खेती के स्वरूप को बदलने में आगे आएं वैज्ञानिकः राज्यपाल

खेती के स्वरूप को बदलने में आगे आएं वैज्ञानिक : राज्यपाल

  • जैविक व परम्परागत कृषि फसल संगोष्ठी का आयोजन

शिमला: राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने बागवानी विश्वविद्यालयए नौणी के वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे खेती के स्वरूप को बदलने के लिए आगे आएं। वे ऐसे फसल बीजों को तैयार करें, जिनसे उत्पादकता बढ़े और इसके लिए विश्वविद्यालय स्तर पर गहन शोध किया जाना चाहिए।

राज्यपाल आज सोलन जिले के साधुपुल में यूथ फॉर सस्टेनेबल डेवलपमैंट शिमला एवं विवेक संस्थाए साधुपुल द्वारा आयोजित जैविक व परम्परागत कृषि फसल संगोष्ठी के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि प्रगतिशील किसानों को संबोधित कर रहे थे। आचार्य देवव्रत ने कहा कि भारत आदिकाल से कृषि प्रधान देश रहा है और ग्रामीण स्तर पर कुटीर उद्योग चलते थे। गांव अपने आप में परिपूर्ण थे तथा हर जरूरत की चीज़े गांव में ही उपलब्ध थीं। लेकिन समय के साथ अव्यवस्था ने हमारी खेती को नुकसान पहुंचाया और दुनिया को अन्न देने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि इसका एकमात्र विकल्प शून्य लागत प्राकृतिक कृषि है। आज ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है कि किसान को कृषि के लिए ऋण न लेना पड़े और गांव का पैसा गांव में ही रहे।

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक कृषि के लिए भारतीय नस्ल की गाय का पालन जरूरी है, क्योंकि इसका दूध न केवल गुणात्मक है बल्कि इसका गोबर व गौ मूत्र भी खेती के लिए सर्वोत्तम है। इसे वैज्ञानिकों ने भी स्वीकारा है। उन्होंने कहा कि व्यवहारिकता में गौ माता की जय तभी संभव है जब हम गौ पालन पर बल देंगे।

यूथ फॉर सस्टेनेबल डेवल्पमैंट शिमला के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक कृषि को जीवित करने की दिशा में प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए वह किसान मेलों में शिरकत करते हैं और यह उनका 11वां सम्मेलन है। उन्होंने कहा कि उन्होंने किसानों के लिए शून्य लागत प्राकृतिक कृषि नामक पुस्तक प्रकाशित की है।

इस मौके पर राज्यपाल ने प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए संस्था को एक लाख रुपये देने की घोषणा भी की।

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