हिमशिमला लाइव की प्रधान संपादक सरिता चौहान से पहाड़ी लोक गायिका शांति बिष्ट की खास बातचीत

लाड़ा भूखा आया मैं खिचड़ी पकावां…पहाड़ी लोक गायिका शांति बिष्ट जी से खास मुलाकात

 

पहाड़ी लोक गायिका शांति बिष्ट

पहाड़ी लोक गायिका शांति बिष्ट

  • इस ग्रांई देया लंबरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई……से शांति जी को मिली खास पहचान

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि भगवान हर इंसान में कोई न कोई खूबी ज़रूर बख्शता है लेकिन यह तो उस इंसान पर निर्भर करता है कि वो अपनी खूबी से खुद को कितना ऊंचा उठा पाता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया कांगड़ा के धर्मशाला गांव दाड़ी की रहने वाली शांति बिष्ट ने। जिन्होंने पहाड़ी लोक संगीत में अपनी एक खास पहचान बनायी और पूरे प्रदेश में अपनी मधुर आवाज से सबके दिलों में एक अलग जगह बनाई। जी हां हम बात कर रहे हैं उनकी जिनका ये पहाड़ी गीत इस ग्रांई देया लंबरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बटा जांदे सीटी मारदे, ने पूरे प्रदेश में पहाड़ी लोक गायिकी में अपनी एक बेहतरीन मिसाल कायम की जिसे आज भी लोग बड़े चाव से सुनते हैं। एक बात और शांति जी की पहचान भले ही इस गाने से हुई हो लेकिन मुझे जब उनसे बातों-बातों में ये पता चला कि उनके द्वारा ही गाया ये पहाड़ी गीत भी है लाड़ा भूखा आया मैं खिचड़ी पकावां, भी उनके पति द्वारा लिखा गया है और गाया शांति जी के द्वारा गया है तो मुझे बहुत अंचभा हुआ। हालांकि उस समय पहाड़ी गायक कलाकारों को इतना नहीं जाना जाता था जितना कि पहाड़ी गानों को सुना जाता था। शायद यही वजह रही कि उस गाने से उन्हें उस वक्त इतना उनके नाम से नहीं जाना गया जितना कि उस गीत ने पूरे प्रदेश में अपनी धूम मचा दी थी। हालांकि जो उन्हें जानते थे उस वक्त उन्होंने उनके इस गाने की बहुत तारीफ की और उनके पति जयदेव बिष्ट जी जोकि बहुत बड़े लेखक हैं शांति जी ने उनके लिखे कई गानों में अपनी मधुर आवाज दी है और संगीत से भी संवारा है। जी हां आज हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं हिमाचल प्रदेश की बेहतरीन पहाड़ी लोक गायिका, लेखिका, नृत्ययिका शांति बिष्ट जी से। पेश है हमारी प्रधान संपादक सरिता चौहान से शांति बिष्ट जी की एक खास बातचीत :

  • शांति जी सबसे पहले तो ये बताइये कि आप कहां से हो? और लोक सांस्कृति की तरफ आपका आना कैसे हुआ? क्या आपके परिवार में पहले से ही कोई इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ था?

मैं कांगड़ा के धर्मशाला गांव दाड़ी की रहने वाली हूं। बचपन में स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मैं बढ़-चढक़र हिस्सा लेती थी। कभी ऐसा नहीं सोचा था कि इस क्षेत्र में ही मेरा करियर तय होगा। क्योंकि उस समय गीत गाना अच्छा नहीं समझा जाता था और न ही मेरे परिवार से कोई इस क्षेत्र में था। स्कूल से ही मेरी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के साथ शुरूआत हुई और वहीं से मुझे गाने का और डांस करने का शौक हुआ। यहां तक कि मैंने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सिर बजाकर तबला और ढोलकी बजाना सीखा।

  • शांति जी स्कूल से क्या कभी आपको सांस्कृतिक कार्यक्रम में धर्मशाला से बाहर जाने का अवसर मिला जिससे आपको आगे बढऩे के लिए मौका मिला हो?

जी बिल्कुल। उस समय डा. यशवन्त सिंह परमार हिमाचल के मुख्यमंत्री थे और हिमाचल को स्टेट हुड मिलना था तो कहा गया कि कांगड़ा से सांस्कृतिक दल को शिमला लेकर जाना है। उसमें मैं भी शामिल थी। इसके लिए मुझे परिवार में अपनी माता को बहुत मनाना पड़ा, वो नहीं चाहती थीं कि मैं इस क्षेत्र की तरफ आऊं, लेकिन मैंने उनको मनाया और मैं शिमला अपने सांस्कृतिक दल के साथ पहुंची। जिसमें हमें कहा गया कि आपको अपने कार्यक्रम के माध्यम से लोक संस्कृति से लोगों को अवगत कराना है तो हमारा कार्यक्रम हुआ जिसे बहुत सराहा गया। मैंने सबसे आगे खड़े होकर कार्यक्रम की प्रस्तुति की। एक बात कहना चाहुंगी कि उस वक्त के लोग और माहौल बहुत अच्छा हुआ करता था। हमारे कार्यक्रम की बहुत ज्यादा तारीफ हुई। यहां से ही एक शुरूआत हो गई थी मेरी।

  • आपकी पढ़ाई कहां पूरी हुई? और आप अध्यापन क्षेत्र में कैसे आईं और आपकी गायिकी की पहचान बनी वो कहां से बनी?

जी हां। शिमला से कार्यक्रम के बाद मैं जब वापस आई तो मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। बीए और जेबीटी की ट्रेनिंग की और उसके उपरांत एलटी की। फिर शादी हुई। पति पहले से ही इस क्षेत्र से जुड़े थे उनका काफी सहयोग रहा। शादी के बाद मैं शिमला आ गई तो आकाशवाणी शिमला में उन्होंने मेरा ऑडिशन करवाया फिर वहां से मैं आकाशवाणी के साथ जुड़ गई इसी बीच मेरी नौकरी लग गई और बतौर भाषा अध्यापिका मैंने क्योंथल स्कूल में ज्वाइन किया। फिर मेरे पति जो लिखते भी हैं वो उस समय गीत तैयार कर रहे थे इसा ग्रांई देया लंबरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बटा जांदे सीटी मारदे, उन्होंने कहा कि मैं पहाड़ी गीत बना रहा हूं आप अगर कोई लाईन डालना चाहती हो तो बताओ तो वो गीत हम दोनों ने मिलकर तैयार किया और मैंने उसे अपनी आवाज दी। यह गाना इतना मशहुर हुआ कि जम्मू रेडियो स्टेशन में उस समय अक्सर सुनाई देता था वहीं हिमाचल प्रदेश, श्रीनगर, गुजरात, बीकानेर में हर जगह इस गाने को खूब सराहा गया।

  • अध्यापन के साथ-साथ आपने अपने शौक को कैसे पूरा किया?

हालांकि मेरी पहचान और कामयाबी मुझे आकाशवाणी और दूरदर्शन की देन है लेकिन स्कूल में भी मुझे अपने शौक को पूरा करने का पूरा अवसर मिला। मैं शिमला के लक्कड़ बाजार स्कूल और पोर्टमोर में भाषा अध्यापिका के रूप में पढ़ाती थी तो वहां की टीचर्स ने मुझे कहा कि आप इतना अच्छा गाती हो और नृत्य करती हो तो आप बच्चों को भी सीखाओ। तो मैंने वहां एक बच्चों का सांस्कृतिक दल बनाया। जिसमें  मुझे गुजरात के राजकोट में सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। वहां हमने एक महीने अपनी प्रदर्शनी लगाई और वहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान मुझे बच्चों के साथ अपने प्रदेश की संस्कृति को उजागार करने का अवसर मिला। उधर जाकर हमने जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपनी-अपनी लोक संस्कृति का आदान-प्रदान किया तो वहीं उन्होंने हमारे संस्कृति के बारे में जाना। वहीं हमें उनकी संस्कृति के बारे में जानने और देखने को बहुत कुछ मिला। जिससे हमारे बच्चों को बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। वहां हमारी संस्कृति को काफी सराहा गया। जहां तक शौक की बात है तो मुझे गीत संगीत  लिखने व नृत्य के अलावा पेंटिंग का भी बहुत शौक रहा है। मैंने बहुत सी पेटिंग भी बनाई हैं।

  • आपके काफी गाये पहाड़ी लोक गीत लोगों को बहुत पंसद आए। आपके दिल के करीब ऐसे कौन से पहाड़ी लोक गीत हैं जिनसे आपकी बहुत अच्छी यादें जुड़ी हैं?

यूं तो बहुत से गीत हैं लेकिन जैसे मैंने आपको पहले बताया कि मेरे पति जो लिखते भी हैं वो उस समय गीत तैयार कर रहे थे इसा ग्रांई देया लंबरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई कि बटा जांदे सीटी मारदे, उन्होंने कहा कि मैं पहाड़ी गीत बना रहा हूं आप अगर कोई लाइन डालना चाहती हो तो बताओ तो जिसे हम दोनों ने मिलकर तैयार किया उसमें कुछ अंतरे मेरे भी हैं वो अंतरे मैंने तब तैयार किए जब क्योंथल स्कूल में पढ़ाती थी। मैं स्कूल के लिए जा रही थी और रास्ते में चलते-चलते ही मैंने गाने के अंतरे तैयार कर लिये। ऐसा एक किस्सा है जब मेरा एक लोकगीत जो बहुत प्रसिद्ध है माता तेरे मंदरा बजदे ढोल नगाड़े ये गीत तब तैयार किया जब हम वैष्णों देवी जा रहे थे तो रास्ते में बहुत चढ़ाई थी, चलते-चलते मेरा गीत तैयार हो गया और मुझे चढ़ाई का भी पता नहीं चला कि कब हम माता के दरबार पहुंच गए।

  • परिवार और काम में तालमेल कैसे बनाया आपने? आपका स्कूल, घर का काम और बाकि आपका आकाशावाणी और दूरदर्शन के अलावा अन्य कार्यक्रमों के लिए बाहर जाना सबके लिए काफी मुश्किलें तो आईं होगी?

ऐसा नहीं था क्योंकि मुझे मेरे पति का काफी सहयोग रहा। वहीं मुझे संगीत के प्रति अपने काम को करने का भी काफी शौक था। वहीं लोगों की प्रशंसा ने मुझे मेरी हर जिम्मेवारी को बखुबी निभाने के लिए प्रेरित किया। मेरे ख्याल से परिवार और काम के बीच आप बेहतर तालमेल बिठा सकते हो अगर परिवार का सहयोग आपको मिले तो। मैं इस मामले में भी परिवार की तरफ से काफी खुशनसीब रही कि मुझे मेरे पति और परिवार ने हमेशा सहयोग दिया और आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। साथ ही स्वास्थ्य भी बेहतर रहा जिससे कि मुझे कभी किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई।

  • क्या आपने हिमाचल के बाहर भी अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं? या कभी किसी फिल्म में काम करने का अवसर भी मिला?

जी बिल्कुल, प्रत्येक राज्य में गीत संगीत सीखने के लिए और अपनी लोक संस्कृति को उजागर करने का मुझे मौका मिला है। स्कूल एनसीआरटी में प्रत्येक राज्य के बच्चों को सीखाने का अवसर मिला। करीब 50,000 से ज्यादा बच्चों को मैंने सीखाया और 10,000 टीचर्स को ट्रेनिंग दी है। मैंने बंगाली, आसामी, महाराष्ट्र, पंजाबी और तमिल में भी गीत गाये और सीखाएं हैं। उस समय हर जगह 14 नवंबर को शिमला के लेडिज़ पार्क में काफी बड़ा कार्यक्रम होता था जिसमें हर जिलों से बच्चों को बुलाते थे। गांव के बच्चे शहरों में आकर यहां की संस्कृति को देखते और समझते थे। मुझे उन बच्चों को अपनी लोक गायिकी द्वारा उस कार्यक्रम के द्वारा गाने के माध्यम से सीखाने का मौका भी मिला। वहीं करीब 6-7 साल पहले हम लोगों को श्रीनगर के पुंछ में जाकर सांस्कृतिक कार्यक्रम को प्रस्तुत करने का मौका भी मिला। जहां मिलिट्री वालों के लिए हमने सैनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। वहां के लोगों व बच्चों को हमने अपनी संस्कृति से रूबरू करवाया। सैनिकों ने हमारे कार्यक्रम की काफी तारीफ की। वहां के लोगों ने भी हमें और हमारी संस्कृति को खूब पंसद किया। वो भी काफी यादगार पल रहे। उधर पंजाब के मशहुर कलाकारों के साथ भी मुझे काम करने का मौका मिला। वहीं मुंबई के जिन्होंने पहली महाभारत में युधिष्ठिर की भूमिका की थी गजेन्द्र चौहान अपने सीरियल इश्क नहीं आसां के लिए यहां आए तो उन्होंने मुझे अपने एपिसोड में मेरे ही दो पहाड़ी गीतों के लिए चुना। मैंने उसमें अपने दो गीत गाए हैं इसा ग्रांई देया लंबरा हो इन्हां छोरूआं जो लेयां समझाई, और दूसरा गीत लाड़ा भूखा आया मैं खिचड़ी पकावां। जिसकी उन्होंने खूब तारीफ की। हालाँकि मैंने दो सौ तीन सौ के करीब गीत गये हैं।

  • अच्छा तो ये पहाड़ी लोकगीत भी आप द्वारा ही गाया है लाड़ा भूखा आया मैं खिचड़ी पकावां?

जी हां, ये गीत मेरे पति जयदेव जी ने लिखा है और इसकी स्वर रचना मैंने की है। ये अपने समय में इतना चला था कि उस समय हर इंसान की जुबां पर यह गीत बस गया था।

  • हमारी लोक संस्कृति और लोक गायिकी में आज के दौर में और तब के समय में कितना फर्क महसूस करती हैं आप?

बहुत कुछ बदल गया है। अब तो उस समय के पहाड़ी गीतों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है। दुख होता है वास्तविक संस्कृति तो मानों कहीं लुप्त ही हो गई है। जबकि वास्तविक संस्कृति जरूरी है। पाश्चात्य संस्कृति पर ध्यान देने की बजाय यह आवश्यक है कि अपनी लोक संस्कृति को समझा जाए और अपने बच्चों तथा नई युवा पीढ़ी को उससे अवगत कराया जाए।

  • आज के उभरते कलाकारों को कोई संदेश देना चाहेंगी आप?

सिर्फ यही कि वास्तविक संस्कृति व लोक गायिकी पर ध्यान दें। पाश्चात्य संस्कृति को न अपनाएं। वास्तविक लोक गायिकी संस्कृति ही हमारी पहचान है। इसे उजागार करने की ओर ध्यान दें।

  • क्या आपको लगता है कि सरकार को अभी और ज्यादा लोक गायिकी को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है?

मेरे ख्याल से अपनी लोक गायिकी तथा अपनी संस्कृति को बनाए रखने के लिए सरकार को और कदम उठाने चाहिए। ऐसे लोगों का एक दल बनाया जाए जिन्हें अपनी संस्कृति, लोक गाियकी का ज्ञान हो जिसके माध्यम से स्कूल, कॉलेजों में बच्चों को वास्तविक लोक गायिकी, लोक संस्कृति से अवगत कराया जाए।

  • आजकल आप क्या कर रहीं हैं? आपको लगता नहीं कि अभी और बहुत कुछ करना बाकि है?

परिवार के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।  हां, करना तो अब भी चाहती हूं लेकिन अब शरीर उतना साथ नहीं देता। काफी समय से सेहत काफी अस्वस्थ चल रही है फ़िलहाल परिवार के साथ समय बिता रही हूँ।

  • आपके समय के वो लोग जो आपके साथ काम कर चुके हैं उनसे कभी मिलना होता है? कैसा लगता है उनसे मिलकर?

बहुत कम, उस समय के लोगों में एक-दूसरे के प्रति आदर-सम्मान हुआ करता था। आज भी कभी-कभार कहीं उन लोगों से मिलना होता है तो भी वैसा ही। लेकिन आज के लोगों में अब वो बात नहीं रही। दुख जो जरूर होता है क्योंकि वक्त रूकता नहीं। बहुत से साथी छूट गये हैं। रोशनी जी जो बहुत ही बेहतरीन गाती थीं अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके पहाड़ी गीत आज भी सुनो तो ऐसा लगता है कि वो साथ हैं। शकुन्तला जी, कृष्णा जी बहुत से लोग हैं जिनसे मिलना तो बहुत कम होता है लेकिन जब मिलते हैं तो पुरानी बातें यादें सब ताजा हो जाती हैं। बहुत अच्छा लगता है। वक्त की रफ्तार थमती नहीं बस चलती रहती है। बस एक वक्त ऐसा आता है कि यादें ही रह जाती हैं।

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