सर्पदंश के देवता: गुग्गा

सर्पदंश के देवता: “गुग्गा”

गुग्गा गाथा का गायन करते लोग

गुग्गा गाथा का गायन करते लोग

सर्पदंश और जादुई शक्तियों पर विजय पाने वाले देव का नाम है “गुग्गा” । सर्पदशं और जादू का आतंक गांव में सिर चढक़र बोलता है। बरसात में जब सांपों के बिलों पर पानी भर जाता है तो वे घरों की शरण लेते हैं। बरसात के बाद जब धूप चमकती है तो सांप भरे-पूरे घास में लहराते हैं। सांप भी ऐसे खतरनाक कि एक ही फुंकार से आदमी को खत्म कर दें और जादू-टोने से ग्रसित, अंधकार से डगमगाए लोग कोई ऐसी बड़ी शक्ति चाहते हैं जो इससे छुटकारा दिला सकें। अबोध ग्रामीणों को इस सबसे  निजात दिलाने वाला पीर है “गुग्गा” ।

गुग्गा” को “गुग्गा छत्री”, “गुग्गा जाहपीर”, ‘राणा नीले घोड़े का सवार’, ‘गुगमल’ आदि नामों से संबोधित किया जाता है। हिमाचल के निचले क्षेत्रों में “गुग्गा” का प्रभुत्व है। शिमला के निचले क्षेत्र बिलासपुर, मंडी, कांगड़ा, हमीरपुर आदि में “गुग्गा”  एक समान पूज्य देव हैं।

  • “गुग्गा” गाथा

इन सभी क्षेत्रों में “गुग्गा”-गाथा प्रचलित है जिसे ‘झेड़ा’ या ‘बार’ कहा जाता है। इस गाथा में गुरू गोरखनाथ तथा उनके नौ लाख शिष्यों, काछला और बाछला दो बहनों, गुरू गोरखनाथ की कृपा से “गुग्गे” का जन्म भाइयों की ईर्ष्या, गुरू गोरख के प्रताप से “गुग्गे” के विवाह तथा भाइयों से युद्ध का वर्णन है।

गुग्गा”  के अनुयायी रक्षाबंधन से लेकर “गुग्गा”  नवमी तक यह गाथा घर-घर जाकर सुनाते हैं इनमें से एक आदमी बड़ा छत्र लेकर चलता है। छत्र के साथ रंग-बिरंगे कपड़े के टुकड़े भी इसमें बांध लिए जाते हैं। एक आदमी के हाथ में थाली होती है। कई जगह इकतारा या ढोलकियों का प्रयोग भी किया जाता है। विभिन्न मुद्राएं बनाते हुए ये “गुग्गा”  की वीर गाथा सुनाते हैं जिसमें बीच-बीच में कथा का संक्षेप बिना गाए अपनी बोली में समझाया जाता है, फिर गायन आरंभ हो जाता है।

  • ग्राम देवता

जिस गांव में “गुग्गा” का मंदिर होता है, उसके आस-पास के सभी गांवों के घरों में  “गुग्गा”  पूजन होता है। हर घर के आंगन में घोड़े पर सवार “गुग्गा”  की प्रस्तर प्रतिमा रहती है। प्राय: तुलसी के बिरवे में या किसी अन्य चबूतरे में “गुग्गा” को स्थापित किया जाता है।

बरसात के दिनों में “गुग्गा” मढ़ी से प्रसाद के रूप में मिला पानी तथा मिट्टी घरों के अंदर तथा आंगन-पिछवाड़े फेंका जाता है। इससे यह समझा जाता कि सांप तथा भूत-प्रेत घर में नहीं आ सकेंगे।

  • गुग्गा” नवमी

गुग्गा” नवमी के दिन “गुग्गा” का मेला प्रारंभ होता है। इस रात रतजगा होता है। कई स्थानों पर पुजारी खेलता है। खेलता हुआ पुजारी बताता है: अब “गुग्गा”  तैयार हो गया है, अब घोड़े पर सवार हो मारू देश की ओर रवाना हो गया, अब रोपड़ पहुंच गया, अब स्वारघाट आ गया, अब तलाई में आ गया, अब मंदिर के द्वार पर आ गया ……। “गुग्गा”  के मंदिर में प्रवेश पर बलियां दी जाती हैं। कई पुरुष तथा स्त्रियां एक साथ खेलने लगते हैं। ऐसे में जादू-टोने से ग्रसित लोगों को उल्टियां करवाई जाती हैं। उन्हें सांकलों से पीटा जाता है।

कई बार “गुग्गा” के आगमन से पूर्व पुजारियों या लोगों की गलतियों के कारण देवता आने से मना कर देता है जिस पर लोगों तथा पुजारियों को क्षमा मांगनी पड़ती है। क्षमा के लिए कई बार बलि भी देनी पड़ सकती है। “गुग्गा” के आगमन के बाद ही मेला सही मायनों में आरंभ होता है।

 साभार: हिमाचल “सुदर्शन वशिष्ठ”

फोटो साभार:  FIR Live एवं Eenadu India Hind

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