लाहौल का "पुत्रोत्सव-गोची"

लाहौल पारम्परिक जनजातीय उत्सव : सामूहिक पुत्रोत्सव

  • सामूहिक पुत्रोत्सव का पर्व गोची  आकर्षक, रंगीन एवं मनोरंजक
  • भारी हिमपात एवं भयंकर शीत के बावजूद भी लाहौल में रहती है पुत्रोत्सव-गोची की धूम
सामूहिक पुत्रोत्सव का पर्व गोची आकर्षक, रंगीन एवं मनोरंजक

सामूहिक पुत्रोत्सव का पर्व गोची आकर्षक, रंगीन एवं मनोरंजक

यूँ तो प्रदेश में हर उत्सव की अपनी धूम होती है। हर उत्सव की अपनी महत्ता। हम आपको इस बार जिस उत्सव की जानकारी देने जा रहे हैं  वो है लाहौल का सामूहिक पुत्रोत्सव-गोची। रोहतांग पर्वतद्वार के उस पार, मनाली-लेह मार्ग पर चन्द्र और भागा नदियों की घाटी लाहौल जिला, चारों ओर गगन चुम्बी हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से परिविष्ठत एक विस्मय कारक भूमि है। भारी मात्रा में हिमपात के कारण समस्त क्षेत्र 9-10 फुट मोटी हिम की चादर से ढक जाता है। तापमान भी 20-25 डिग्री नीचे आ जाता है। किन्तु भारी हिमपात एवं भयंकर शीत के बावजूद भी वहां के सामाजिक धार्मिक जीवन के क्रियाकलापों में अवरोध नहीं आता वरन् यही वह काल होता है जबकि वहां पर सभी महत्वपूर्ण धार्मिक कृत्यों एवं सामाजिक उत्सवों का आयोजन होता है।

  • पारम्परिक जनजातीय उत्सव है सामूहिक पुत्रोत्सव
    वास्तव में शीतकाल की कठोरता एवं निष्क्रियता को हल्का करने के लिए वहां के निवासी इस काल में अनेक प्रकार के उत्सवों का आयोजन करते हैं। सामूहिक पुत्रोत्सव का पर्व गोची भी एक ऐसा ही आकर्षक, रंगीन एवं मनोरंजक उत्सव है। यह उत्सव भागा घाटी के बौद्धों द्वारा मनाया जाता है, इसका केन्द्र केलंग है। यह जनवरी-फरवरी में हालडा से 20-25 दिन बाद शुक्ल पक्ष में किसी भी सोम या मंगलवार को मनाया जाता है। इसका सम्बन्ध पुत्र जन्म विशेषकर ज्येष्ठपुत्र-जन्म के साथ है।

यह एक पारम्परिक जनजातीय उत्सव है। इसमें मुख्य रूप से ग्राम देवता (केलंग) की पूजा की जाती है। उसका पुरोहित भी परम्परागत होता है जो कि लेन्छेन्पा जाति का होता है। केलंग देवता के इस पुजारी को लबदम्पा (देवपति) कहा जाता है। ये लोग गोची की पूर्व संध्या में एक घर में पूजा करते हैं। गोची का जलूस यही से आरम्भ होता है।

भारी हिमपात एवं भयंकर शीत के बावजूद भी लाहौल में रहती है पुत्रोत्सव-गोची की धूम

भारी हिमपात एवं भयंकर शीत के बावजूद भी लाहौल में रहती है पुत्रोत्सव-गोची की धूम

गोची का पर्व तीन दिन तक चलता है। प्रथम दिन को थार्स कहते हैं अर्थात छूट या मुक्ति।  लोगों को नाचने, गाने बजाने की पूरी छूट होती है। सोमवार को थार्स और मंगलवार को लक्ष्यवेध शुभ माना जाता है। ढोल बजाकर ग्राम देवता की पूजा होती है। लोग सतू और मक्खन लेकर वहां पहुंचते हैं। सतू का पिण्ड बनाया जाता है। मक्खन से भेड़ की आकृति बनाई जाती है, जिसे स्तूपाकार सतू के ऊपर रखा जाता है। इन सबको छङ के साथ देवता की भेंट पुरोहित करता है। पूजा के समय लौहार खूब ढोल पीटता है। दोपहर बाद गोची परिवार के लोग पुरोहित को आमंत्रित करने जाते हैं, और छङ भी साथ ले जाते हैं। पुरोहित निमंत्रण स्वीकार करता है और गोमूत्र युक्त जल से स्नान करके पारम्परिक वस्त्र धारण कर, सिर पर गोल टोपी पहन गोची वालों के घर जाता है। पारम्परिक गीतों के साथ छङ पीने को देते हैं।
थार्स की रात निचले केलंग वाले पुरूष और बच्चे जलूस के साथ पीपा छङ लेकर ग्राम देवता की पूजा करने के लिए ऊपर केलंग में आते हैं। दोनों दल अपनी-अपनी पूजा सामग्री लेकर ढलान स्थान मिलते हैं और देवता को अपनी भेंटे अर्पित करते हैं। फिर किसी एक दल के लोग दूसरे दल में से ऐसे लडक़े को पकडक़र अपनी ओर खींचकर ले जाते हैं जिसके माता-पिता जीवित हों। इसे पारिभाषिक शब्दावली में गोची बामा कहा जाता है। फिर किसी घर में जाते हैं , वहां छङ से उनकी सेवा होती है। अगले दिन उत्सव के लिए गोची वाले घरों में विशेष आयोजन होता है। विशिष्ट भोजन व पान की तैयारी होती है। लोग खा-पीकर जलूस में केलंग देवता के स्थल पर जाते हैं, आगे ढ़ोलची होते हैं, उसके पीछे लडक़ा, एक व्यक्ति मशाल (हालडा) लेकर चलता है।

इसके साथ एक बहुत सुन्दर विवाहिता या अविवाहिता युवती जिसे कलचोपॉ कहते हैं, मदिर पात्र को उठाकर चलती है। इनके पीछे बालक की मां सजधज कर चलती है और पिता भी साथ चलते हैं। जलूस के सभी लोग छङ के नशे में चूर, शिशु के माता-पिता को अश्लील फब्तियां कसते, अश्लील चेष्टाएं करते चलते हैं। अश्लीलता की उन्मुक्त उक्तियों तथा चेष्टाओं के बीच युवती को सिर झुकाए चलना पड़ता है। एक निर्धारित स्थान, केलंग देवता में एकत्र होते हैं। लीद के गोलों से वहां पर आने वालों पर बौछाड़ करते हैं। युवतियां एक पंक्ति में बैठकर नवजात शिशुओं की सुख-समृद्धि एवं दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं।

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