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ऐतिहासिक, पारम्परिक व सांस्कृतिक पहचान दर्शाती चौपाल की “वेशभूषा”

  • सर्दियों में बचने के लिए पहना जाता है लोईया
  • सफेद रंग का लोईया इस क्षेत्र में विशेष रूप से प्रसिद्ध

लोईया : यह भी बाह्य ऊनी परिधान है। इसे अधिकतर सुई-धागों से घरों में हाथ से सिला जाता है। लोईया में छोटी-छोटी पट्टियां होती हैं जिन्हें साखी कहा जाता है। लोईया सर्दियों में बचने के लिए पहना जाता है। इसकी लम्बाई आमतौर पर मर्द के घुटने तक या इससे चार/पांच ईंच नीचे तक हो सकती है। लोइए में माला का विशेष महत्व है। लोईया यथा बनावट 2 से 3 मीटर तक चौड़ाई वाले पहरावे का वस्त्र है। लेकिन कन्धों और छाती की चौड़ाई यथा नाप रखी जाती है। लोईया के बाहर गाची और गात्रा पहना जाता है। गाची में डांगरा लगाया जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से लोईया खशों का विशेष परिधान है। सफेद रंग का लोईया इस क्षेत्र में विशेष प्रसिद्ध है। जबकि काले व लाल रंग के लोईए का प्रचलन भी है।

  • कीमती रेशम कपड़े का बना होता है चोगा

चोगा : चोगा भी घुटनों तक लम्बा परिधान है। यह कीमती रेशम आदि कपड़े का बना होता है। इसमें बेल-बूटे भी होते हैं। सामने से यह खुला होता है तथा इसमें सुन्दर बटन लगे होते हैं। गात्रा वस्त्र से इसे बांधने की प्रथा है। तलवार इसके साथ विशेष रूप से सजाई जाती है। खूंद जब बिशू के लिए सुसज्जित होकर मैदान में जाते हैं तो चोगा पहना जाता है। विवाह के अवसर पर दूल्हे द्वारा भी इसे पहनने की प्रथा है। राजा लोग चोगा विशेष रूप से पहनते थे।

  • बन्द गले का कोट पहनते हैं चौपाल निवासी

कोट : चौपाल क्षेत्र के लोग साधारणत: बन्द गले का कोट पहना करते हैं। ये कोट ऊन और सूत दोनों के होते हैं। ऊनी कोट पहनने की प्रथा अधिक है। कोट में सामने बन्द करने के लिए बटन तथा बगल में दोनों ओर जेबें लगाई जाती हैं। समय के साथ-साथ सूती कपड़े के कोट बन्द और खुले गले के पहनने का भी प्रचलन आरम्भ हो गया। यह प्रतिदिन पहनने का परिधान है।

  • बास्कट पहनने की प्रथा भी प्रचलित

बास्कट : बास्कट पहनने का भी खूब रिवाज़ है। बास्कट मर्द और स्त्रियां दोनों ही शौक से पहनते हैं। ऊनी और सूती बास्कट विशेष रूप से पहनी जाती है। इसे स्थानीय बोली में आस्कट कहते हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि बास्कट पहनने की प्रथा भी प्रचलित है।

किश्तीदार टोपी पहनने की प्रथा

किश्तीदार टोपी : पारम्परिक रूप से चौपाल में किश्तीदार टोपी पहनने की ही प्रथा है। गोल टोपी बहुत कम लोग पहनते हैं। किश्तीदार टोपी अधिकतर सूती कपड़े की बनी होती है परन्तु कहीं-कहीं ऊनी टोपियां भी पहनी जाती हैं। खूंद परम्परा में ऊन की टोपी बनाई जाती थी जो नीचे से मुड़ी होती थी। इस पर हथियार का प्रभाव शीघ्र नहीं होता था।

दो प्रकार के होते हैं सूथण

पायजामा : खूंद बिशू में ठोडा खेलने के लिए चूड़ीदार पायजामा पहनते थे। इसे स्थानीय बोली में सूथण कहा जाता है। सूथण दो प्रकार के होते हैं : 1. साधारण ऊनी सूथण जो सर्दियों से बचने के लिए पहना जाता है। 2. चूड़ीदार ऊनी और सूती सूथण जो खूंद ठोडा खेलने के लिए प्रयोग करते हैं। साधारण पायजामा पहनने का भी रिवाज रहा है।

  • कमर में बांधने का वस्त्र गाची

गाची : गाची कमर में बांधने का वस्त्र होता है। इसकी लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। यह ऊनी और सूती दोनों प्रकार की होती है। ऊन के धागों को बुनकर रस्सी के आकार में पुराने समय से गाची बनाने की प्रथा रही है।

गले की ऊन पट्टी : जिस समय खूंदों का आपसी वैर चरमसीमा पर होता है उस समय डांगरे से अपने गले का बचाव करने के लिए ऊन के कपड़े से बनाई गई एक सुदृढ़ पट्टी खूंद अपने गले में पहना करते। इससे गले का का बचाव संभव होता।

  • महिलाओं के परिधान
  • स्त्रियों द्वारा पहना जाने वाला यह आकर्षक परिधान अचकन

अचकन : इसे स्थानीय बोली में चपकन भी कहा जाता है जो घुटनों तक लम्बी तथा ऊपर के भाग में स्त्रियों द्वारा पहना जाने वाला यह आकर्षक परिधान है। चपकन कन्धों, छाती तथा कमर से यथा नाप बनाई जाती है। जबकि घुटने पर इसकी चौड़ाई या गोलाई लगभग डेढ़ मीटर से अढाई मीटर तक रहती है। चपकन ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार की होती है। कमर के नीचे टांके गए बटन में दांई ओर के लम्बे छोर को बांधा जाता है। छाती के सामने नीचे की ओर सीधी पंक्ति के बटन लगे होते हैं।

कुर्ता-पायजामा : चौपाल जनपद में स्त्रियां साधारणत: कुर्ता-पायजामा भी पहनती हैं। पहले कुछ स्त्रियां चूड़ीदार पायजामा भी पहना करती थी। इसे स्थानीय बोली में सूथणी कहा जाता है। खश समुदाय की स्त्रियां इसे विशेष रूप से पहनती हैं। सूथणी ऊनी और सूती में भी होती हैं।

गाची: कमर में स्त्रियां गाची का अधिकतर प्रयोग करती हैं। यह गाची ऊन के धागों की भी बनाई जाती थी जो रस्सी के आकार की होती है।

  • स्त्रियों का सबसे रूचिकर पहनावा सिर पर पहने जाने वाला ढाठू

ढाठू : यह सिर पर पहने जाने वाला परिधान है। पौना मीटर चौरस रंग-बिरंगे कपड़े को त्रिभुजाकार बनाकर सिर पर पहना जाता है। जनपन में गुलाबी, पीले ढाठू तथा आजकल छींट के ढाठू पहनने का रिवाज है। स्त्रियों का यह सबसे रूचिकर पहनावा है।

  • ऊनी और सूती दोनों प्रकार का बनाया जाता है चोल्टू

चोल्टू : यह बास्केट के नाप का वस्त्र होता है। यह गले के पास से खुला होता है जहां दो बटन टंके होते हैं। नीचे से गोल तथा बन्द होता है। यह ऊनी और सूती दोनों प्रकार का बनाया जाता है। आज इसका प्रचलन नहीं है। इसे झिल्टू भी कहा जाता है।

  • स्त्री और पुरूष दोनों पहनते हैं लियाअ

लियाअ : यह एक प्रकार का जूता है। इसका तला चमड़े का और ऊपर का भाग रंग-बिरंगे ऊन के मजबूत धागों से बुनकर तैयार किया जाता है। इसे स्त्री और पुरूष दोनों पहनते हैं। अब इसका प्रचलन नहीं है। इसे अलाअ भी कहा जाता है। यह लिवास ज्यादातर बर्फ के दिनों में प्रयोग में लाया जाता है।

  • बकरी के बालों से बनाए जाते हैं खुरशे अर्थात बर्फ के बूट

खुरशे : सर्दी में जब बर्फ गिरती है तो बर्फ में चलने के लिए बकरी के बालों को तकली द्वारा कात उसका खूब मोटा धागा तैयार कर खुरशे अर्थात बर्फ के बूट बनाने के काम आता था। यह बर्फ के लिए सबसे गर्म बूट माना जाता है। आजकल इसका प्रचलन कम मात्रा में है।

  • साभार: हिमाचल प्रदेश के पारम्परिक परिधान एवं आभूषण

 

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