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वैज्ञानिक विधियों के सही प्रयोग से ही होगा गुणवत्ता उत्पादन व आर्थिक लाभ : डॉ. एस. पी. भारद्वाज

Dr. S.P. Bhardwaj

डॉ. एस. पी. भारद्वाज

हिमाचल प्रदेश में जहां अधिकतर लोग कृषि और बागवानी पर निर्भर हैं वहीं हमारी कोशिश है कि हम अपने बागवानों और किसानों को बागवानी और कृषि संबंधी जानकारी से अवगत कराएं। ताकि फसल को बेहतर बनाने और उसकी पैदावार को बढ़ाने के लिए हमारी दी जानकारी उनके लिए फायदेमंद साबित हो। प्रदेश में जहां कई तरह के फलों की पैदावार होती है वहीं सबसे अहम है सेब। सेब की पैदावार प्रदेश में बड़े पैमाने पर होती है। जिसके चलते फसल की सही देखभाल, उसके रखरखाव, उसे और बेहतर बनाने और उसकी पैदावार को बढ़ाने के लिए आवश्यकता होती है सही ढंग से उसकी देख-रेख की। क्योंकि पौधों के लगाने से लेकर उनके तैयार होने तक और उसके बाद फिर से उन्हें जो देखभाल की आवश्यकता पड़ती है वो बहुत महत्वपूर्ण होती है। पौधों की सही देखभाल के लिए आवश्कता होती है पौधों को उसकी बीमारियों से बचाव किस प्रकार किया जाए। उसके अंदर पानी की नमी बरकरार रखने की। समय अनुसार छिडक़ाव की। सेब की नर्सरी तैयार करने के लिए और नर्सरी में बीजों को बोने के लिए सही तकनीक की। मौसम अनुसार परिवर्तन होने पर पौधों का किस प्रकार ख्याल रखा जाए? बागीचे की मिट्टी और ऊंचाई में विभिन्नता के कारण पौधों को उगाने के लिए बागवान असमंजस में रहते हैं। जैविक सेबों का उत्पादन और रासायनिक पदार्थों और स्प्रे का इस्तेमाल करने के प्रभाव से फसल पर क्या असर होगा। फसल की सही देखभाल किस प्रकार मौसम अनुसार समय-समय पर की जा सकती है। इसके लिए क्या-क्या सावधानियां बरतने की आवश्यकता है। इसके बारे में हमें हर बार एक नई जानकारी से अवगत कराएंगे देश और प्रदेश के जाने माने बागवान विशेषज्ञ डॉ. सत्य प्रकाश भारद्वाज। जो आपको बागवानी के विषय में हर प्रकार की जानकारी से अवगत कराएंगे। ताकि अब अपने पौधों की सही ढंग से देखभाल कर सकें और अच्छी पैदावार से लाभ कमा सकें।

बागवानी के इस क्रम में जो वर्तमान अंक आरंभ हो रहा है। इसमें लेखों द्वारा उन बातों व कार्यों पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे जो अत्यंत महत्वपूर्ण और थोड़ी समझ से व ध्यानपूर्वक करके सेब बागवानी में जल वायु का योगदान करके अनावश्यक व्यय को रोककर तथा आवश्यकतानुसार पौधे के विकास व फल-फूल की प्रक्रिया को समझ कर गुणवता फल उत्पादन कैसे करे। इस दिशा पर विशेष बल दिया जाएगा। बागवानी में यदि वैज्ञानिक विधियों को जो सरलता से प्रयोग की जा सकती है उसको समझकर सही समय, सही विधि व सही मायने में प्रयोग करके न केवल खर्चे कम किए जा सकते हैं अपिुत कई गुणा गुणवत्ता उत्पादन कर आर्थिक लाभ की प्राप्ति भी की जा सकती है। सबसे पहले समस्या की पहचान उसका प्रयोगात्मक निदान तथा यथा समय आवश्यकतानुसार उर्वरकों तथा कम से कम कीटनाशकों के प्रयोग तथा प्राकृतिक खेती के कार्यों पर बल दिया जाएगा जिससे पर्यावरण सुरक्षित तथा रसायन मुक्त हो पाए।

IMG_2900इस वर्ष की सर्दियों में विशेषकर दिसंबर से मध्य मार्च तक काफी अच्छी हिमपात तथा वर्षाजल की प्राप्ति कई सालों के अंतराल के बाद हुई है। इस निरंतर ठंड के कारण न केवल नितांत आवश्यक चिलिंग हवर्स की पूर्ति हुई है अपिुत भूमि में बहुत अच्छी मात्रा में जल की उपलब्धता भी हो पाई है। वर्षाजल व हिमपात थोड़े-थोड़े अंतराल पर प्राप्त होने पर फल पौधों में कोई टूट फूट भी नहीं हुई अपितु जल की उपलब्धता लंबे समय तक हो गई है। जिससे मई तक जल आपूर्ति की आवश्यकता नहीं रहेगी। जलवायु के इस क्रम से लगभग 1800 चिलिंग हवर्स की उपलब्धता हो पाई है। सामान्यत: 1200 चिलिंग हवर्स की आवश्यकता रहती है। इस जलवायु की प्राप्ति से अनेक लाभ प्राप्त होंगे जिसमें सर्वप्रथम फूलों के खिलने का क्रम लम्बे समय तक निरन्तर बना रहेगा तथा फूल भी आकर्षक होंगे। आकर्षक फूलों पर मधुमक्खियों के आने की संभावना अत्यन्त प्रबल रहती है और इन मधुमक्खियों के आगमन पर ही फूलों का केसर एक स्थान से दूसरे पौधों पर जा पाता है और फल बनता है।

जिन सेब बागीचों में खादों का प्रयोग नहीं हो पाया है उसे भी पौधों के तौलियों के बाहरी आधे घेरे में डालकर पूरा करें। कैल्शियम नाइट्रेट खाद को भी उसी समय प्रयोग करें क्योंकि यह पानी में शीघ्रता से घुलती है और इसका प्रयोग इसी समय अत्यन्त लाभदायक है। यह ध्यान रहे कि अधिक मात्रा में खाद विशेषकर उर्वरकों का प्रयोग न करें। वर्षा जल की अच्छी आपूर्ति होने के कारण इस वर्ष पौधों में पर्याप्त विकास होगा और उर्वरक अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर अधिक वनस्पतिक विकास होगा जो अनुचित है इससे अगले वर्ष तथा इस वर्ष की फल गुणवत्ता प्रभावित होगी तथा कांट-छांट भी अनावश्यक रूप से करनी होगी जिससे पौधों पर घाव पड़ेंगे और पौधों को इन घावों की भरपाई के लिए दी गई खाद व उर्वरक का उपयोग होगा तथा कैंकर और वूली एफिड के बढऩे की अधिक संभावना बन IMG_26311जाती है। जिन बागीचों में पोटाश खाद का प्रयोग नहीं किया गया है, इसे 1.5 से 1.25 किलो प्रति पौधा की दर से करें। इससे फलों में रंग बढ़ता है तथा रैड माईट, वूली एफिड व स्केल का प्रकोप भी कम होता है। इसके अतिरिक्त पौधों में सूखे व अन्य रोगों से लडऩे की क्षमता बढ़ जाती है।

पत्तियों का विकास आधा ईंच से टाईट कलस्टर अवस्था तक उच्च गुणवत्ता युक्त हार्टिकलचरल मिनरल तेल (एच एम ओ) का प्रयोग का उचित समय है। इनमें आरबोफाईन, मैक आलसीजन एच एम ओ इत्यादि प्रमुख है। पानी को 200 लिटर नापकर ड्रम में डालें इसमें ड्रम से 4 लिटर पानी निकाल लें तथा फिर एक बाल्टी को आधा पानी से भर लें तथा इसमें 4 लिटर एच एम ओ को धो लें तथा इस बाल्टी के घोल को ड्रम जिसमें 196 लिटर पानी है अच्छी तरह मिला लें। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ड्रम में एच एम ओ सहित पानी की मात्रा 200 लिटर हो। अधिकतर बागवान ड्रम में पानी जितना इसमें आता है भर लेते हैं और 200 लिटर पर निशान नहीं लगाते। ड्रम में एक बार पानी की 200 लिटर की मात्रा पर निशान लगाना आवश्यक है अन्यथा घोल या तो कमज़ोर या अधिक मात्रा में बन जाता है इन दोनों परिस्थितियों में कीट, माईट या रोगों का सफल नियंत्रण नहीं हो पाता। अत: ड्रम को 200 लिटर तक नापकर निशान अवश्य लगाएं।

किसी भी कीटनाशक के प्रयोग की इस समय आवश्यकता नहीं है। थ्रिप्स जो फूलों में होते हैं वर्तमान परिस्थितियों में बहुत कम जीव संख्या इन कीटों की होगी। अत: किसी भय या आशंका के कारण कीटनाशक का प्रयोग न करें। कीटनाशकों के प्रयोग से मधुमक्खियों की जीवसंख्या समाप्त हो जाती है और फल बनने की क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। किसी ऐसे रसायन का जिससे गंध निकलती हो जैसे थिमेट इत्यादि का प्रयोग किसी भी परिस्थिति में न करें। इससे मक्खियां बागीचों से दूर रहेंगी और बहुत कम संख्या में फूलों पर आएंगी जिससे फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होगी।

छिडक़ाव करते समय अत्यन्त बारीक से बारीक बूंदों का जो मिस्ट की तरह हो पौधों के सबसे ऊपरी भाग से आरम्भ करें तथा धीरे-धीरे तने की ओर आएं। जब पौधों से हल्की-हल्की बूंदें तने या पत्तियों या शाखाओं से गिरने लगे तभी तक छिडक़ाव करें। इससे अधिक करने पर यह व्यर्थ है और इससे कोई लाभ नहीं होगा। तने के आसपास के भाग को बिल्कुल साफ रखें तथा इसमें घास न उगने दें। इन बातों पर ध्यान देने पर पौधे का स्वास्थ्य तथा फल गुणवत्ता में सुधार होगा।

 

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