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भरण-पोषण का मुददा भी मुकदमे का अंग

अधिवक्ता - रोहन सिंह चौहान

अधिवक्ता – रोहन सिंह चौहान

भरण-पोषण के दावे

  • क     भरण-पोषण का मुददा भी मुकदमे का अंग

जब तक ससुराल में पति-पत्नी हंसी खुशी से गृहस्थी चला रहे होते हैं, तब तक उन्हें यह पता ही नहीं होता कि कौन किसे क्या ले-दे रहा है। लेकिन जब गृहस्थी में तनाव शुरू होते हैं तो झगड़े के सबसे शुरूआती मुद्दों में भरण-पोषण का मुद्दा सामने आता है। जब भी पति-पत्नी में से कोई अदालत के सामने पिछले अध्याय में वर्णित चार हलों में से किसी एक के लिए आवेदन करता है, तो इनके साथ भरण-पोषण का मुददा भी मुकदमे का अंग बना हुआ होता है। भरण-पोषण का अर्थ है किसी व्यक्ति की उन आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए धन देना, जो कानून के द्वारा दूसरे व्यक्ति को दी जानी अनिवार्य हो।

  • क     पति भी कर सकता है पत्नी से भरण-पोषण के लिए धन का दावा

तलाक संबंधी अधिकांश कानूनों में यह मानकर चला जाता है कि महिलाएं अपने पतियों पर निर्भर होती हैं। लेकिन अब यह स्थिति तेजी से बदल रही है। अब यदि पत्नी अच्छी-खासी स्थिति में हो और पति से अधिक कमाती हो तो पति भी उससे भरण-पोषण के लिए धन का दावा कर सकता है। अगर पति वित्तीय दृष्टि से संकटपूर्ण स्थिति में हो, तो कामकाजी महिला को अपने पति को भरण-पोषण देना पड़ सकता है। हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत यदि पति की आमदनी न हो, तो वह गुजारा-भत्ता और मुकदमे के खर्चे दिए जाने की मांग कर सकता है।

  • क     दो अवसरों पर की जा सकती है भरण-पोषण की मांग
  • क     अदालत मुकदमें के हर चरण में दे सकती है खर्चे दिए जाने के आदेश
भरण-पोषण के दावे

भरण-पोषण के दावे

भरण-पोषण की मांग मुकदमें में दो अवसरों पर की जा सकती है। इसका पहला अवसर वह है जब मुकदमा शुरू ही हुआ हो, तो मुकदमें का अंतिम निर्णय होने तक के भरण-पोषण के लिए अस्थायी आदेश दिया जा सकता है। अदालत अंतरिम भरण-पोषण धन तथा मुकदमे के खर्चों के लिए आदेश दे सकती है। इससे उस पक्ष को जीवन  संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए खर्चा मिल सकता है, जब तक पति या पत्नी को भरण-पोषण सम्बन्धी स्थायी आदेश प्राप्त न हो। जज सामान्य रूप से पति-पत्नी की वित्तीय स्थिति का अध्ययन करके अंतिरम आदेश जारी कर सकता है। दूसरे चरण में अदालत भरण-पोषण संबंधी स्थायी आदेश आवेदन के अंतिम फैसले में कर सकता है और अपने अंतरिम ओदश में, दोनों पक्षों की स्थितियों में आए बदलावों को ध्यान में रखते हुए हुए संशोधन कर सकता है। अदालत मुकदमें के हर चरण में खर्चे दिए जाने के आदेश दे सकती है, जिससे गरीब पक्ष को कानूनी या वित्तीय दृष्टि से कष्ट की स्थिति न झेलने पड़े।

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