है, हल्के से छिड़काव बिलकुल भी ना करें।

  • कांट-छांट का सही समय फरवरी माह

कांट-छांट का सही समय फरवरी महीने में होता है यानि कि पौधों में रस चलने से लगभग एक महीना पहले, इस समय की गई कांट-छांट द्वारा पौधों में किये गये जख्मों की भरपाई अतिशीघ्र हो जाती है जिससे कि पौधों में सफल बनाने की क्षमता प्रभावित नहीं होती और वुली ऐफ़िड तथा केंकर जैसे रोग भी पौधों पर पनप नहीं पाते। इसलिए इस बात का समझना अति आवश्यक है कि पौधों में कांट-छांट सही समय पर करें और पौधों की आयु को अनावश्यक कम न करें क्योंकि इन पौधों की विशेषकर सेब तथा अन्य शीतोष्ण फलों जैसे नाशपाती, चेरी, बादाम, खूमानी इत्यादि की आयु हमारे रख-रखाव पर निर्भर करती है और यह 50 से 60 साल तक एक पौधे से गुणवत्ता युक्त फल सुगमता से प्राप्त किए जा सकते हैं। यदि किसी कारणवश फरवरी महीने में कांट-छांट करना संभव नहीं है तो इस बात को अवश्य ध्यान रखें कि कांट-छांट का समय सामान्य तापमान सात डिग्री सेल्सियस से कम होने पर ही करना चाहिए अन्यथा इसके परिणाम हानिकारक होते हैं और पौधों की आयु व फल उत्पादन की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कांट-छांट का कार्य उपयुक्त समय आने पर ही करें।

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