हिमाचल सेब के प्रापण के लिए मंडी मध्यस्थता योजना को मंजूरी

क्षणिक लाभ लेने के चक्कर में बागवान अपने बागीचे का करते हैं नुकसान : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

  • बागवान किसी भी प्रकार के कलर स्प्रे का न करें प्रयोग
  • कलर स्प्रे, इथरल या इथेफान हारमोन के प्रयोग से पौधों में होने वाली हानियों से बागवान अनभिज्ञ
  • सामान्य प्रक्रिया से ही तैयार होकर पकने दें पौधों पर लगे फल
  • क्षणिक लाभ लेने के चक्कर में बागवान अपने बागीचे का करते हैं नुकसान
  • सेब की किस्मों को 10-15 दिन पहले तोडऩे का क्रम एक फैशन
  • फल तुड़ान के बाद पत्तियों का पौधों पर रहना क्यों आवश्यक?
  • आकर्षक फूल जो संपूर्ण स्वस्थ हों, गुणवत्तायुक्त फल पैदा करने की रखते हैं क्षमता
  • फल तुड़ान के बाद पौधों पर सामान्य पत्तियों का लंबे समय तक स्वस्थ अवस्था में रहना अत्यंत महत्वपूर्ण

 

इठरल या ईथेफ़ोन छिड़काव के उपरांत पत्तियों का शीघ्र पीला होना एक संकट समस्या का द्योतक है

इठरल या ईथेफ़ोन छिड़काव के उपरांत पत्तियों का शीघ्र पीला होना एक संकट समस्या का द्योतक है

निचली पहाडिय़ों में स्थित सेब बागीचों में इस समय फलों का तुड़ान

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

आरंभ हो गया है। कुछ क्षेत्रों में तो जुलाई के दूसरे-तीसरे सप्ताह में यह कार्य बागवानों द्वारा पूरा कर लिया गया है। इन बागीचों में सभी किस्मों को एक ही समय पर तोडऩे का कार्य भी कर लिया गया है। इन क्षेत्रों में विशेषकर करसोग, चुराग, केलोधार, महोग, सैज बगड़ा, छत्तरी व कुल्लू तथा शिमला के भी क्षेत्रों में फसल को समय पूर्व यानि तैयार होने से बहुत पहले निकालने का क्रम पिछले कई वर्षों से सुचारू रूप से किया जा रहा है क्योंकि इन कच्चे फलों को सामान्य दाम कुछ अधिक मिल जाते हैं और वे भी केवल कुछ दिनों तक और उसके उपरांत दामों में भारी गिरावट देखने को मिलती है।

  • सभी किस्मों को एक साथ उतारना पौधों की बहुत अधिक हानि

शीघ्र तैयार होने वाली फल की किस्में जैसे टाईडमैन अर्ली बरसैस्टर, रैड जून इत्यादि के लिए तो यह सही कदम है परंतु यह देखा गया है कि इन किस्मों को भी 10-15 दिन पहले तोडऩे का क्रम एक फैशन बन गया है। इसके उपरांत स्पर किस्में 15 दिनों के अंतराल पर तैयार होती है और इसके 15-20 दिनों के बाद रायल, रैड डिलीशियस तैयार होती हैं। सभी किस्मों को एक साथ उतार कर पौधों की बहुत अधिक हानि होती है।

इन कच्चे फलों में इथरल/ इथेफान हारमोन का प्रयोग फलों में रंग लाने के लिए किया जाता है, ताकि फल अधिक लाल रंग के होकर मंडियों में बेचकर अच्छे दाम मिल जाएं।

  • कलर स्प्रे, इथरल या इथेफान हारमोन के प्रयोग से पौधों में होने वाली हानियों से बागवान अनभिज्ञ

कलर स्प्रे, इथरल या इथेफान हारमोन का प्रयोग सर्वथा अनुचित है इसके छिडक़ाव से जो हानि पौधों को होती है इस बात से

स्वस्थ गहरी हरी पत्तियाँ व प्रकृतिक रंग से परिपूर्ण फल

स्वस्थ गहरी हरी पत्तियाँ व प्रकृतिक रंग से परिपूर्ण फल

हमारे बागवान अनभिज्ञ तो हैं ही और इस हारमोन की मात्रा भी आवश्यकता से अधिक प्रयोग करते हैं। क्षणिक लाभ लेने के चक्कर में बागवान कितना नुकसान अपने बागीचे का करते हैं इसका उन्हें अनुमान भी नहीं होता। इस छिडक़ाव से होने वाली हानियों का वर्णन करना आवश्यक है जिसकी अधिकतर बागवान अनदेखी कर देते हैं।

यह सभी जानते हैं कि जब पौधों पर इथरल/इथेफान का छिडक़ाव किया जाता है उन पौधों की 50-60 प्रतिशत तक पत्तियां फल उतारने के तुरंत बाद पीली होकर गिर जाती हैं। शेष रही पत्तियों का रंग भी हल्का हरा हो जाता है और यह भी समय से पहले गिर जाती हैं।

  • फल तुड़ान के बाद पत्तियों का पौधों पर रहना क्यों आवश्यक?
  • पत्तियां मुख्य रूप से तीन कार्य करती हैं

अब यह भी जानना आवश्यक है कि फल तुड़ान के बाद पत्तियों का पौधों पर रहना क्यों आवश्यक है। पत्तियां मुख्य रूप से

तीन कार्य करती हैं। पहला व भोजन बनाती हैं, दूसरा वे जल उत्सर्जित करती हैं और तीसरा वे सांस लेती हैं यानि कार्बन डॉयक्साईड गैस शोषित करती हैं और ऑक्सीजन गैस वायु को शुद्ध करने के लिए छोड़ती हैं। जब फल उतार लिया जाता है तो पत्तियों द्वारा तैयार किया गया भोजन पौधों के भाग विशेषकर बीमों में तथा कलियों की कोंपलों में एकत्र किया जाता है और यह सामान्य प्रक्रिया नवम्बर माह तक निरंतर चलती रहती है। पौधों के इन भागों में आवश्यक पोषक पदार्थ पौधों के भागों को स्वास्थ्यवर्धक बनाते हैं और इनसे पत्तियां व फूल आकर्षक, सामान्य आकार के निकलते हैं। आकर्षक फूल जो संपूर्ण स्वस्थ हों, गुणवत्तायुक्त फल पैदा करने की क्षमता रखते हैं।

  • फल तुड़ान के बाद पौधों पर सामान्य पत्तियों का लंबे समय तक स्वस्थ अवस्था में रहना अत्यंत महत्वपूर्ण

इसके विपरीत परिस्थिति में जब पत्तियां पीली होकर झड़ जाएं और अन्य सामान्य गहरी हरी न हों, बहुत कमजोर फूल व पत्तियां आने वाले मार्च-अप्रैल के महीने में निकालती हैं जिनसे छोटे व कमज़ोर फल ही प्राप्त होते हैं। ऐसी परिस्थिति में पौधों की सामान्य आयु भी 10-15 वर्ष कम हो जाती है। अत: फल तुड़ान के बाद पौधों पर सामान्य पत्तियों का लंबे समय तक स्वस्थ अवस्था में रहना अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वस्थ, गुणकारी, पूर्ण आकार, उपयुक्त रंग, वज़न, स्वाद तथा लंबे समय तक टिकने वाले फल तभी प्राप्त किए जा सकते हैं यदि पौधों का स्वास्थ्य सही हो और वह पत्तियों के गहरे हरे रंग, सही आकार व संख्या से ही जाना जा सकता है।

  • सामान्य प्रक्रिया से ही तैयार होकर पकने दें पौधों पर लगे फल
  • पूर्ण समय पर फल उतारने पर पौधों में पत्तियां कभी भी पीली होकर नहीं गिरती
इठरल या ईथेफ़ोन छिड़काव के उपरांत पत्तियों का शीघ्र पीला होना एक संकट

इठरल या ईथेफ़ोन छिड़काव के उपरांत पत्तियों का शीघ्र पीला होना एक संकट

इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि पौधों पर लगे फल को सामान्य प्रक्रिया से ही तैयार होकर पकने दें और इनमें किसी रसायन विशेषकर इथरल या इथेफान का प्रयोग बिल्कुल भी न करें। यदि शीघ्र फल उतारना है तो शीघ्र पकने वाली किस्मों को ही बागीचें में लगाएं। पूर्ण समय पर फल उतारने पर पौधों में पत्तियां कभी भी पीली होकर नहीं गिरती और लंबे समय तक रहती हैं। फलों में असली रंग मैचेउर होने से 15 दिन पहले आरंभ होता है। यदि रंग नहीं आ रहा है तो समर पू्रनिंग को अपनाएं, कैलशियम क्लोराईड एक किलो तथा पोटाशियम सल्फेट 1 किलो प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर फल तुड़ान से 20-25 दिन पहले छिडक़ें, इससे फल में स्वभाविक रंग आएगा और पौधों में माईट की जीव संख्या भी नियंत्रण में रहेगी।

अत: किसी रंग का प्रयोग सेब बागीचों में न करें। एथोफेन से छिडक़े हुए फल मंडियों में पहुंचने पर अपना स्वाद खो बैठते हैं तथा कुछ दिनों में सडऩ आरंभ कर देते हैं। फलों में रंग के लिए अधिक रंग वाली किस्मों का चयन करके बागीचे में कम रंग वाली किस्मों को धीरे-धीरे बदल दें। इससे अधिक आय तथा लंबे समय तक फल प्राप्ति हो पाएगी।

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