पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया था मसरूर मंदिर का निर्माण

चट्टानों पर बना विशाल मन्दिर “मसरूर”

  • हमारी धरोहर हमारी गौरवशाली परम्परा का प्रतीक
  • पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया था मसरूर मंदिर निर्माण
  • सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा करना हम सब का नैतिक कर्तव्य
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  • मिट्टी रंग की चट्टानों को तराश कर आकर्षक शैली का रूप शैलोत्कीर्ण एकाश्म
मिट्टी रंग की चट्टानों को तराश कर आकर्षक शैली का रूप शैलोत्कीर्ण एकाश्म

मिट्टी रंग की चट्टानों को तराश कर आकर्षक शैली का रूप शैलोत्कीर्ण एकाश्म

हमारी धरोहर हमारी गौरवशाली परम्परा का प्रतीक

हमारी धरोहर हमारी गौरवशाली परम्परा का प्रतीक

हिमाचल प्रदेश में बहुत से प्राकृतिक स्थल, मंदिर और भव्य एवं अद्भुत धरोहरें मौजूद हैं जो न केवल देश अपितु विदेश से आने वाले लोगों को हिमाचल में बार-बार आने के लिए अपनी और आकर्षित करती है। ऐसा ही एक शैलोत्कीर्ण एकाश्म मन्दिर मसरूर चट्टानों (पर्वत) का फैला हुआ विशाल मन्दिर है जो (हिमाचल प्रदेश) के जिला कांगड़ा में बसा है। यह अदभुत मंदिर के रूप में वो धरोहर है जो यहां आने वाले लोगों को बार-बार आने के लिए प्रेरित करता है। मिट्टी रंग की चट्टानों को तराश कर आकर्षक शैली का रूप दिया गया है। बारीक छोटी-छोटी हस्तकला-शिल्प का सुन्दर नमूना है। इस हस्तकला-शिल्प को बारीकी से मिट्टी रंग की चट्टानों में गढ़ा गया है। इसके आगे बहुत ही सुन्दर तालाब है। तालाब के आस-पास बुहत से सुन्दर फुल खिले हुए है। इतना ही नहीं अपितु तालाब के साथ खिलते सुन्दर फूल, हरी-भरी घास, प्राचीन वृक्ष, आम के वृक्ष आदि इसकी सुषमा को चार चांद लगाते हैं। तालाब के इर्द-गिर्द लोहे के जंगले हैं। इस मन्दिर में अद्भुत कारीगरी की गयी है या यूं कहना ठीक होगा कि यह मन्दिर कारीगरी का एक अद्भुत नमूना है। जो चट्टानों को तराश कर बनाया गया है। यह मन्दिर विश्व प्रसिद्ध है।

1905 ई. में कांगड़ा में आये विनाशकारी भूकंप ने इन एकाश्म मंदिरों को बहुत क्षति पहुंचाई

मसरूर के शैलोत्कीर्ण मंदिर कांगड़ा जिले में धर्मशाला से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थानीय शिवालिक बलुआ पत्थर की पहाड़ी और उसके संबंधित क्षेत्र लाहौर में पदस्थापित अंग्रेज़ अधिकारी ने इन स्मारकों में रूचि ली और इन्हें पुरातात्विक सामग्री वाले स्मारकों में शामिल किया। कांगड़ा में 1905 ई. आये विनाशकारी भूकंप ने इन एकाश्म मंदिरों को बहुत क्षति पहुंचाई। लेकिन 1891 ई. के अनुमार्गणीय संदर्भों से पता चलता है कि 1905 ई. में आए भूकंप से पहले के मौसम के प्रभाव के कारण दक्षिणी भाग काफी क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके उपरांत भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण ने 1912-13 ई. में केंद्रीय संरक्षित स्मारक के रूप में इन्हें अभिलेखित कर परिरक्षित किया।

  • मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित
सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवम् संवर्धन में दें अपना सहयोग

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 मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

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मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

इन भव्य एवं अद्भूत मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित हैं। एक कथानक के अनुसार एक एकाश्म मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवास के दौरान किया गया। मंदिरों की विशालता एवं उनकी बनावट को देखकर यह कहा जाता सकता है कि इन मंदिरों का निर्माण पंजाब के किसी जालन्धर राजवंश के अज्ञात शासक की सहायता से किया गया होगा जिसका साम्राज्य प्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से कांगड़ा जिले तक फैला हुआ था। पहाड़ी के ढलान पर जंगली क्षेत्र में फैली हुई विशाल निर्माण एवं वास्तु अवशेषों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन समय में मसरूर मंदिर के आस-पास एक नगर रहा होगा। ऐसी संभावना है कि जालन्धर शासकों को जब अपने मूल मैदानी क्षेत्र से निष्कासित कर दिया गया था तब उन्होंने इस क्षेत्रों को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया होगा।

  • एक बड़े बलुआ पत्थर की पहाड़ी को काटकर किया गया है सोलह-मंदिरों का निर्माण
मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

कालातीत में मसरूर मंदिर समूह में चट्टान को काटकर बनाए गए उन्नीस स्वतंत्र खड़े हुए मंदिर थे, परंतु वर्तमान में इनमें से कुछ ही शेष बचे हैं। मुख्य मंदिर ठाकुरद्वार मध्य में स्थित है, इसी के चारों ओर अन्य मंदिरों को इसी समरूपता में बनाया गया था। इनमें से सोलह-मंदिरों का निर्माण एक बड़े बलुआ पत्थर की पहाड़ी को काटकर किया गया है जबकि दो मंदिर मुख्य समूह से अलग स्वतंत्र रूप से दोनों किनारों पर निर्मित हैं।

  • नागर-शैली में निर्मित इस मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह, अंतराल, मंडप एवं मुखमंडप

उत्तर पूर्व दिशा में स्थित मंदिर में उत्कीर्ण स्कन्द ठाकुरद्वार मंदिर का निर्माण गुफा के रूप में चटटान को विस्तृत रूप से अंलकृत किया गया है। मंदिर का द्वार उत्तर-पूर्व दिशा में है। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ललाटबिम्ब पर उत्कीर्ण शिव की प्रतिमा से पता चलता है कि वास्तव में यह एक शिव मंदिर था। नागर-शैली में निर्मित इस मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह, अंतराल, मंडप एवं मुखमंडप हैं। मंडप व मुखमंडप का पता विशाल गोलाकार स्तंभों के भगनावशेषों से चलता है जो अभी भी मुख्य योजनानुसार अपनी जगह पर मौजूद हैं। मंदिर के मंडप एवं मूल-प्रसाद के बीच एक बृहद अंतराल है, जिसकी छत को बहुत सुंदर ढंग से अलंकृत किया गया है जिनमें सात खिले हुए कमल एवं हीरक अलंकरण प्रमुख हैं।

  • ललाटबिम्ब की शाखाएं 17 शिव आकृतियों से अलंकृत

गर्भगृह का विशाल द्वारा पूर्ण रूप से अलंकृत है, जिनमें पांच द्वारशाखाएं एवं भारपट्ट हैं। ललाटबिम्ब की शाखाएं 17 शिव आकृतियों से अलंकृत हैं। इनके अलावा

 नागर-शैली में निर्मित इस मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह, अंतराल, मंडप एवं मुखमंडप

मसरूर मंदिर

शक्ति-देवी की पांच अलग-अलग मूर्तियां हैं जिनमें द्वार के ऊपर बनी महेश्वरी, इन्द्राणी एवं तीन सिर वाली वज्र-वाराही को आसानी से पहचाना जा सकता है।

  • खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण मंदिर की पीठिका में प्रमुख
 खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण मंदिर की पीठिका में प्रमुख

खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण मंदिर की पीठिका में प्रमुख

गर्भगृह के अंदर मध्य में एक उठी हुई पादपीठिका है जिसके ऊपर राम-लक्षण एवं सीता की पाषाण मूर्तियां हैं जोकि बाद के काल की प्रतीत होती हैं। मुख्य मंदिर का शिखर नागर शैली का है जिसमें नौ-भूमियां हैं, प्रत्येक भूमि के कोनों पर आमलक बने हैं। वरण्डिका के ऊपर चौड़े चैत्य कोष्ठ से सुसज्जित शिखर है, जो अत्यं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। चारों दिशाओं में सुकनासिका के ऊपर तीन भद्रमुख बने हैं जोकि क्रमानुसार एक-दूसरे के ऊपर अवस्थित हैं। दो स्वास्तिकाकार देव-मंदिर मुख्य मंदिर समूह से दोनों कर्ण-पाशर्व पर अलग से अवस्थित हैं। उनमें से उत्तर-पूर्वी दिशा में स्थित मंदिर पूर्ण अवस्था में है। मंदिर की पीठिका में खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण प्रमुख हैं। मंदिरों की दीवारों में बने हुए अलंकृत आलों में इंद्र, शिव, दुर्गा व कार्तिकेय की मूर्तियां उत्कीर्ण है। दीवारों के ऊपर मण्डित वरण्डिका भाग को चैत्य कोष्ठों से सुसज्जित किया गया है। पूर्वी द्वार के उतरंग पर सात देवी-देवताओं को दर्शाया गया है जिनके मध्य में शिव अवस्थित हैं। उत्तरी प्रवेश द्वार के उतरंग पर पांच देवियों को दर्शाया गया है जिनके मध्य लक्ष्मी विराजमान है। अन्य प्रवेश द्वारों की द्वार शाखा एवं उतरंग पर कमलाकृति एवं पत्रलता का अलंकरण उत्कीर्ण हैं।

  • पहाड़ी की पूर्वी दिशा में कुछ शैलोत्कीर्ण गुफाएं एवं एक तालाब

मुख्य मंदिर समूह के अतिरिक्त पहाड़ी की पूर्वी दिशा में कुछ शैलोत्कीर्ण गुफाएं एवं सम्मुख एक तालाब है, जो विद्वानों और पर्यटकों को ध्यान सहसा ही अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये गुफाएं शैव-धर्मावलम्बियों एवं अनुयायियों के आवास-गृह थे। मंदिर समूह के सामने निर्मित तालाब में असंख्य मछलियां हैं। यहां पर आने वाले पर्यटक इन जल-क्रीड़ारत मछलियों के खेल का आनंद उठाते हैं।

 

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