पर्यटकों के आकर्षण “हिमाचल की प्राकृतिक झीलें”

पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र “हिमाचल की खूबसूरत झीलें”

चन्द्रताल झील

सैलानियों को बर्बस आकर्षित करतीं “हिमाचली झीलें”

“हिमाचल  झीलों” का हिमाचल सौदंर्य निखारने में सर्वाधिक महत्व

हिमाचल के प्राकृतिक सौदंर्य को निखारने में यहां की प्राकृतिक व कृत्रिम झीलों का सर्वाधिक महत्व है। झीलों के किनारे धार्मिक स्थल भी हैं जिनकी खास विशेषता तो है ही लेकिन स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी हिमाचल की झीलें विशेष महत्व लिए है।  पर्यटकों का बार-बार आने के लिए उत्साहित रहना तो वजह साफ है, कि यहां के प्राकृतिक सौदंर्य सैलानियों को अपनी ओर बर्बस आकर्षित करते हैं।  इस बार हम आपको हिमाचल की प्रसिद्ध झीलों से रूबरू करवाने जा रहे हैं जिनका हिमाचल के सौदंर्य को निखारने में अपना एक विशेष स्थान तो है ही लेकिन धार्मिक महत्व भी है आइये ऐसी ही कुछ झीलों से  हम आपको अवगत कराते हैं :-

चंबा जिला की झीलें : चंबा जिले में तीसा से करीब 24 किलोमीटर दूर 3470 मीटर की ऊंचाई पर घड़ासरू झील है। चंबा और डल्हौजी के रास्ते में खजियार झील

खजियार झील का अदभुत नजारा

है। चंबा से 45 किलोमीटर दूर, धौलाधर की भीतरी ढलानों में 7 झीलों का समूह लामा झील है जो कि 3962 मीटर की ऊंचाई पर है। चंबा जिले में ही मणि महेश और कैलाश चोटी की तलहटी यहां सितंबर मास में बड़ा मेला लगता है। चंबा में ही 3657 मीटर की ऊंचाई पर महाकाली झील स्थित है।

कांगड़ा जिला की झीलें : कांगड़ा जिले के मुख्यालय धर्मशाला से 11 किलोमीटर दूर छोटी सी डल झील स्थित है। इसमें मिट्टी भर गई है और प्राय: दलदल सी दिखती है। धर्मशाला से 35 किलोमीटर दूर 3048 मीटर की ऊंचाई पर कबेरी झील है।

मण्डी जिला की झीलें : मण्डी शहर से 40 किलोमीटर दूर कुमावाह कामरूनाग झील है तथा 30 किलोमीटर दूर प्राशर झील है। इसमें तैरता हुआ एक द्वीप है। इस झील के किनारे पगौड़े के आकार का पराशर ऋषि का मंदिर है। मंडी से 25 किलोमीटर रिवालसर झील है। इस झील के किनारे एक बौद्ध-विहार और हिन्दू मन्दिर है। झील के ठीक ऊपर एक गुरूद्वारा है।

रिवालसर से ऊपर उठने वाली पर्वत-श्रृंखला पर सात झीलें हैं। इनमें से प्रसिद्ध हैं-कुंतभयोग झील जो रिवालसर शहर से 10 किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ी पर समुद्रतल से 1700 मीटर की ऊंचाई पर है। इसके दोनों ओर पहाड़ हैं। मध्य में यह झील 1215 मीटर गहरी है। प्रसिद्ध है कि माता कुन्ती की प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने धरती में तीर मारकर इसे निकाला था।

समुद्रतल से 1755 मीटर की ऊंचाई पर रिवालसर शहर के ऊपर कालासर झील स्थित है। दोनों ओर से सुन्दर वनों और पर्वतों से घिरी इस झील पर सर्दियों में हिमपात होता है। सुखसर झील भी रिवालसर से ऊपर 1760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसके जल संभरण क्षेत्र में घनी झाडिय़ां हैं।

गोबिन्द सागर झील

कुल्लू जिले की झीलें- कुल्लू जिले में मनाली के निकट भुगृ और दशहर झीलें हैं जहां पर्यटक जाते हैं। कुल्लू के जलोरी से 5 किलोमीटर दूर सरयोल सर झील है जिसका पानी स्वच्छ और शीतल है। झील के किनारे छोटा सा मंदिर भी है। मन्तालर झील पार्वती नाले के उत्स के पास है।

लाहौल और स्पीति की झीलें-कुंजम पर्वत श्रृंखला के निचले भाग में 4300 मीटर की ऊंचाई पर चन्द्रताल झील स्थित है। यह झील हिमखण्डों से बनी है और सर्दियों में जमी रहती है। बारालाचा दर्रे की चोटी के निकट सूरजताल झील है। यह 4980 मीटर की ऊंचाई पर है। वर्ष में अधिकांश समय बर्फ से ढकी रहती है।

शिमला जिले की झीलें-रोहडू तहसील में 4267 मीटर की ऊंचाई पर चांसल चोटी के निकट चन्द्र नाहन झील है। इस झील से पब्बर नदी निकलती है। कराली झील छोटा शाली पहाड़ी पर स्थित है जो कि शाली चोटी के सामने है। यह झील गन्दे पानी की चादर सी है परन्तु दूर, पहाड़ की ऊंचाई से पेड़ों के बीच धूप में चमकते पन्ने सी लगती है। बरादोनसर झील डोडरा क्वार और किन्नौर स्थित सांगला के बीच 5500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस झील का घेरा एक किलोमीटर है।

किन्नौर की झीलें-नाको झील पूह उपमंडल के अन्तर्गत नाको गांव के निकट 4300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह सर्दियों में जम जाती है और स्थानीय लोग इस पर स्केटिंग करते हैं।

सिरमौर जिले की झीलें-सिरमौर जिले के मुख्यालय नाहन से 38 किलोमीटर दूर प्रदेश की सबसे बड़ी झील रेणुका है। 3214 मीटर घेरे वाली इस झील का आकार मनुष्य जैसा है। यह झील

पौंग झीलपरशुराम जी की माता रेणुका के नाम से जुड़ी है। इसके निकट ही परशुराम झील भी है। सुकेती में सुकेती झील है जोकि शिवालिक जीवाश्म पार्क के निकट है। यह सिरमौर जिले में है। यह शिवालिक पर्वतों से बहकर आए रेत और पत्थरों से भरी है।

कृत्रिम झीलें-हिमाचल में जल-संग्रह करके विद्युत उत्पादन किया जाता है जिसके लिए अनेक बनावटी झीलों का निर्माण किया गया है।

गोबिन्द सागर झील-भाखड़ा बांध बनाने के लिए बिलासपुर में सलापड़ तथा भाखड़ा के बीच 90 किलोमीटर में बहने वाली सतलुत नदी को रोककर इस झील का निर्माण किया गया है जिसमें पुराना बिलासपुर शहर जलमगन हो गया था। इस क्षेत्र में रहते हुए गुरू गोबिन्द सिंह ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर औरंगजेब की सेनाओं को चुनौती दी थी इसीलिए उनकी याद में झील का नाम गोबिन्दसागर रखा गया है। इस झील का क्षेत्रफल 168 वर्ग किलोमीटर है।

पौंग झील-यह कांगड़ा जिला के पौंग बांध के कारण देहरा और पौंग के मध्य 1975 में बनी थी जिसकी लम्बाई लगभग 42 किलोमीटर है। यह ब्यास नदी पर बनी है। इसका नाम अमर सेनानी महाराणा प्रताप के नाम पर प्रताप सागर रखा गया है। 1983 से यह प्रवासी पक्षियों का प्रमुख आश्रय-स्थल है घोषित है।

पण्डोह झील-मण्डी से 25 किलोमीटर दूर स्थित पण्डोह नामक स्थान से औट की ओर ब्यास नदी पर बनाई गई है। यह पण्डोह बांध के कारण बनी है। यह झील लगभग 136 मीटर गहरी है और 2 किलोमीटर लंबी है। इसका क्षेत्रफल 4500 हैक्टेयर है।

चमेरा झील-चंबा जिले में रावी नदी पर बनाई गई यह झील चमेरा डैम के कारण बनी है।

ब्यास-सतलुज लिंक झील-ब्यास-सतलुज पनयोजना के कारण सुन्दरनगर में पूंछ के पास इस बनाया गया है। बगी से सुन्दरनगर पूंछ तक यह झील 11.8 किलोमीटर लंबी है।

गर्मपानी के चश्मे –हिमालय में अनेक स्थानों पर गर्मपानी के चश्में हैं। इन चश्मों का पानी रोगों को दूर करने वाला माना जाता है इसलिए देशभर से पर्यटक इनमें स्नान करने के लिए आते हैं। प्राय: गर्मपानी के इन चश्मों के निकट तीर्थ-स्थान विकसित हो गए हैं और बड़ी संख्या में श्रृद्धालु इन पर आते हैं। अन्य खनिजों के साथ-साथ गंधक की मात्रा इनके जल में अधिक है। प्रसिद्ध चश्मे जो विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं वो हैं:

मणीकर्ण :पार्वती घाटी में पार्वती नदी के किनारे मणीकर्ण अपने गर्म पानी के चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। यह नदी के दाएं किनारे पर स्थित है। पानी जोर से फूटकर ऊपर निकलता है और उसका तापमान उबलते पानी से अधिक होता है जिनमें चावल आदि उबाले जा सकते हैं। इस पानी में नमक और गंधक नहीं है परंतु रेडियो धर्मिता पाई गई है। देशभर से लोग रोगमुक्त होने के लिए इन चश्मों में स्नान करने के लिए आते हैं। लोगों का विश्वास है कि यहां के गर्म पानी से गठिया, निमोनिया तथा सांस संबंधी रोगों से छुटकारा मिलता है। पार्वती पर बने पुराने पुल से ब्रहगंगा तक लगभग 1.5 किलोमीटर में यह चश्में फैले हैं।

इन चश्मों के निकट चट्टाने काफी गर्म होती हैं जिनको छूने में कष्ट होता है। तीर्थयात्री और गांववासी इनके गर्म पानी में बारीक कपड़े बांधकर चावल पानी में तैरते बर्तन में रखकर दाल, सब्जियां तक पका लेते हैं। इसके पानी में डुबोकर चपातियां भी तैयार कर ली जाती हैं जो भाप पर बने पूड़ों जैसी होती है।

कसौल चश्में-भूंतर से 32 किलोमीटर दूर कसौल यहां पर एक स्थान पर गर्म पानी निकलता है। यहां पानी का तापमान मणिकर्ण से कम है। पगडडी के रास्ते मणिकर्ण से कसौल मात्र एक किलोमीटर है। “खीर गंगा में भी पानी कम गर्म है।

वशिष्ठ चश्में-मनानी से छह किलोमीटर दूर वशिष्ठ कुंड है जो महर्षि वशिष्ठ की साधना-स्थली बताया जाता है। यहां व्यास नदी के बाएं किनारे पर ग्रेनाईट की चट्टानों से गर्म पानी निकलता है जोकि हिमालय के विशाल भू-भाग में विद्यमान है। यह कुल्लू जिला में है।

तत्तापानी-शिमला जिला में तत्तेपानी में गर्म जल के चश्में हैं। पंजाबी का शब्द तत्ता ही गर्म सूचक है। शिमला से 51 किलोमीटर दूर नालदेहरा से 29 किलोमीटर आगे यह स्थान सतलुज नदी के किनारे स्थित है। मणिकर्ण और वशिष्ठ की तरह यहां के स्त्रोतों का जल भी कुछ रोगों को दूर करता है। नदी का जल -स्तर बढऩे के साथ ही इन चश्मों का जल-स्तर भी बढ़ता है।

ज्योरी के गर्म जल के स्त्रोत रामपुर से आगे हिन्दुस्तान-तिब्बत सडक़ पर डनू नाले के किनारे स्थित हैं।

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