हिमाचल "बौद्ध धर्म" इतिहास, गलेशियर में छिपी नदी की तरह

हिमाचल: बौद्ध धर्म के पुनरूत्थान के सम्बंध में गुगे राज्य का अभूतपूर्व योगदान

बौद्ध धर्म के पुनरूत्थान के सम्बंध में गुगे राज्य का अभूतपूर्व योगदान

बौद्ध धर्म के पुनरूत्थान के सम्बंध में गुगे राज्य का अभूतपूर्व योगदान

हिमाचल का "बौद्ध धर्म" इतिहास

हिमाचल का “बौद्ध धर्म” इतिहास

हिमाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म की इतिहासिक श्रृंखला साक्ष्य के अभाव में बहुत अस्पष्ट है। चीनी यात्री ह्यूनत्सांग ने ने जो बौद्धमठ कुल्लू और कांगड़ा में देखे, उनके अवशेष अब विद्यमान नहीं हैं, जिन स्तूपों का उल्लेख किया वे भी नहीं हैं। प्रदेश के अधिकांश मन्दिरों में जिस देवता की पूजा सदियों से हो रही है, भीतर मूर्ति किसी दूसरे देवता की पाई जाती है। त्रिलोकीनाथ में अविलोकीतेश्वर को शिव कहा गया। कब बुद्ध धर्म की पताकाएं फहराने लगी, कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूंजने लगे, कब पद्मसम्भव, रत्नभद्र, तथागत आए, कब अमोध सिद्धि विरोचन बने? इतिहास गलेशियर में छिपी नदी की तरह है। इस कारण बहुत कुछ रहस्यमय है। जो कुछ प्रकाश में आया है, संक्षेप में दिया जाता है।

बौद्ध धर्म के पुनरूत्थान के सम्बंध में गुगे राज्य का अभूतपूर्व योगदान

हिमाचल प्रदेश के जन जातीय क्षेत्र के सन्दर्भ में गुगे राज्य का उल्लेख महत्वपूर्ण है। विद्वानों का कहना है कि विख्यात राजा लांगदर्मा द्वारा तिब्बत के सर्वनाश के बाद बौद्ध धर्म के पुनरूत्थान के सम्बंध में गुगे राज्य का अभूतपूर्व योगदान रहा है जब वह दसवीं शताब्दी के आसपास बौद्धमत का केन्द्र बना। यह क्षेत्र आरम्भ में छठी शताब्दी तक हिन्दू धर्म और भारत का एक अंग रहा है। निरमण्ड के मन्दिर में राजा समुद्रसेन द्वारा प्रदत्त सातवीं शताब्दी का ताम्रपत्र विद्यमान है और समुद्रसेन गुगे देश का राजा था।

तिब्बती ग्रन्थों में गुगे राजाओं का विशेष उल्लेख

मृकुला-प्राचीन मन्दिर बौद्ध तांत्रिक देवी वज्रवराह को समर्पित रहा है

मृकुला-प्राचीन मन्दिर बौद्ध तांत्रिक देवी वज्रवराह को समर्पित रहा है ”

तिब्बत के शासक लांगदर्मा का 842 ई. में वध हुआ, वहां अराजकता फैल गई, बौद्धमत का ह्रास हो गया। गुगे राज्य द्वारा तिब्बत में बौद्ध धर्म का पुनरूत्थान किया। पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के स्वतंत्र हुए शक्तिशाली राज्यों में गुगे राज्य प्रशासन प्रमुख था। तिब्बती ग्रन्थों में गुगे राजाओं का विशेष उल्लेख हैं, अन्यत्र कल्हण की राजतंरगिनी में गुग देश नाम आता है। तिब्बत में बौद्ध धर्म की पुन: स्थापना में गुगे राज्य के अतिरिक्त लांगदर्मा के वंशजों ने विशेष भूमिका निभाई। लांगदर्मा के उत्तराधिकारी ल्हा-दे राजा ने कश्मीर से प्रसिद्ध विद्वान सुभूति श्री शान्ति को आमंत्रित किया। उसने बौद्ध संस्कृत ग्रन्थों का तिब्बती में अनुवाद किया। ल्हा-दे के अनेक पीढिय़ों पश्चात दे उपनाम समाप्त कर मल वंश उपाधि नाम जोड़ा जैसे अनन्तमल।

वर्तमान किन्नौर जिला भी गुगे साम्राज्य के रहे हैं भाग

1650 ई. में ल्हासा शासन ने गुगे राज्य पर आक्रमण कर इसका नाम निशान मिटाने का प्रयास किया। यह समय-समय पर घटता-बढ़ता रहा है। गुगे के अतिरिक्त जंस्कर, स्पिति, लद्दाख, पुरंग जो मूल रूप से मानसरोवर और कैलाश पर्वत के मध्य का क्षेत्र था, वर्तमान किन्नौर जिला भी गुगे साम्राज्य के भाग रहे हैं। इसकी पुष्टि पुह में मिले एक शिलालेख से होती है। दसवीं गयारहवीं शताब्दी में गुगे अपने विकास और प्रगति की पराकाष्ठा तक पहुंच गया था। 1610 के आसपास इसका पतन आरम्भ हुआ। दसवीं शताब्दी में गुगे राज्य तिब्बत के लिए बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र बना। धर्म प्रचार-प्रसार के लिए ये शेस-ओद और उसके दो पुत्र नागराज, देवराज लामा बने। गुगे राज्य के धार्मिक और आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयत्न किए, अनेक बौद्ध विद्वानों को भारत से गुगे और तिब्बत के लिए आमंत्रित किया। 21 युवकों को भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए भेजना। उनमें से एक युवक रत्नभद्र को राजाओं का आध्यात्मिक गुरूकुल पुरोहित और मुख्य लामा नियुक्त किया। उसे मन्दिरों का निर्माता और साहित्य का महान अनुवादक कहा जाता है। उसने 108 मन्दिर, गोंपे स्थापित किए। इतिहास के अनुसार गुगे वैदिक युग से हजारों वर्षों से चला आ रहा है।

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