प्रदेश की घाटियों-शिखरों में विद्यमान “शिव”

प्रदेश की पर्वतों व घाटियों में विद्यमान “शिव”

  • हिमाचल के पर्वत शिखर पर शिव का वास
  • पूरे प्रदेश में शिव व्याप्त “शैव परम्परा”
  • आम जीवधारी मनुष्यों की तरह विचरण करते हैं शिव-पार्वती
हिमाचल के पर्वत शिखर पर शिव का वास

हिमाचल के पर्वत शिखर पर शिव का वास

हिमाचल हिमालय का वह भूभाग है जहां आदि शक्ति और शिव का प्राधान्य है। पूरे प्रदेश में शिव व्याप्त हैं। यहां के पर्वत शिखर शिव का वास माने जाते हैं। शिव का ताण्डव, शक्ति का लास्य यहां की घाटियों-शिखरों में विद्यमान है। शिव-पार्वती यहां आम जीवधारी मनुष्यों की तरह विचरण करते माने जाते हैं। यहां के लोकगीतों में शिव एक ओर कैलासों के वासी और संकट हरने वाले हैं तो दूसरी ओर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। प्रदेश के मन्दिरों का सर्वेक्षण किया जाए तो शिव और शक्ति के मन्दिर सर्वाधिक निकलेंगे, यह निश्चित है।

  • भरमौर के गद्दी शिव-भक्त
  • लेख में शिवपुर का उल्लेख

शुरूआत जिला चम्बा के भरमौर से की जा सकती है। भरमौर के मूलवासी गद्दी शिव-भक्त हैं। शिव का वास यहां उतना ही पुराना माना जाता है जितना कि मनुष्य जीवन। शिव गद्दी लोगों की भेड़ों के रक्षक हैं, उनके आश्रयदाता हैं, एकमात्र सहारा हैं।

भरमौर को शिवपुरी कहा गया है। चंबा से तीस किलोमीटर दूर रावी के दाएं किनारे पुराने भरमौर मार्ग पर देवी का मंदिर है। देवी मंदिर के चारों ओर अनेक शिवलिंग हैं जो एक शिव मन्दिर की पुष्टि करते हैं। यहां एक शिला में लेख है जो सम्भवत: शिवलिंग के साथ रहा होगा। इस लेख में शिवपुर का उल्लेख है। लेख में कहा गया है कि आषाढ़ देव ने शिवपुर के मध्य में संकलीश का मंदिर बनावाया। वोगल ने इस लेखा को सातवीं शताब्दी का माना है।

  • पुरातन राजधानी ब्रह्मपुर में प्राचीन मणिमहेश मंदिर

भरमौर की छतराड़ी में आदि शक्ति का अद्वितीय मंदिर है जो आठवीं शताब्दी का माना जाता है। भरमौर की पुरातन राजधानी ब्रह्मपुर में प्राचीन मणिमहेश मंदिर है। मंदिर के बाहर नंदी में शिलालेख है जो मेरूवर्मन के समय आठवीं शताब्दी का है।

  • शिव का निवास मणिमहेश
  • गौर कुण्ड में कैलास से प्रतिदिन स्नान करने आती थीं पार्वती

शिव का निवास मणिमहेश माना जाता है। मणिमहेश कैलास तेरह हजार फुट से ऊपर बुलंदी पर है। मणिमहेश यात्रा राधा अष्टमी को होती है। चंबा से छड़ी यात्रा के साथ आरम्भ होकर राधा अष्टमी को स्नान होता है। जम्मू-भद्रवाह के लोग जन्माष्टमी के दिन स्नान करते हैं। जिसे छोटा न्हौण कहा जाता है। लक्ष्मीनारायण मंदिर के साधु छड़ी लेकर चलते हैं और मणिमहेश झील में पहुंचते हैं। झील में सर्वप्रथम चेला स्नान करता है जो गद्दी समुदाय का होता है। झील से पहले गौर कुण्ड है, जिसमें महिलाएं स्नान करती हैं। यह माना जाता है कि कैलास से गौरी पार्वती यहां प्रतिदिन स्नान करने आती थीं।

यूं तो भरमौर में जगह-जगह शिव के स्थान हैं किन्तु दूसरे मंदिरों में भी त्रिशूल के चिन्ह लगे नजर आते हैं। ये त्रिशूल भरमौर से पांगी होते हुए लाहुल तक आते हैं।

चम्बा या पांगी के अंतिम छोर और लाहुल के प्रारम्भ में, जिसे चम्बा लाहुल कहा जाता है, त्रिलोकीनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। त्रिलोकीनाथ एक धाम माना जाता है आरै शिव के इस स्थान को चारों धामों में से एक माना जाता है।

इस ओर शिव का यह मंदिर एकमात्र शिखर शैली का मंदिर है। मंदिर की अद्वितीय शिव प्रतिमा जिसे अवलोकीतेश्वर भी माना जाता है, हिन्दू और बौद्ध दोनों द्वारा समान रूप से पूजी जाती है।

  • शैव परम्परा को पुष्ट करता है मणिकर्ण

मणिमहेश के बाद दूसरा महत्वपूर्ण स्थान जो हिमाचल में शैव परम्परा को पुष्ट करता है, मणिकर्ण है। मणिमहेश और मणिकर्ण, ये दो यात्राएं थीं जो बहुत कष्टकर और दुर्गम मानी जाती थीं। मणिमहेश अभी भी दुर्गम है, मणिकर्ण बस मार्ग से जुडऩे के कारण सुगम हुआ है।

कुल्लू घाटी में पर्वत पुत्री पार्वती नदी होकर बहती है। भुंतर के पास पार्वती ब्यास में मिलती है किन्तु पार्वती के पानी को देख लगता है, पार्वती ब्यास में नहीं पार्वती में ब्यास मिली है। इस पार्वती के किनारे मणिकर्ण में पुरातन शिव मंदिर हैं। मंदिर के चारों ओर उफनते पानी के चश्मे हैं, जिनमें चावल पकाया जा सकता है।

  • कैलास के शंकर घूमते हुए मणिकर्ण आए…और यहां ठहर गए

    कैलास के शंकर घूमते हुए मणिकर्ण आए...और यहां ठहर गए

    कैलास के शंकर घूमते हुए मणिकर्ण आए…और यहां ठहर गए

मणिकर्ण कुल्लू से नौ किलोमीटर पीछे भुंतर से पैंतीस किलामीटर है। मणिमहेश के विपरीत यहां शिव-पार्वती सम्बन्धी एक लोककथा प्रचलित है। कैलास के शंकर घूमते हुए किन्नर कैलास से इस ओर आ निकले। स्थान रमणीक होने के कारण यहां ठहर गए। यहां देवी पार्वती की मणि खो गई। बहुत खोजने पर भी मणि न मिली तो पार्वती ने शंकर से मणि खोजने का अनुरोध किया। शंकर ने कुपित होकर तीसरा नेत्र खोला। इसकी मार पाताल तक गई और मणियां-ही-मणियां निकलने लगीं। फलत: इस स्थान का नाम मणिकर्ण पड़ा।

  • किन्नौर में कैलास परिक्रमा नाम से एक यात्रा
  • कल्पा के सामने कैलास शिखर

उफनते हुए पानी से कुछ वर्ष पहले तक पत्थर की गोल-गोल मणियां निकलती रही हैं। पुजारियों के पास ऐसी मणियां अब भी रखी हुई हैं। मणिकर्ण के आगे खीर गंगा है जहां से किन्नर कैलास को रास्ता जाता है। किन्नर कैलास शिव का तीसरा स्थान है जो मणिमहेश की भांति दुर्गम है। किन्नौर के मुख्यालय कल्पा के सामने कैलास शिखर है। ये शिखर सूर्य के निकलने के साथ-साथ अपना रंग बदलते हैं। किन्नौर में कैलास परिक्रमा नाम से एक यात्रा की जाती है।

  • मणिमहेश, मणिकर्ण, कैलास परिक्रमा सभी यात्राएं की जाती हैं शिव प्राप्ति के उद्देश्य से

हिमाचल में लगभग सभी यात्राएं शिव को समर्पित हैं। मणिमहेश, मणिकर्ण, कैलास परिक्रमा सभी यात्राएं अंतत: शिव प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती हैं जिससे यहां शैव परम्परा का प्राधान्य पुष्ट होता है। किरात केशधारी शिव आख्यान कुल्लू की धरती में हुआ माना जाता है। कुल्लू में ब्यास के बाएं किनारे जगतसुख के पास शुरू में शबरी का मंदिर है। मंदिर के ऊपर पहाड़ में हामटा और इन्द्रकील पर्वत हैं। इन्द्रकील कुल्लू और स्पिति के बीच का पर्वत है जिसे देउ टिब्बा भी कहा जाता है। हामटा के पास अर्जुन गुफा है।

महाभारत-प्रसंग है कि अर्जुन पाशुपातास्त्र प्राप्त करने के उद्देश्य से हिमालय में आए। जब अर्जुन इन्द्रकील पर्वत के पास पहुंचे तो उन्हें एक आवाज सुनाई दी- खड़े हो जाओ। उन्होंने देखा एक तपस्वी वृक्ष के नीचे बैठा है। तपस्वी ने कहा, जुम धनुष वाण, कवच और तलवार धारण किए कौन हो, यहां आने का प्रयोजन क्या है? यहां शस्त्रों का काम नहीं है। इसके बाद अर्जुन का किरातवेशधारी शंकर से युद्ध होता है और अर्जुन शिव से पाशुपातास्त्र प्राप्त करते हैं।

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