शिमला गुड़िया प्रकरण : अब दोषी की सजा पर सुनवाई 15 जून को होगी

मानव अधिकार: ऐसे हक जो हमारे जीवन और हमारे मान-सम्मान से जुड़े हों

मनुष्य योनि में जन्म लेने के साथ मिलने वाला प्रत्येक अधिकार ‘मानवाधिकार’ का श्रेणी में आता है। संविधान में बनाये गये अधिकारों से कहीं बढ़कर महत्व ‘मानवाधिकारों’ का माना जा सकता है।

कारण यह कि ये ऐसे अधिकार है जो सीधे सीधे प्रकृति से संबंध रखते है। मसलन जीने का अधिकार, कोई कानून सम्मत अधिकार नहीं, वरन समाज के हर वर्ग को प्रकृति द्वारा समान रूप से प्रदान किया गया है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते है कि प्रकृति के अलावा मनुष्यों द्वारा बनाये गये विधि सम्मत कानून का भी यही कर्तव्य है कि वह ‘मानवाधिकारों’ की रक्षा करें। हम यह देख रहे है कि हमारे इसी मानवीय समाज में ‘मानवाधिकारों’ का भय आम लोगों पर विशेष रूप से दिखाई नहीं पड़ रही है। प्रत्यक्ष उदाहरण के तौर पर हम आये दिन होने वाले महिला प्रताड़ना मामलों को ले सकते है। हमारे सांस्कृतिक सभ्यता वाले महान देश में प्रतिदिन हजारों कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं हमारी संस्कृति को शर्मसार रही है। इतना ही नहीं इस मानवीय समाज को रचने वाली महिलाएं भी लाखों की संख्या में दहेज की बलि चढ़ायी जा रही है। महिलाओं के यौन शोषण मामलों में वृद्धि के साथ ही साथ कम उम्र की बालिकाओं को समय से पूर्व अवैध मातृत्व के कारण आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ रहा है। इतना कुछ होने के बाद भी हम ‘मानवाधिकार’ कानून की दुहाई देते नहीं थक रहे हैं। सच्चाई की धरातल पर खड़े हम ऐसे ही अपराधों पर नियंत्रण के लिए ‘मानवाधिकार’ के रक्षकों से केवल गुहार ही लगा पा रहे हैं।
10 दिसंबर सन् 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा अस्तित्व में लाये गये ‘मानवाधिकार’ ने अब तक 67 वर्ष की यात्रा पूरी कर ली है। इन अधिकारों के जन्म लेने के साथ ही इसमें शामिल सदस्यों का यह कर्तव्य बन गया है कि वे ‘मानवाधिकारों’ का संरक्षण और उनकी देखभाल करें। वास्तव में देखा जाये तो मानवीय जीवन और अधिकार की रक्षा उस देश के ‘मानवाधिकार’ कानूनों के लिए गौरवान्वित करने वाली बात होती है। वर्तमान में हमारे देश में ‘मानवाधिकारों’ की स्थिति वास्तव में जटिलता में देखी जा रही है। ‘मानवाधिकारों’ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका हनन राजनैतिक कारणों के अतिरिक्त धार्मिक मुद्दों पर भी किया जा रहा है। धर्म एक ऐसा मार्ग है जो प्रत्येक जाति वर्ग को प्रेम और स्नेह से रहना सिखाता है। आज उसी धर्म के नाम पर कट्टरता का प्रचार प्रसार करते हुए हिंसा के कारण लोग बेवजह मारे जा रहे है। ‘मानवाधिकारों’ से भारतवर्ष का नाता बहुत पुराना है। हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को अपना सूत्र वाक्य मानते है। संपूर्ण विश्व में भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है जिसने दुनिया को ‘जीयो और जीने दो’ का आदर्श वाक्य देते हुए आपसी प्रेम स्नेह का संचार करने में बड़ी भूमिका का निर्वहन किया है।
आज के परिप्रेक्ष्य में ‘मानवाधिकार’ और उसकी रक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनकर सार्वभौमिक सत्यता को जन्म दे रहा है। मानव समाज के प्रत्येक सदस्य को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिया गया यह अधिकार अब अपने ही संरक्षण के लिए हम सभी से सहयोग की अपील करता दिखायी पड़ रहा है। समयांतर के दृष्टिकोण से ‘मानवाधिकारों’ का सम्मान एक गंभीर चिंतन का विषय बना हुआ है। परस्पर सद्भाव के द्वारा ही हम मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी ओर से गारंटी दे सकते है। संपूर्ण मानवीय प्रजाति को प्रदान किये गये इस अधिकार की गहराई में जाकर चिंतन करें तो आतंकवाद और नक्सलवाद ही ‘मानवाधिकार’ के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में दिखाई पड़ रहे है। इसका दूसरा पक्ष अशिक्षा के रूप में भी समाज के समक्ष आ रहा है। भारतवर्ष के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव अभी भी हमें साल रहा है। यही कारण है कि लोग शिक्षित न होने के कारण ‘मानवाधिकारों’ के हनन किये जाने पर उसका विरोध भी नहीं कर पा रहे है। अक्षर ज्ञान का अभाव ग्राम्यजनों को अधिकारों से अवगत भी नहीं होने दे रहा है। समय-समय पर ‘मानवाधिकारों’ की सुरक्षा के लिए प्रयास किये जाते रहे है। इसी तारतम्य में सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पारित कर किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की निंदा करते हुए उसे अमानवीय करार दिया गया। सन् 1993 से 2003 तक के दशक को इसी कारण नस्लवाद विरोध दशक के रूप में मनाने का निर्णय भी लिया गया।

 'मानवाधिकार' संबंधी घोषणाओं को जमीनी सच्चाईयों में बदलना होगा

‘मानवाधिकार’ संबंधी घोषणाओं को जमीनी सच्चाईयों में बदलना होगा

महिला अधिकारों के संरक्षण को तवाो देते हुए सन् 1993 में एक प्रस्ताव के माध्यम से उन्हें मजबूती दी गयी। शिशु अधिकारों को बल प्रदान करने के लिए सन् 1959 तथा सन् 1989 में विशेष प्रबंध बनाये गये। जिसमें विशेष रूप से शिशु के जीवन यापन के अधिकार से लेकर उसके संरक्षण के अधिकार तक की विस्तृत चर्चा की गयी। इसी प्रकार अल्प संख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए भी महासभा ने समय-समय पर चिंतन किया है। इसके अतिरिक्त मजदूरों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा के प्रावधान भी ‘मानवाधिकारों’ में शामिल किये गये। भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, यौन शोषण, शारीरिक उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और बलात्कार जैसे दानवों से घिरी आधी दुनिया ‘मानवाधिकारों’ की जरूरत को रेखांकित करते करते अक्सर थक सी जाती है। इन सारी समस्याओं से आगे बढ़ते हुए आदिवासियों के भू अधिकारों की समस्या और वनवासियों को उजाड़े जाने की दास्तां भी ‘मानवाधिकारों’ की चर्चा को आवश्यक और प्रासंगिक बनाती है। तमाम आदिवसी और वनवासी सैकड़ों वर्षों से वनों और उनके आसपास के इलाकों में निवास कर रहे है। इनके परंपरागत अधिकारों और ‘मानवाधिकारों’ की समुचित पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है, और आज तक उन्हें चकबंदी, सीलिंग, पट्टे, भू अभिलेख या भूमि आबंटन का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाया है। हैरत की बात यह है कि सभी को समान मानने वाली इस व्यवस्था की सरकार इस बात को आसानी से स्वीकार कर लेती है। इन वर्गों को अब तक वास्तविक लाभ से वंचित ही रखा गया है।
‘मानवाधिकार’ और वर्तमान में उनकी दशा पर इतनी व्यापक चर्चा किये जाने के बाद भी यह विषय अधूरा ही रह गया है। कारण यह कि मानव समाज में जो समस्याएं उपस्थित है उनसे निपटना ही ‘मानवाधिकार’ की संकल्पना का लक्ष्य है। सूखा, बाढ़, गरीबी, अकाल, सुनामी, भूकंप, युद्ध या दुर्घटनाओं के चलते जो लोग शिकार हो रहे है, पीड़ित या परेशान चल रहे है उनके ‘मानवाधिकारों’ का ध्यान रखा जाना अपेक्षित जान पड़ रहा है। इन सारे मामलों में कानून को भी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करना होगा। विकास के साथ मानवता के आपसी रिश्तों को भी रेखांकित करना होगी न कि विकास के नाम पर किये जा रहे निर्माण के बाद लोगों को बे-घर बार कर दिया जाये? अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियों की भी आवश्यकता है। ‘मानवाधिकार’ संबंधी घोषणाओं को जमीनी सच्चाईयों में बदलना होगा। जिससे ऐसी घोषणाएं महज दस्तावेजी बनकर न रह जाये। शायद इन्हीं सब बातों में ‘मानवाधिकार’ दिवस की सार्थकता भी निहित है। हमारे देश की सरकार ‘मानवाधिकार’ को लेकर सजग है, किंतु इस सजगता में और अधिक धार लाने की जरूरत है।

Pages: 1 2 3

सम्बंधित समाचार

16 Responses

Leave a Reply
  1. अनिल कुमार
    Sep 21, 2016 - 04:57 PM

    हमे और हमारे इस संगठन मे कार्यकर्ताओं को बल मिलेगा

    तुरन्त सुझाव दें ताकि समाज मे पनप रहे भ्रष्टाचार को समाप्तिकरण कर सके हमारी संगठनों के सदस्य

    Reply
  2. Bharti kumari
    Sep 25, 2016 - 11:10 PM

    Sir i am a teacher I want to know is there any relaxation in working hour of that lady who has small kid below five six month because we have only 135days maternity leave. Please help me sir

    Reply
  3. khemsagarpatel
    Nov 08, 2016 - 05:29 PM

    बहुत आच्छा हे। पुस्तक
    अपना अधिकार जानाकारी हुआ।
    मे बहुत खुश हू जी कि आपना लिखा ।कोई

    Reply
  4. Anmol sharma
    Nov 10, 2016 - 01:39 AM

    Mai yae Khana chata hu ki Jo humare smj mai Jo ladkiya hai shadi Kay bad unko Kisi cheez kay leya tang kayu Kiya jata hai Kya vo kisi ki beti nhi hai bs mai itna chata hu ki ladkiyo ki izt ki Jay or unka sman Kiya jay

    Reply
  5. देवेंद्र सिंह
    Nov 17, 2016 - 08:34 AM

    बहुत ही अच्छी जानकारी मिली , लेकिन इसके साथ साथ मानवाधिकार हनन की शिकायत आयोग मे कैसे कर सकते हैं की जानकारी उदाहरण स्वरूप दी जाए तो और भी अच्छा रहेगा !

    Reply
  6. Anuradha sikarwar
    Nov 22, 2016 - 02:54 PM

    I need your help plz help me

    Reply
  7. प्रदीप सारंग
    Dec 10, 2016 - 09:11 AM

    बहुत ही सार गर्भित जानकारी दी गई है।
    धन्यवाद।
    पढ़कर ज्ञान बढ़ा।

    Reply
    • मीना कौंडल
      Dec 10, 2016 - 08:53 PM

      धन्यवाद सर जी।

      Reply
  8. राधेश्यामविश्वकर्मा
    Dec 13, 2016 - 07:27 AM

    आपकी जानकरी बहुत अछी लगी हे आपको बहुत बहुत धन्यवाद यदि कोई वरिष्ट अधिकारी मानवाधिकर का दूर अपयोग करता हे तो उसकी शिकायत कहा और कैसे करे ये और उस पर कितने दिनों में कार्यवाही हो सकती हे और उसके लिए क्या क्या सबूत की आवश्यकता होती हे शिकायतकर्ता को कृपया कर के बताए

    Reply
  9. Vishal Gupta
    Dec 17, 2016 - 10:49 PM

    National human rights ko apna what’s app complaint number launch krna chahiye jisse lo aasani se apni complaint pahucha sake

    Reply
  10. vinod dangi
    Dec 31, 2016 - 05:58 AM

    सर जैसे कि अर्ध सैनिक बलों में आपतकाल स्थिति ना होने पर जवानों से कितनी कितनी ड्यूटी ले सकते हैं और जैसे कि अर्ध सैनिक बलों में कुछ जवान अधिकारियों के खास हो जाते हैं और कोई ड्यूटी भी नहीं देते वह रजिस्टर मैं भी उनकी कोई ड्यूटी भी नहीं दी जाती है अगर कोई जवान शिकायत करता है तो उसके खिलाफ सभी अधिकारी मोर्चा संभाल लेते हैं उसके साथ सभी अधिकारी मानसिक रुप से परेशान करते हैं टाइम से छुट्टी नहीं दे पाते और सभी जितने भी कोर्स हैं उसमें उसी को डालते रहता है सर इसके लिए कोई कानून या कोई अधिकार है

    Reply
  11. dharmendra soni
    Jan 01, 2017 - 10:33 PM

    I want to join you

    Reply
  12. Aman Tendulkar
    Jan 02, 2017 - 06:50 PM

    क्या कोई भी आम नागरिक अपने राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री से मिल सकता है ? यदि हाॅ तो कैसे?

    Reply
  13. Shivendra singh
    Jan 10, 2017 - 11:17 AM

    Bhut achhi jankari mili . main chahta hu Ki is I prakar se aao gyanwardhan karte rahe. Thank you

    Reply
  14. दुर्गेश सूर्यवंशी
    Apr 27, 2017 - 12:31 PM

    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने

    Reply
  15. Rupesh patel
    Sep 12, 2017 - 06:29 PM

    👌👌

    Reply

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

82  −    =  76