मानव अधिकार: ऐसे हक जो हमारे जीवन और हमारे मान-सम्मान से जुड़े हों

 

अधिवक्ता - रोहन सिंह चौहान

अधिवक्ता – रोहन सिंह चौहान

हर व्यक्ति को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। मानव अधिकार का मतलब है ऐसे हक जो हमारे जीवन और हमारे मान-सम्मान से जुड़े हों। मानव अधिकार जो कानून के तहत आते हैं। इसी विषय पर इस बार हमें जानकारी दे रहें हैं हमारी कानून व्यवस्था कॉलम के लिए शिमला के अधिवक्ता रोहन सिंह चौहान।

मानव अधिकार आयोग की स्थापना 2 अक्टूबर 1993 में हुई। जिसके उद्देश्य नौकरशाही पर रोक लगाना, मानव अधिकारों के हनन को रोकना तथा लोक सेवक द्वारा उनका शोषण करने में अंकुश लगाना। मानवाधिकार की सुरक्षा के बिना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी खोखली है मानवाधिकार की लड़ाई हम सभी की लड़ाई है। विश्वभर में नस्ल, धर्म, जाति के नाम मानव द्वारा मानव का शोषण हो रहा है। अत्याचार एवम जुल्म के पहाड़ तोड़े जा रहे हैं। हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् धर्म एवम जाति के नाम पर भारतवासियों को विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है। आदमी गौर हो या काला, हिन्दू हो या मुस्लमान, सिख हो या ईसाई, हिंदी बोले या कोई अन्य भाषा सभी केवल इंसान हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित मानवाधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार है। मानव अधिकार का मतलब ऐसे हक़ जो हमारे जीवन और मान-सम्मान से जुड़े हैं। ये हक़ हमें जन्म से मिलते हैं, हम सब आज़ाद हैं। साफ़ सुथरे माहौल मैं रहना हमारा हक़ है । हमें इलाज़ की अच्छी सहूलियत मिले। हमें और हमारे बच्चों को पढाई-लिखाई की अच्छी सहूलियत मिले। पीने का पानी साफ मिले। जाति, धर्म, भाषा-बोली के कारण हमारे साथ भेदभाव न हो। हमें हक़ है की हम सम्मान के साथ रहें। कोई हमें अपना दस या गुलाम नहीं बना सके। प्रदेश में हम कहीं भी बेरोकटोक आना-जाना कर सकते हैं। हम बेरोकटोक बोल सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने से किसी के मान-सम्मान को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। हमें आराम करने का अधिकार है। हमें यह तय करने का अधिकार है की हमारे बच्चे को किस तरह की शिक्षा मिले। हर बच्चे को जीने का अधिकार है, उसे अच्छी तरह की शिक्षा मिले। यदि हमें हमारा हक़ दिलाने मैं सरकारी महकमा हमारी मदद नहीं कर रहा है तो हम मानव अधिकार आयोग में शिकायत कर सकते हैं। आयोग में सीधे अर्जी देकर शिकायत कर सकते हैं।इसके लिए वकील की जरूरत नहीं है। शिकायत किसी भी भाषा या बोली में कर सकते हैं हिंदी में हो तो अच्छा है। शिकायत लिखने के लिए कैसे भी कागज़ का इस्तेमाल करें, स्टैम्प पेपर की कोई जरूरत नहीं होती। आयोग के दफ्तर में टेलीफोन नम्बर पर भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

 

मानव अधिकार

मानव अधिकार

एनडी मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।

  • 1829 – राजा राममोहन राय द्वारा चलाए गए हिन्दू सुधार आंदोलन के बाद भारत में ब्रिटिश राज के दौरान सती प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
  • 1929 – नाबालिगों को शादी से बचाने के लिए बाल विवाह निरोधक कानून पास हुआ।
  • 1947 – ब्रिटिश राज की गुलामी से भारतीय जनता को आजादी मिली।
  • 1950 – भारतीय गणतंत्र का संविधान लागू हुआ।
  • 1955 – भारतीय परिवार कानून में सुधार। हिन्दू महिलाओं को मिले और ज्यादा अधिकार।
  • 1973 – केशवानंद भारती वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान संशोधन द्वारा संविधान के मूलभूत ढाँचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। (जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त कई मूल अधिकार भी शामिल हैं)
  • 1989 – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से सुरक्षा) एक्ट 1989 पास हुआ।
  • 1992 – संविधान में संशोधन के जरिए पंचायत राज की स्थापना, जिसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू हुआ। अजा-अजजा के लिए भी समान रूप से आरक्षण लागू।
  • 1993 – प्रोटेक्शन ऑफ मून राइट्स एक्ट के तहत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना।
  • 2001 – खाद्य अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त आदेश पास किया।
  • 2005 – सूचना का अधिकार कानून पास।
  • 2005 – रोजगार की समस्या हल करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पास।
  • 2005 – भारतीय पुलिस के कमजोर मानव अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए।

मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा

10 दिसंबर 1948 को यूनाइटेड नेशन्स की जनरल एसेम्बली ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया। इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही एसेम्बली ने सभी सदस्य देशों से अपील की कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों या प्रदेशों की राजनीतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना विशेषतः स्कूलों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में इसके प्रचार, प्रदर्शन और व्याख्या का प्रबंध करें। इस घोषणा में न सिर्फ मनुष्य जाति के अधिकारों को बढ़ाया गया बल्कि स्त्री और पुरुषों को भी समान अधिकार दिए गए। मानव अधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिश्ठा से जुड़े हुए हैं। यह अधिकार भारतीय संविधान के भाग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किये गये हैं और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है । इसके अलावा ऐसे अधिकार जो अंतर्राष्ट्रीय समझौते के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा स्वीकार किये गये है और देष के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है, को मानव अधिकार माना जाता है । इन अधिकारों में प्रदूशण मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार, अभिरक्षा में यातनापूर्ण और अपमानजनक व्यवहार न होने संबंधी अधिकार, और महिलाओं के साथ प्रतिश्ठापूर्ण व्यवहार का अधिकार शामिल है।

जांच कार्य से संबंधित प्राप्त अधिकार

अधिनियम के अन्तर्गत किसी शिकायत की जांच करते समय आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता-1908 के अन्तर्गत सिविल न्यायालय के समस्त अधिकार प्राप्त हैं। विषेश रूप से संबंधित पक्ष को तथा गवाहों को सम्मन जारी करके बुलाने तथा उन्हें आयोग के सामने उपस्थित होने के लिए बाध्य करने एवं शपथ देकर परीक्षण करने का अधिकार, किसी दस्तावेज का पता लगाने और उसको प्रस्तुत करने का आदेष देने का अधिकार, षपथ पर गवाही लेने का अधिकार और किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से कोई सरकारी अभिलेख अथवा उसकी प्रतिलिपि की मांग करने का अधिकार। गवाहियों तथा दस्तावेजों की जांच हेतु कमीशन जारी करने का अधिकार। आयोग में पुलिस अनुसंधान दल भी है। जिसके द्वारा प्रकरणों की जांच की जाती है।

आयोग का कार्य

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम-1993 के अन्तर्गत मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग के द्वारा निम्नलिखित कार्य किये जाएंगें-

आयोग अपनी ओर से स्वयं अथवा पीड़ि़त द्वारा अथवा उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रार्थना पत्र देकर शिकायत करने पर कि, किसी शसकीय सेवक द्वारा मानव अधिकारों का हनन किया गया है अथवा ऐसा करने के लिये उकसाया गया है अथवा उसने ऐसा हनन रोकने की उपेक्षा किया है, तो ऐसी षिकायतों की जांच करना।

  • किसी न्यायालय में विचारधीन मानव अधिकारों के हनन के मामले में संबंधित न्यायालय के अनुमोदन से ऐसे मामले की कार्यवाही में भाग लेगा।
  • राज्य सरकार को सूचित करके, किसी जेल अथवा राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन किसी ऐसे संस्थान का जहाँ लोगों को चिकित्सा सुधार अथवा सुरक्षा हेतु ठहराया जाता है वहां के निवासियों की आवासीय दशओं का अध्ययन करने के लिये निरीक्षण करना और उनके बारें में अपने सुझाव देना।
  • संविधान तथा अन्य किसी कानून द्वारा मानव अधिकारों के संरक्षण के लिये प्रदत्त रक्षा उपायों की समीक्षा करना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन के संबंध में सुझाव देना।
  • आतंवाद एवं ऐसे सारे क्रिया-कलापों की समीक्षा करना, जो मानव अधिकारों का उपभोग करने में बाधा डालते हैं तथा उनके निवारण के लिए उपाय सुझाना।
  • मानव अधिकारों से संबंधित अनुसंधान कार्य को अपने हाथ में लेना एवं उसे बढ़ावा देना।
  • समाज के विभिन्न वर्गों में मानव अधिकार संबंधी शिक्षा का प्रसार करना तथा प्रकाशनों, संचार माध्यमों एवं संगोश्ठियों और अन्य उपलब्ध साधनों द्वारा मानव अधिकार संबंधी रक्षा उपायों के प्रति जागरूकता लाना।
  • मानव अधिकारों की रक्षा करने या करवाने के क्षेत्र में क्रियाशील गैर सरकारी संगठनों तथा संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहन देना।
  • मानव अधिकारों की समुन्नति के लिये आवष्यक समझे गये अन्य कार्य करना।
  • मानव अधिकार सभी मनुष्यों के लिए निहित अधिकार है, जो कुछ भी हमारी राष्ट्रीयता, निवास की जगह, लिंग, राष्ट्रीय या जातीय मूल, रंग, धर्म, भाषा, या किसी अन्य स्थिति. हम सभी बिना किसी भेदभाव के समान रूप से कर रहे हैं हमारे मानव अधिकारों के लिए हकदार है । ये अधिकार सभी interrelated, अन्योन्याश्रित और अविभाज्य है।

यूनिवर्सल मानव अधिकारों अक्सर व्यक्त कर रहे हैं और संधियों, प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून, सामान्य सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अन्य स्रोतों के रूप में कानून द्वारा की गारंटी है। अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून नीचे देता सरकारों के दायित्वों को कुछ मायनों में कार्य किया जा रहा है या कुछ कृत्यों से बचना, आदेश को बढ़ावा देने के लिए और व्यक्तियों या समूहों के मानव अधिकार और मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा।

यूनिवर्सल और अविच्छेद्य

मानव अधिकारों की सार्वभौमिकता के सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून की आधारशिला है। यह सिद्धांत, के रूप में पहली बार 1948 में मानवाधिकार पर सार्वभौम घोषणा में बल दिया है, कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलनों, घोषणाओं, और प्रस्तावों में दोहराया है। मानव अधिकारों पर 1993 वियना विश्व सम्मेलन, उदाहरण के लिए, ने कहा कि यह राज्य का कर्तव्य को बढ़ावा देने और सभी मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए, उनके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रणालियों की परवाह किए बिना।

यूनिसेफ / HQ04-0734/Jim होम्ससंयुक्त राष्ट्र फोटो / जॉन इसहाकसंयुक्त राष्ट्र फोटो / जॉन इसहाक

सभी राज्यों में कम से कम एक की पुष्टि की है, और राज्य अमेरिका के 80% चार या अधिक कोर मानवाधिकार संधियों की पुष्टि की है, जो उनके लिए कानूनी दायित्वों बनाता है और सार्वभौमिकता ठोस अभिव्यक्ति देने के राज्यों की सहमति को दर्शाती है. कुछ मौलिक मानवाधिकारों मानदंडों सभी सीमाओं और सभ्यताओं में प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा सार्वभौमिक संरक्षण का आनंद लें। मानव अधिकार अपरिहार्य हैं। वे दूर नहीं लिया होना चाहिए, विशेष परिस्थितियों में छोड़कर और कारण प्रक्रिया के अनुसार। उदाहरण के लिए, स्वतंत्रता के अधिकार यदि एक व्यक्ति को कानून की एक अदालत द्वारा एक अपराध का दोषी पाया जाता है प्रतिबंधित किया जा सकता है।
अन्योन्याश्रित और अविभाज्य

सभी मानव अधिकारों अविभाज्य हैं, चाहे वे जीवन के लिए ठीक है, समानता के रूप में इस तरह के नागरिक और राजनीतिक अधिकार, कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, काम अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और शिक्षा, जैसे आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों से पहले, विकास और आत्मनिर्णय के अधिकार के रूप में इस तरह के सामूहिक अधिकार, अविभाज्य, interrelated और अन्योन्याश्रित हैं। एक अधिकार के सुधार दूसरों की उन्नति की सुविधा. इसी तरह, एक अधिकार के अभाव पर प्रतिकूल दूसरों को प्रभावित करता है।
समान और गैर भेदभावपूर्ण

यूनिसेफ तस्वीर गैर भेदभाव अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून के पार काटने में एक सिद्धांत है। सिद्धांत सभी प्रमुख मानवाधिकार संधियों में मौजूद है और महिलाओं के खिलाफ नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अभिसमय के रूप में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार सम्मेलनों के कुछ केंद्रीय विषय प्रदान करता है।

सिद्धांत सभी मानव अधिकारों और स्वतंत्रता के संबंध में हर किसी के लिए लागू होता है और यह लिंग, जाति, रंग, और इतने पर जैसे गैर संपूर्ण श्रेणियों की एक सूची के आधार पर भेदभाव है. गैर भेदभाव के सिद्धांत समानता के सिद्धांत से पूरित है, के रूप में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 1 में कहा गया है: “सभी मनुष्य स्वतंत्र और गरिमा और अधिकारों में बराबर पैदा कर रहे हैं।”
दोनों अधिकारों और दायित्वों

मानव अधिकारों के अधिकारों और दायित्वों दोनों पड़ेगा। राज्य सम्मान के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत दायित्वों और कर्तव्यों को लगता है, रक्षा के लिए और मानव अधिकारों को पूरा। दायित्व का सम्मान करने के लिए इसका मतलब है कि राज्य के साथ हस्तक्षेप या मानव अधिकारों का आनंद कटौती से बचना चाहिए। रक्षा दायित्व राज्यों व्यक्तियों, समूहों और मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ की रक्षा करने की आवश्यकता है। दायित्व को पूरा करने के लिए इसका मतलब है कि राज्य सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए बुनियादी मानव अधिकारों के आनंद की सुविधा चाहिए। व्यक्तिगत स्तर पर, जब तक हम अपने मानव अधिकारों के हकदार हैं, तो हम भी दूसरों के मानव अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

मनुष्य योनि में जन्म लेने के साथ मिलने वाला प्रत्येक अधिकार ‘मानवाधिकार’ का श्रेणी में आता है। संविधान में बनाये गये अधिकारों से कहीं बढ़कर महत्व ‘मानवाधिकारों’ का माना जा सकता है।

कारण यह कि ये ऐसे अधिकार है जो सीधे सीधे प्रकृति से संबंध रखते है। मसलन जीने का अधिकार, कोई कानून सम्मत अधिकार नहीं, वरन समाज के हर वर्ग को प्रकृति द्वारा समान रूप से प्रदान किया गया है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते है कि प्रकृति के अलावा मनुष्यों द्वारा बनाये गये विधि सम्मत कानून का भी यही कर्तव्य है कि वह ‘मानवाधिकारों’ की रक्षा करें। हम यह देख रहे है कि हमारे इसी मानवीय समाज में ‘मानवाधिकारों’ का भय आम लोगों पर विशेष रूप से दिखाई नहीं पड़ रही है। प्रत्यक्ष उदाहरण के तौर पर हम आये दिन होने वाले महिला प्रताड़ना मामलों को ले सकते है। हमारे सांस्कृतिक सभ्यता वाले महान देश में प्रतिदिन हजारों कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं हमारी संस्कृति को तार-तार कर रही है। इतना ही नहीं इस मानवीय समाज को रचने वाली नारियां भी लाखों की संख्या में दहेज की बलिवेदी पर चढ़ायी जा रही है। महिलाओं के यौन शोषण मामलों में वृद्धि के साथ ही साथ कम उम्र की बालिकाओं को समय से पूर्व अवैध मातृत्व के कारण आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ रहा है। इतना कुछ होने के बाद भी हम ‘मानवाधिकार’ कानून की दुहाई देते नहीं थक रहे है। सच्चाई की धरातल पर खड़े हम ऐसे ही अपराधों पर नियंत्रण के लिए ‘मानवाधिकार’ के रक्षकों से केवल गुहार ही लगा पा रहे है।
10 दिसंबर सन् 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा अस्तित्व में लाये गये ‘मानवाधिकार’ ने अब तक 67 वर्ष की यात्रा पूरी कर ली है। इन अधिकारों के जन्म लेने के साथ ही इसमें शामिल सदस्यों का यह कर्तव्य बन गया है कि वे ‘मानवाधिकारों’ का संरक्षण और उनकी देखभाल करें। वास्तव में देखा जाये तो मानवीय जीवन और अधिकार की रक्षा उस देश के ‘मानवाधिकार’ कानूनों के लिए गौरवान्वित करने वाली बात होती है। वर्तमान में हमारे देश में ‘मानवाधिकारों’ की स्थिति वास्तव में जटिलता में देखी जा रही है। ‘मानवाधिकारों’ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका हनन राजनैतिक कारणों के अतिरिक्त धार्मिक मुद्दों पर भी किया जा रहा है। धर्म एक ऐसा मार्ग है जो प्रत्येक जाति वर्ग को प्रेम और स्नेह से रहना सिखाता है। आज उसी धर्म के नाम पर कट्टरता का प्रचार प्रसार करते हुए हिंसा के कारण लोग बेवजह मारे जा रहे है। ‘मानवाधिकारों’ से भारतवर्ष का नाता बहुत पुराना है। हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को अपना सूत्र वाक्य मानते है। संपूर्ण विश्व में भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है जिसने दुनिया को ‘जीयो और जीने दो’ का आदर्श वाक्य देते हुए आपसी प्रेम स्नेह का संचार करने में बड़ी भूमिका का निर्वहन किया है।
आज के परिप्रेक्ष्य में ‘मानवाधिकार’ और उसकी रक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनकर सार्वभौमिक सत्यता को जन्म दे रहा है। मानव समाज के प्रत्येक सदस्य को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिया गया यह अधिकार अब अपने ही संरक्षण के लिए हम सभी से सहयोग की अपील करता दिखायी पड़ रहा है। समयांतर के दृष्टिकोण से ‘मानवाधिकारों’ का सम्मान एक गंभीर चिंतन का विषय बना हुआ है। परस्पर सद्भाव के द्वारा ही हम मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी ओर से गारंटी दे सकते है। संपूर्ण मानवीय प्रजाति को प्रदान किये गये इस अधिकार की गहराई में जाकर चिंतन करें तो आतंकवाद और नक्सलवाद ही ‘मानवाधिकार’ के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में दिखाई पड़ रहे है। इसका दूसरा पक्ष अशिक्षा के रूप में भी समाज के समक्ष आ रहा है। भारतवर्ष के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव अभी भी हमें साल रहा है। यही कारण है कि लोग शिक्षित न होने के कारण ‘मानवाधिकारों’ के हनन किये जाने पर उसका विरोध भी नहीं कर पा रहे है। अक्षर ज्ञान का अभाव ग्राम्यजनों को अधिकारों से अवगत भी नहीं होने दे रहा है। समय-समय पर ‘मानवाधिकारों’ की सुरक्षा के लिए प्रयास किये जाते रहे है। इसी तारतम्य में सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पारित कर किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की निंदा करते हुए उसे अमानवीय करार दिया गया। सन् 1993 से 2003 तक के दशक को इसी कारण नस्लवाद विरोध दशक के रूप में मनाने का निर्णय भी लिया गया।
महिला अधिकारों के संरक्षण को तवाो देते हुए सन् 1993 में एक प्रस्ताव के माध्यम से उन्हें मजबूती दी गयी। शिशु अधिकारों को बल प्रदान करने के लिए सन् 1959 तथा सन् 1989 में विशेष प्रबंध बनाये गये। जिसमें विशेष रूप से शिशु के जीवन यापन के अधिकार से लेकर उसके संरक्षण के अधिकार तक की विस्तृत चर्चा की गयी। इसी प्रकार अल्प संख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए भी महासभा ने समय-समय पर चिंतन किया है। इसके अतिरिक्त मजदूरों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा के प्रावधान भी ‘मानवाधिकारों’ में शामिल किये गये। भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, यौन शोषण, शारीरिक उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और बलात्कार जैसे दानवों से घिरी आधी दुनिया ‘मानवाधिकारों’ की जरूरत को रेखांकित करते करते अक्सर थक सी जाती है। इन सारी समस्याओं से आगे बढ़ते हुए आदिवासियों के भू अधिकारों की समस्या और वनवासियों को उजाड़े जाने की दास्तां भी ‘मानवाधिकारों’ की चर्चा को आवश्यक और प्रासंगिक बनाती है। तमाम आदिवसी और वनवासी सैकड़ों वर्षों से वनों और उनके आसपास के इलाकों में निवास कर रहे है। इनके परंपरागत अधिकारों और ‘मानवाधिकारों’ की समुचित पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है, और आज तक उन्हें चकबंदी, सीलिंग, पट्टे, भू अभिलेख या भूमि आबंटन का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाया है। हैरत की बात यह है कि सभी को समान मानने वाली इस व्यवस्था की सरकार इस बात को आसानी से स्वीकार कर लेती है। इन वर्गों को अब तक वास्तविक लाभ से वंचित ही रखा गया है।
‘मानवाधिकार’ और वर्तमान में उनकी दशा पर इतनी व्यापक चर्चा किये जाने के बाद भी यह विषय अधूरा ही रह गया है। कारण यह कि मानव समाज में जो समस्याएं उपस्थित है उनसे निपटना ही ‘मानवाधिकार’ की संकल्पना का लक्ष्य है। सूखा, बाढ़, गरीबी, अकाल, सुनामी, भूकंप, युद्ध या दुर्घटनाओं के चलते जो लोग शिकार हो रहे है, पीड़ित या परेशान चल रहे है उनके ‘मानवाधिकारों’ का ध्यान रखा जाना अपेक्षित जान पड़ रहा है। इन सारे मामलों में कानून को भी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करना होगा। विकास के साथ मानवता के आपसी रिश्तों को भी रेखांकित करना होगी न कि विकास के नाम पर किये जा रहे निर्माण के बाद लोगों को बे-घर बार कर दिया जाये? अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियों की भी महती आवश्यकता है। ‘मानवाधिकार’ संबंधी घोषणाओं को जमीनी सच्चाईयों में बदलना होगा। जिससे ऐसी घोषणाएं महज दस्तावेजी बनकर न रह जाये। शायद इन्हीं सब बातों में ‘मानवाधिकार’ दिवस की सार्थकता भी निहित है। हमारे देश की सरकार ‘मानवाधिकार’ को लेकर सजग है, किंतु इस सजगता में और अधिक धार लाने की जरूरत है।

 

 

 

 

 

 

 

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34 Responses

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  1. Namita sinha ,jharkhand Ranchi.
    Sep 08, 2016 - 12:15 PM

    I need your help ..also ..

    Reply
    • Sanjeev
      Jun 01, 2017 - 03:27 PM

      Manv Adhikar k bina AAP ek gulaam hai

      Reply
  2. अनिल कुमार
    Sep 21, 2016 - 04:51 PM

    हा मानवाधिकारों उत्त्पिडन व हनन यह समाज का एक हिस्सा बन बैठा हैं हम मानव को एज दूसरे के प्रति ऐसी सोच नही रखनी चहिये क्योंकि अधिकारी हो या आम नागरिक लेकिन पहले तो हम मानव हैं क्या ऐसी प्रस्थिति मे जो सरकारी अधिकारी व कर्मचारियों के द्वारा मानवता का हनन होता हो तो क्या यह न्याय संगत हैं इस लिये गाँव नगर के लोगों का अधिकार व मानवता का हनन किया जाता रहता हैं
    क्या आप हमे बतायेंगे कि हमे क्या करना होगा क्योंकि हमारी संगठन एक गैर सरकारी संगठनों से जुडेहुये कार्य कर रही हैं

    Reply
    • अनिल कुमार
      Sep 21, 2016 - 04:57 PM

      हमे और हमारे इस संगठन मे कार्यकर्ताओं को बल मिलेगा

      तुरन्त सुझाव दें ताकि समाज मे पनप रहे भ्रष्टाचार को समाप्तिकरण कर सके हमारी संगठनों के सदस्य

      Reply
  3. Bharti kumari
    Sep 25, 2016 - 11:10 PM

    Sir i am a teacher I want to know is there any relaxation in working hour of that lady who has small kid below five six month because we have only 135days maternity leave. Please help me sir

    Reply
  4. khemsagarpatel
    Nov 08, 2016 - 05:29 PM

    बहुत आच्छा हे। पुस्तक
    अपना अधिकार जानाकारी हुआ।
    मे बहुत खुश हू जी कि आपना लिखा ।कोई

    Reply
  5. Anmol sharma
    Nov 10, 2016 - 01:39 AM

    Mai yae Khana chata hu ki Jo humare smj mai Jo ladkiya hai shadi Kay bad unko Kisi cheez kay leya tang kayu Kiya jata hai Kya vo kisi ki beti nhi hai bs mai itna chata hu ki ladkiyo ki izt ki Jay or unka sman Kiya jay

    Reply
  6. देवेंद्र सिंह
    Nov 17, 2016 - 08:34 AM

    बहुत ही अच्छी जानकारी मिली , लेकिन इसके साथ साथ मानवाधिकार हनन की शिकायत आयोग मे कैसे कर सकते हैं की जानकारी उदाहरण स्वरूप दी जाए तो और भी अच्छा रहेगा !

    Reply
  7. Preeti
    Nov 21, 2016 - 07:34 PM

    I need your help

    Reply
    • मीना कौंडल
      Nov 21, 2016 - 07:57 PM

      प्रीति जी बताएं, हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं।

      Reply
  8. Anuradha sikarwar
    Nov 22, 2016 - 02:54 PM

    I need your help plz help me

    Reply
  9. nandni choubey
    Dec 09, 2016 - 07:31 PM

    Me ye kahna chahti hu..ki ladkiyo ko apne marji ke hisab se koi kaam kyu nahi karne diya ja sakta hai….aaj kal samaj me kitni ladkiya bhag kar shadi karti hai…or kitni is I karan Marti hai..apni Japan deti hai…to ye sub kyu ho raha hai..kyuuu….reply me….I need is answer plz.

    Reply
  10. प्रदीप सारंग
    Dec 10, 2016 - 09:11 AM

    बहुत ही सार गर्भित जानकारी दी गई है।
    धन्यवाद।
    पढ़कर ज्ञान बढ़ा।

    Reply
    • मीना कौंडल
      Dec 10, 2016 - 08:53 PM

      धन्यवाद सर जी।

      Reply
  11. राधेश्यामविश्वकर्मा
    Dec 13, 2016 - 07:27 AM

    आपकी जानकरी बहुत अछी लगी हे आपको बहुत बहुत धन्यवाद यदि कोई वरिष्ट अधिकारी मानवाधिकर का दूर अपयोग करता हे तो उसकी शिकायत कहा और कैसे करे ये और उस पर कितने दिनों में कार्यवाही हो सकती हे और उसके लिए क्या क्या सबूत की आवश्यकता होती हे शिकायतकर्ता को कृपया कर के बताए

    Reply
  12. Vishal Gupta
    Dec 17, 2016 - 10:49 PM

    National human rights ko apna what’s app complaint number launch krna chahiye jisse lo aasani se apni complaint pahucha sake

    Reply
  13. Fulchand kr Ashish
    Dec 23, 2016 - 09:48 AM

    Hm wife husband teacher hy. Wife ke name se Saharsa me ek Kattha lend ragistard kr uspe ghar bana kr apne bache ke sath rhte hy. Malgujari rasid housing Tex hme prapt hy. Hme apne ghar se jamin ke dalal bhagana chahta hy. Wrong mukadma se presan ho gya hu. Kvi v hme paise or political approach ke be Pr jail vej sakti hy . Any body help me please

    Reply
  14. vinod dangi
    Dec 31, 2016 - 05:58 AM

    सर जैसे कि अर्ध सैनिक बलों में आपतकाल स्थिति ना होने पर जवानों से कितनी कितनी ड्यूटी ले सकते हैं और जैसे कि अर्ध सैनिक बलों में कुछ जवान अधिकारियों के खास हो जाते हैं और कोई ड्यूटी भी नहीं देते वह रजिस्टर मैं भी उनकी कोई ड्यूटी भी नहीं दी जाती है अगर कोई जवान शिकायत करता है तो उसके खिलाफ सभी अधिकारी मोर्चा संभाल लेते हैं उसके साथ सभी अधिकारी मानसिक रुप से परेशान करते हैं टाइम से छुट्टी नहीं दे पाते और सभी जितने भी कोर्स हैं उसमें उसी को डालते रहता है सर इसके लिए कोई कानून या कोई अधिकार है

    Reply
  15. dharmendra soni
    Jan 01, 2017 - 10:33 PM

    I want to join you

    Reply
  16. Aman Tendulkar
    Jan 02, 2017 - 06:50 PM

    क्या कोई भी आम नागरिक अपने राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री से मिल सकता है ? यदि हाॅ तो कैसे?

    Reply
    • Tapan Mandal
      May 02, 2017 - 09:18 PM

      I want to join with you

      Reply
  17. sandeep Yadav
    Jan 08, 2017 - 12:23 AM

    Sir jab ladkiyo ke ijjat maan samman ki bat kahi jati hai waha tak to thik lekin bechare ladako ke liye bhi to koi uchit kanoon banana chahiye bhala ye kya bat hui ki ladaka sadi karake apani bibi lata aur use maan samman ke sath rakhata hai .ladaka apani taraf se koi galati nahi karata hai esake bawjud bhi ladake ko press diya jata hai ki tumhe dand dena padega jabki usame ladake ki koi galati na hone par bhi. Is par to ek naya kanoon banana chahiye nahi desh ke adhe yuwa aise hi barbad ho jayege.

    Reply
  18. Shivendra singh
    Jan 10, 2017 - 11:17 AM

    Bhut achhi jankari mili . main chahta hu Ki is I prakar se aao gyanwardhan karte rahe. Thank you

    Reply
  19. Aman Raj
    Jan 13, 2017 - 08:26 PM

    what is process ? if any anyone who want to be member of human right. because many more oppressed people meet to me to help but without doing so i think it is nit possible for me. I will be thank full to get your reply.

    Reply
  20. Nalinee Tripathi
    Feb 04, 2017 - 09:03 PM

    मानवाधिकार आयोग में भर्ती कैसे और कब होती है ह

    Reply
  21. Vikash
    Feb 25, 2017 - 08:37 PM

    Kya kissi nabalic ladki ke ghar vale ke dvara kissi ladke ko fsana us par 2012 nabalic act sanrachan ke tehat kess karna uske parigano dvara thane me Mar pit ke dvara charseet file kar bina suchna ladke ki koi bat sune bina police ke dvara bina jach kiye kess darz kar lena kya manav adhikar ke khilaf nhi h.

    Reply
  22. शिवकुमार
    Mar 30, 2017 - 06:23 PM

    Kya mere baba ki jayadad bina hamari marji ke bena mere pita bech sakte hai

    Reply
  23. दुर्गेश सूर्यवंशी
    Apr 27, 2017 - 12:31 PM

    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने

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  24. parmeshwar singh
    Apr 28, 2017 - 12:38 PM

    मैं किसी प्रसिद्ध गोल्ड लोन कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की जॉब कर रहा हूं मुझे पिछले 150 घंटे से लगातार दिन रात मजबूरन ड्यूटी पर रखा जा रहा है | क्या यह मानव अधिकार हनन तथा आजादी छीनने से संबंधित नहीं है?
    ऐसी परिस्थिति में कंपनी के खिलाफ क्या एक्शन किए जा सकते हैं तथा मेरा मानव अधिकार का हुए हनन का क्या होगा?
    कृपया मुझे आज अभी अच्छा सा सुझाव दें तथा मेरी सहायता करें

    Reply
  25. Birendra kumar verma
    Jun 09, 2017 - 07:15 PM

    Manvwadhikar ki raksha ke lie is par kam karne vale sangthan ko tatpartapurvk kam karna hoga .shikayatkarta ki shikayat sahi hone par use harjana bhi dilwana chahie.sath hi aaropi padadhikari ko naukari se mukt karte hue vetan me li gai puri rashi ki vashuli karni chahie.

    Reply
  26. Rana Ansari
    Jun 18, 2017 - 11:47 AM

    Mujhe ak complain karni hai uske leye puchna hai kaise aur kaha per jaker baat karu us complain ko kaise lekhu

    Reply
  27. Anant Kumar mishra
    Jul 18, 2017 - 05:11 PM

    I need your help. Please help me.

    Sir Maine 2017 me Cipet Jaipur se Pg diploma pass out kiya tha. Jiski industrial training Maine ek plastics Masterbatch company Pune me ki thi .unhone usi din 7 years ka bond bhi sign krwaya tha or three cheque liye the sign karwake.

    Meri majburi thi ye bond krne ki Kyo ki Mujhe industrial training complete krni thi.

    Av Maine ye company chhod di hai.
    Kyo ki mai aage study krna chahta hun.

    Kya me Av aage ki study Kr sakta hun.

    Reply
  28. Rupesh patel
    Sep 12, 2017 - 06:29 PM

    👌👌

    Reply
  29. gopal singh
    Oct 06, 2017 - 09:09 PM

    मै मानव अधीकर के साथ जुड़े रहना चाहता हूं

    Reply

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