हिमकोस्ट की दो दिवसीय “वार्षिक समीक्षा बैठक 7-8 जून को कुफरी में : कुणाल सत्यार्थी

पालमपुर में भूकंपरोधी निर्माण पर 21-22 फरवरी को दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन : कुणाल सत्यार्थी

  • कार्यशाला का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश में भूकंपरोधी निर्माण के लिए जागरुकता पैदा करना
  • राज्य परिषद् ने इस दिशा में आपदा प्रबंधन के विभिन्न मंचों पर एक हजार से ज्यादा अफसरों/अधिकारियों को किया है प्रशिक्षित

शिमला : भारत सरकार की प्रधान संस्था केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की के सहयोग से 21-22 फरवरी को भूकंपरोधी निर्माण पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन पालमपुर में किया जा रहा है। कुणाल सत्यार्थी मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी एवं संयुक्त सदस्य सचिव, रा.वि. प्रौ. एवं पर्यावरण परिषद् ने जानकारी देते हुए बताया कि इस कार्यशाला का उदघाटन कांगड़ा की प्रभागीय आयुक्त नंदिता गुप्ता करेंगी। जिसमें विभिन्न विभागों से 130 प्रतिभागी जो कि मुख्यतः लोक निर्माण विभाग के कनिष्ठ अभियंता, 32 विकास खंडों कांगड़ा, ऊना, चंबा और हमीरपुर जिलों से कनिष्ठ अभियंता एवं मिस्त्री भाग लेंगे।

कुणाल सत्यार्थी ने बताया कि इस कार्यशाला का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश में भूकंपरोधी निर्माण के लिए जागरुकता पैदा करना है, ताकि आने वाले आपदा प्रभाव को कम किया जा सके। इंजी. वाई. पांडे, मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी और भूतपूर्व निदेशक सीबीआरआई रुड़की इस अवसर पर महत्वपूर्ण नोट प्रस्तुत करेंगे। राज्य परिषद् और सीबीआरआई रुड़की के वैज्ञानिक इस दो दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न विभागों से आए प्रतिभागियों से बातचीत करेंगे और जोन VI&V में Hand-on प्रशिक्षण जैसे कि भूकंपीय बैंड और भारवाहक संरचनाओं के निर्माण के प्रति जागरुक करेंगे।

हिमाचल प्रदेश राज्य जो पश्चिमोंत्तर हिमालय का हिस्सा है, पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय दोनों रुपों से दुर्बल है। भूविज्ञान के अनुसार हिमाचल पर्वत श्रृंखला विश्व की सबसे कम उम्र की श्रृंखला है जो अभी भी निर्माण चरण में है। प्राकृतिक आपदाएं हि.प्र. राज्य के लिए चिंता का विषय है क्योंकि हर वर्ष राज्य को भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़, हिमस्खलन एवं सूखे जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ता है। पर्वतीय राज्य की दुर्बल पारिस्थितिकी ने जलवायु की पारिस्थितियों में भिन्नताओं के साथ मिलकर इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति और अतिसंवेदनशील बनाया है। पिछले कुछ वर्षों में बादल फटने की घटनाओं ने मौसम वैज्ञानिकों तथा जन साधारण दोनों को समान रुप से प्रभावित किया है।

भारतीय उपमहाद्वीप विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है। कहा जाता है कि यह विश्व का सबसे आपदा प्रवण क्षेत्र है, जिसमें कि 55 प्रतिशत भूमि भूकम्प के प्रति, 8 प्रतिशत भूमि चक्रवात के प्रति और 5 प्रतिशत भूमि बाढ़ के प्रति संवदेनशील है। वास्तव में पिछले वर्षों के लिखित प्रमाणों से यह पता चलता है कि आपदाओं में बारंबरता और उग्रता दोनों ही रुपों से वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरुप प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति और हानियों में भी विश्वव्यापी वृद्धि हुई है।

राज्य के विभिन्न प्राकृतिक खतरों पर विचार करते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार ने विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत की है। राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण के जनादेश के एक भाग के रुप में इसने सरकार के विभिन्न अंगों को आपदा प्रबंधन के प्रति जागरुक करने के लिए यह कार्य शुरु किया था। राज्य परिषद् ने इस दिशा में आपदा प्रबंधन के विभिन्न मंचों पर एक हजार से ज्यादा अफसरों/अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है।

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