हि.प्र. प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने निपटाए 28873 मामले

भरण-पोषण का मुददा भी मुकदमे का अंग

  • क     भरण-पोषण के संबंध में आदेश देते समय अदालत के सिद्धांत

भरण-पोषण के संबंध में आदेश देते समय अदालत कुछ सिद्धांतों को अपनाकर चलती है:- 1. अदालत गरीब पक्ष को प्रतिमाह या कुछ निश्चित समय के बाद धन अदा किए जाने का आदेश दे

 भरण-पोषण के संबंध में आदेश देते समय अदालत के सिद्धांत

भरण-पोषण के संबंध में आदेश देते समय अदालत के सिद्धांत

सकती है। 2. भरण-पोषण के लिए अदा किया जाने वाला धन निश्चित करते समय अदालत आवेदन करने वाले की आमदनी और संपत्ति का ख्याल तो करती ही है, दूसरे पक्ष की खर्चा दे सकने की क्षमता का भी ध्यान रखती है। भरण-पोषण भत्ते की गणना का कोई कानूनी फार्मूला नहीं है। अदालत दोनों पक्षों की स्थिति, उनकी आयु और आश्रितों की संख्या आदि देखकर भरण-पोषण के लिए  दिया जाने वाला खर्चा तय करती है। 3. पत्नी का भरण-पोषण उसके माता-पिता भली प्रकार कर रहे हैं, यह दलील भरण-पोषण खर्चा न देने के लिए नहीं दी जा सकती। 4. सभी स्वस्थ पति अपनी पत्नी तथा बच्चों की देखभाल तथा पालन-पोषण करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। इसलिए यह कोई दलील नहीं है कि वह बेकार है, इसलिए भरण-पोषण का खर्चा नहीं दे सकता। 5. जिस व्यक्ति के खिलाफ आदेश दिया जा रहा है, उसकी संपूर्ण आमदनी को ध्यान में रखकर जज उनके रहन-सहन के स्तर का निर्धारण करता है। भरण-पोषण के लिए खर्चें की राशि तय करते समय जज व्यय योगय आय को ध्यान में रखता है। सकल आमदनी में से आयकर सरीखे खर्चें निकालकर व्यय योगय आय निर्धारित की जाती है। 6. अदालत किसी भी पक्ष की स्थितियां बदल जाने पर जैसे पत्नी को नौकरी मिल जाने पर भरण-पोषण के खर्चें संबंधी आदेश में संशोधन कर सकती है। पति से तलाक या विवाह संबंधी मामलों के अन्य हलों के लिए आवेदन किए बिना भी पत्नी भरण-पोषण भत्ते की मांग कर सकती है। ज़ाब्ता फौजदारी की दफा 125 और 126 के तहत पत्नी अदालत में भरण-पोषण के खर्चें की मांग कर सकती है। संबंधित इलाके के मजिस्ट्रेट को 500 रूपए प्रति माह तक भरण-पोषण खर्चा मंजूर करने का अधिकार है। ज़ाब्ता फौजदारी की ये दफाएं तलाक-शुदा पत्नी के लिए भी सुलभ हैं। लेकिन पति को इस नियम से उस हालत में मुक्त रखा गया है, जब उसने वैयक्तिक कानून  के तहत भरण-पोषण की रकम अदा कर दी हो। 8. अगर पत्नी दूसरा विवाह कर लेती है या वेश्यावृत्ति अपना लेती है, तो अदालत भरण-पोषण खर्चा देने संबंधी डिक्री को रद्द कर सकती है।

  • क     तलाक के बाद मुस्लिम महिला को भरण-पोषण खर्चा पाने का हक नहीं

मुस्लिम महिला को तलाक के बाद भरण-पोषण खर्चा पाने का हक नहीं है। इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद पति के ऊपर उसके भरण-पोषण का कोई दायित्व नहीं रहता। यह परंपरा मेहर की रकम अदा किए जाने का परिणाम है। मेहर वह रकम या संपत्ति है, जो शादी करने की खातिर पति से पाने की स्त्री हकदार होती है। मुस्लिम विवाह का मेहर अभिन्न अंग है और पत्नी भले ही उसकी मांग न करे, तब भी पत्नी उसे पाने की हकदार होती है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय न ज़ाब्ता फौजदारी की दफा 125 मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू करने का फैसला दिया था, किन्तु बाद के कानून द्वारा इस फैसले की धार भोथरी कर दी गई है।

  • क     विधवाओं के अधिकार

हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम हिन्दू एडोप्शन एंड मेनटेनेंस एक्ट में व्यवस्था है कि यदि विधवा अपनी आमदनी और जायदाद से अपना भली प्रकार भरण-पोषण नहीं कर सकती, तो इसमें जो कमी रहे, उसे पूरा करने का दायित्व उसके ससुर पर है। विधवा अपने पति, अपने पिता, अपनी माता, यदि बच्चे हों तो पुत्र और पुत्री की जायदाद से भरण-पोषण खर्चा पाने की हकदार है। अगर विधवा दूसरी शादी कर लेती है, तो उसके भरण-पोषण की ससुर की जि़म्मेदारी समाप्त हो जाती है।

साभार : क़ानूनी सलाह

Pages: 1 2

सम्बंधित समाचार

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *