नौणी विश्वविद्यालय ने मनाया 33वां स्थापना दिवस

नौणी विश्वविद्यालय ने मनाया 33वां स्थापना दिवस

  • विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के प्रयासों से ही राज्य आज ‘ऐप्पल स्टेट ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है : डॉ. एचसी शर्मा
  • युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित करने व पारंपरिक कृषि की चुनौतियों को संबोधित करने की जरूरत : डॉ. एचसी शर्मा
  • अनुसंधान एवं विकास संस्थानों और विश्वविद्यालयों में तालमेल की कमी : डा. गुप्ता

शिमला : डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी और वानिकी विश्वविद्यालय नौणी ने आज अपना 33वां स्थापना दिवस मनाया। पहली दिसंबर 1985 को विश्वविद्यालय की स्थापना औद्यानिकी, वानिकी और संबद्ध विषयों के क्षेत्र में शिक्षा,अनुसंधान और विस्तार शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।

इस अवसर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) में जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के सलाहकार और प्रमुख डॉ. अखिलेश गुप्ता, मुख्य अतिथि रहे। इस समारोह की शुरुआत हिमाचल के संस्थापक डॉ. वाईएस परमार, को श्रद्धांजलि देकर हुई।

इस मौके पर नौणी विवि के कुलपति डॉ. एचसी शर्मा ने विश्वविद्यालय का एक संक्षिप्त इतिहास और प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के प्रयासों से ही राज्य को आज ‘ऐप्पल स्टेट ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश के कृषि समुदाय ने सब्जियों के उच्च गुणवत्ता वाले बीज, औषधीय पौधों, फूलों, और पेड़ों की सामग्री, जो विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादित की जाती है में लगातार अपने विश्वास दिखाया है जिससे कारण ही हिमाचल भारत में बागवानी के क्षेत्र में खुद को स्थापित करने में कामयाब हुआ है।

डॉ. शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री के ‘किसानों की आय को वर्ष 2022 तक दोगुना करने के लक्ष्य’ के लिए वैज्ञानिकों को प्रौद्योगिकी और उत्पादन तकनीकों का विकास करने की जरूरत है ताकि किसानों को अपने उत्पाद के लिए अधिक लाभ और मौजूदा उत्पादों का मूल्य संवर्धन हो सके। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय माननीय राज्यपाल आचार्य देवव्रत द्वारा शून्य बजट खेती के लिए विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर रहा है। डॉ. शर्मा ने कहा कि युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित करने और पारंपरिक कृषि की चुनौतियां को संबोधित करने की जरूरत है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे रोजगार प्रदाता बनें और कृषि को एक उद्यम के रूप में देखें।

मुख्य अतिथि डा. अखिलेश गुप्ता ने ‘भारतीय हिमालय क्षेत्र के लिए क्षमता निर्माण पहल’ विषय पर सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र दुनिया के अन्य पर्वत श्रृंखलाओं से अलग है।

उन्होंने बताया कि भारत में 10 हिमालयी राज्य और दो आंशिक हिमालयी राज्य हैं। यह क्षेत्र काफी जटिल है और इनमें सामाजिक-सांस्कृतिक और जातीय विविधता और जैव विविधता है। इन क्षेत्र में, विशेषकर से कृषि क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना करता पड़ता है। देश के पूर्वोत्तर भाग में शहरी क्षेत्रों को पुरुष सदस्यों के प्रवासण, छोटी भूमि होल्डिंग्स, खराब गुणवत्ता वाली कृषि भूमि, सिंचाई की कमी, मानसून निर्भरता और सूखे और बाढ़ जैसी घटनाएं इस क्षेत्र की समस्याएं हैं।

राष्ट्रीय कृषि खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (एनएबीआई) के कार्यकारी निदेशक डॉ. टीआर शर्मा भी इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका पर चर्चा की। डॉ. टीआर शर्मा ने बताया कि आने वाले दशकों में आबादी के बढ़ने से हमें मौजूदा फसल किस्मों की क्षमता बढ़ाने के लिए काम करना पड़ेगा और जैव प्रौद्योगिकी,इस उद्देश्य को पूरा करने का एक उपकरण है।

उन्होंने सभा को बताया कि विश्व स्तर पर वर्ष 1996 में आनुवांशिक रूप से संशोधित फसलों (जीएम क्रॉप्स) का क्षेत्र 1.7 मिलियन हेक्टेयर था। 2016 में यह बढ़कर 185.1 लाख हेक्टेयर हो गया। उन्होंने कहा कि बागवानी फसलों और जीनोम एडिटिंग तकनीक के उपयोग से फसल के पकाने,फूल लगने का समय, कीट प्रतिरोध आदि चीज़ों पर कामयाबी पाई जा सकती है।

  • डीएसटी हिमालय विश्वविद्यालयों के लिए एक आर&डी कार्यक्रम लॉन्च करेगा

नौणी विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के मौके पर डॉ. अखिलेश गुप्ता ने बताया कि डीएसटी जल्द ही हिमालय विश्वविद्यालयों के लिए एक शोध और विकास कार्यक्रम का शुभारंभ करेंगे जिसमें उत्कृष्टता का केंद्र,जिसमें प्रमुख अनुसंधान एवं विकास तथा नेटवर्क कार्यक्रम शामिल होंगे।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि हिमालय पारिस्थितिकी तंत्र अनुसंधान के क्षेत्र में 1000 से ज्यादा वैज्ञानिक काम कर रहे हैं और 145 विश्वविद्यालय, 38 केंद्र सरकार के संस्थान और भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में 75 से अधिक राज्य स्तरीय संस्थान हैं।

उन्होंने कहा कि अनुसंधान एवं विकास संस्थानों और विश्वविद्यालयों में तालमेल की कमी है। इस प्रस्तावित मानव और क्षमता निर्माण कार्यक्रम में संभावित संस्थान जो उत्कृष्टता के केंद्रों की मेजबानी कर सकते हैं की पहचान होगी और नेटवर्क कार्यक्रम की स्थापना के लिए कुछ विषयगत क्षेत्रों का चयन भी होगा।

यह कार्यक्रम आईएचआर में अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिय केंद्र-राज्य वित्त पोषित संस्थानों के बीच संबंध स्थापित करेगा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और भागीदारी विकसित करेगा। दो दिवसीय कार्यक्रम और आईएचआर में आने वाले विश्वविद्यालयों के कुलपति की मीटिंग अगले साल मार्च में होने की संभावना है।

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