ज्योतां जगदियां ज्वालामुखी...... अठारह महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ''ज्वालामुखी मन्दिर''

ज्योतां जगदियां ज्वालामुखी…… अठारह महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ”ज्वालामुखी मन्दिर”

  • पांडवों को जाता है ज्वालामुखी मंदिर खोजने का श्रेय
दीपशिखा शर्मा

दीपशिखा शर्मा

पांडवों को जाता है ज्वालामुखी मंदिर खोजने का श्रेय

पांडवों को जाता है ज्वालामुखी मंदिर खोजने का श्रेय

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर स्थित है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को ज्योतां वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता है। इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। मान्यता है यहां देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। यहां पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग-अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया है। इन नौ ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजनादेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निर्माण राजा भूमि चंद ने करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद ने 1835 ई. में इस मंदिर का पूर्ण निर्माण कराया।

ज्वालामुखी मंदिर में 55 वर्षों से माँ की सेवा कर रहे “पंडित उदय कुमार” जिनकी  आयु  67 साल है ने हमें मदिर के बारे और यहां की प्रसिद्धी के बारे में बताया।

ज्वालामुखी मंदिर में 55 वर्षों से माँ की सेवा कर रहे "पंडित उदय कुमार" जी

ज्वालामुखी मंदिर में 55 वर्षों से माँ की सेवा कर रहे “पंडित उदय कुमार” जी

 

  • अकबर और ध्यानु भगत की कथा :

पंडित उदय कुमार ने बताया कि इस जगह के बारे में एक कथा अकबर और माता के परम भक्त ध्यानु भगत से जुड़ी है। जिन दिनों भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था, उन्हीं दिनों की यह घटना है। हिमाचल के नादौन ग्राम निवासी माता का एक सेवक ध्यानु भगत एक हजार यात्रियों सहित माता के दर्शन के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली में उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानु भगत को पेश किया।

बादशाह ने पूछा, तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहां जा रहे हो। ध्यानु ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, मैं ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहा हूं मेरे साथ जो लोग हैं, वह भी माता जी के भक्त हैं और यात्रा पर जा रहे हैं।

अकबर ने सुनकर कहा, यह ज्वालामाई कौन है? और वहां जाने से क्या होगा? ध्यानु भगत ने उत्तर दिया, महाराज ज्वालामाई संसार का पालन करने वाली माता है। वे भक्तों के सच्चे ह्रदय से की गई प्रार्थनाएं स्वीकार करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है उनके स्थान पर बिना तेल-बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन को जाते हैं। अकबर ने कहा, अगर तुम्हारी बंदगी पाक है तो देवी माता जरुर तुम्हारी इज्जत रखेगी। अगर वह तुम जैसे भक्तों का ख्याल न रखे तो फिर तुम्हारी इबादत का क्या फायदा? या तो वह देवी ही यकीन के काबिल नहीं, या फिर तुम्हारी इबादत झूठी है। इम्तहान के लिए हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते हैं, तुम अपनी देवी से कहकर उसे दोबारा जिन्दा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गई।

ध्यानु भगत ने कोई उपाए न देखकर बादशाह से एक माह की अवधि तक घोड़े के सिर व धड़ को सुरक्षित रखने की प्रार्थना की। अकबर ने ध्यानु भगत की बात मान ली और उसे यात्रा करने की अनुमति भी मिल गई।

बादशाह से विदा होकर ध्यानु भगत अपने साथियों सहित माता के दरबार में जा उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि करने के बाद रात भर जागरण किया। प्रात:काल आरती के समय हाथ जोड़कर ध्यानू ने विनती की कि मातेश्वरी आप अन्तर्यामी हैं। बादशाह मेरी भक्ती की परीक्षा ले रहा है, मेरी लाज रखना, मेरे घोड़े को अपनी कृपा व शक्ति से जीवित कर देना। कहते हैं कि अपने भक्त की लाज रखते हुए माँ ने घोड़े को फिर से ज़िंदा कर दिया।

बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में

बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में

  • मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए अकबर ने बनवायी थी नहर

    ज्वाला माँ

    ज्वाला देवी

यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया। उसने अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा। वहां पहुंचकर फिर उसके मन में शंका हुई। उसने अपनी सेना से पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं। तब जाकर उसे माँ की महिमा का यकीन हुआ और उसने सवा मन्न (पचास किलो) सोने का छतर चढ़ाया, लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर गिरकर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया। था। तबसे माता रानी ने यह निर्देश दिया था कि यहां नारियल ही चढ़ेगा। आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं।

  • पास ही गोरख डिब्बी का चमत्कारिक स्थान

इस मन्दिर में कुछ सीढियां चढ़कर बाबा गोरखनाथ का मन्दिर है जिसे गोरख डिब्बी भी कहते हैं। यहां खौलता हुआ पानी है जो हाथ लगाने पर बिलकुल ठंडा होता है। इसके दर्शन लपटों के रूप में पुजारी करवाते हैं। यहां चढ़ावे के रूप नारियल में चढाया जाता है। मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एव भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बांये हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। थोड़ा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि यहां गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और कई चमत्कार दिखाए थे। यहां पर आज भी एक पानी का कुण्ड है जो देखने में खौलता हुआ लगता है पर वास्तव में पानी ठंडा है। ज्वालाजी के पास ही 4.5 कि.मी. की दूरी पर नागिनी माता का मंदिर है। इस मंदिर में जुलाई और अगस्त के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। 5 कि.मी. की दूरी पर रघुनाथ जी का मंदिर है जो राम, लक्ष्मण और सीता को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा कराया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढ़ी हुई है।

  • मंदिर में अग्नि की अलग-अलग नौ ज्योतें हैं, जो भिन्न-भिन्न देवियों को हैं समर्पित

    मंदिर में अग्नि की अलग-अलग नौ ज्योतें हैं, जो भिन्न-भिन्न देवियों को हैं समर्पित

    मंदिर में अग्नि की अलग-अलग नौ ज्योतें हैं, जो भिन्न-भिन्न देवियों को हैं समर्पित

ज्वालामुखी मंदिर को ज्वालाजी के रूप में भी जाना जाता है, जो कांगड़ा घाटी के दक्षिण में 30 किमी. की दूरी पर स्थित है। ये मंदिर हिन्दू देवी ज्वालामुखी को समर्पित है। जिनके मुख से अग्नि का प्रवाह होता है। इस मंदिर में अग्नि की अलग अलग नौ ज्योतें हैं जो अलग-अलग देवियों को समर्पित हैं जैसे महाकाली अन्नपूरना, चंडी, हिंगलाज, बिंध्यवासनी , महालक्ष्मी सरस्वती, अम्बिका और अंजनादेवी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ये मंदिर सती के कारण बना था। बताया जाता है कि देवी सती की जीभ यहां गिरी थी।

  • हिन्दू धर्म में देवी सती का महत्वपूर्ण स्थान ‘ज्वालामुखी मंदिर’

हिन्दू धर्म में देवी सती का एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस मंदिर में अग्नि की ज्योतें एक पर्वत से निकलती हैं। साथ ही ये भी माना जाता है कि देवी आज भी इस मंदिर में विराजती हैं। ये भी बताया जाता है कि पराक्रमी राजा अशोक को देवी में गहरी आस्था थी और वो यहां अक्सर देवी के दर्शन के लिए आते थे। सम्राट अशोक यहां से निकलने वाली अग्नि की लपटों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। यह भी कहा जाता है कि देवी के प्रति अपनी अटूट भक्ति के तहत सम्राट अशोक ने देवी को एक सोने की छत्री दी थी जो आज भी यहां पर है और पानी से ज्वाला की रक्षा करती है।

अठारह महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ‘ज्वालामुखी मन्दिर’

अठारह महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ‘ज्वालामुखी मन्दिर’

  • अठारह महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ‘ज्वालामुखी मन्दिर’

भारत की महाशक्ति पीठों में से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला में स्थित ज्वालामुखी मन्दिर है जहां देश के कोने–कोने से भक्तजन मन्नते मांगने शारदीय नवरात्रों में भी आते हैं। वैसे तो भक्तों का आना-जाना समस्त वर्ष ही यहां लगा रहता है लेकिन नवरात्रों में माता के दर्शनों का जो पुण्य प्राप्त करता है उस पर माता विशेष कृपा करती है।

  • राजा भूमि चंद ने करवाया था मन्दिर का निर्माण
  • महाराजा रंजीत सिंह ने बनवाया मन्दिर का जीर्णोद्धार

यह नवरात्र आश्विन मास की शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर 9 दिन तक चलते हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजा भूमि चंद ने करवाया था और महाराजा रंजीतसिंह ने मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये शक्ति पीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं।

  • देवी पुराण में है 51 शक्तिपीठों का वर्णन

देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। हालांकि देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में ज़रूर 51 शक्तिपीठों की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं। वर्तमान में भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्ति पीठ है।

  • माता जगदम्बिका ने सती के रूप में लिया था जन्म

आदिशंकराचार्य के द्वारा वर्णित 18 महाशक्ति पीठो में भी ज्वालामुखी मन्दिर का उल्लेख है। माता के इन 51 शक्तिपीठों के बनने की कथा के अनुसार राजा प्रजापति

मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए अकबर ने बनवायी थी नहर

मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए अकबर ने बनवायी थी नहर

दक्ष की पुत्री के रूप में माता जगदम्बिका ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया। एक बार मुनियों का एक समूह यज्ञ करवा रहा था। यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था। जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए।

भगवान शिव दक्ष के दामाद थे। यह देखकर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए। दक्ष अपने दामाद शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे। सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व / ब्रिहासनी’ नामक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए।

नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने मना कर दिया। लेकिन सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई।

यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमान जनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी और उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये।

तब भगवान शिव ने सती के वियोग में यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भू-मण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस

महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ‘ज्वालामुखी मन्दिर’

महाशक्ति पीठों में से एक कांगड़ा का ‘ज्वालामुखी मन्दिर’

स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहां महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते।

‘तंत्र-चूड़ामणि’ के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। इस तरह कुल 51 स्थानों में माता की शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। इस तरह पृथ्वी पर जहां-जहां भी सती के शरीर के अंग गिरे वहीं अनेक रूपों में शक्तियां प्रकट हुई और इस तरह 51 शक्तिपीठ स्थापित हो गए।

  • कांगड़ाघाटी के ज्वालामुखी नामक स्थान पर गिरी थी सती की जिव्हा, जो कहलाई “ज्वालाजी”

यह माना जाता है कि हिमाचल प्रदेश में सती की जिव्हा कांगड़ाघाटी के ज्वालामुखी नामक स्थान पर गिरी थी जहां स्वत: अगिन अर्थात ज्वाला रूप में मां ने जन्म लिया और ज्वालाजी कहलाई। इसी तरह कांगड़ाघाटी के कांगड़ा नामक स्थान में देवी के वक्ष स्थल का एक भाग गिरा और मां बज्रेश्वरी के रूप में प्रकट हुई। ऊना जिले के चिंतपूर्णी में सती के चरण और बिलासपुर में नैनाधार नामक स्थान पर आंखें गिरी, जहां क्रमश: चिंतपूर्णी और नैनादेवी जैसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ बने।

  • 51 शाक्तिपीठों में श्री ज्वालाजी का महत्व कालांतर से सर्वाधिक
“माँ ज्वालाजी” का शयनकक्ष

“माँ ज्वालाजी” का शयनकक्ष

51 शाक्तिपीठों में श्री ज्वालाजी का महत्व कालांतर से सर्वाधिक रहा है। मंदिर निर्माण की घटना के संबंध में मान्यता है कि जब माता ने ज्वाला रूप में जन्म लिया तो एक गवाले को सबसे पहले एक घने जंगल गौएं चराते हुए इस ज्योति के दर्शन हुए। यह जमाना राजा भूमिचंद्र का था। जैसे ही उसे इस घटना का पता चला तो उसी समय यहां आया और उसने एक मंदिर का निर्माण करवाया। उसके बाद इसकी महत्ता बढ़ती गई और मंदिर का परिसर का विस्तार भी होता रहा। यह भी धारणा है कि श्री ज्वालामुखी में पांडव भी आए थे जिन्होंने इस मंदिर का जिर्णोद्धार किया। यह बात कांगड़ा में प्रचलित इस लोक गीत से स्पष्ट होती है: पंजा-पंजा पंडवा मैया तेरा भवन बणाया, अर्जुन चॉर झुलाया।

मंदिर में प्रज्जवलित ज्योतियों को बादशाह अकबर ने कई बार बुझाने का प्रयास किया लेकिन वह सफल न हुआ। उसने इस पर पानी की नहर डलवाई और बाद में लोह के मोटे तवों से ज्योतियों को ढांप लिया, लेकिन ये ज्योतियां उन्हें फाड़ कर निकल गई। माता की शक्ति के आगे नतमस्तक होकर उसने अंत में माता के नाम एक सोने का छतर मंदिर में चढ़ाया लेकिन वह चढ़ाते-चढ़ाते ऐसी अदभूत धातु में परिवर्तित हो गया जिसका अभी तक पहचाना जाना रहस्य बना है। मंदिर मंडप शैली में निर्मित है और ऊपर सोने का पालिश चढ़ा है। इसे महाराज रणजीत सिंह ने अपने शासनकाल में चढ़वाया था। उनके पौत्र कुवंर नौनिहाल सिंह ने मंदिर के प्रमुख दरवाजों को चांदी के पतरों से बनवाया जो आज भी विद्यमान है।

  • ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं चमत्कारिक है माँ ज्वाला :

पृथ्वी के गर्भ से इस तरह की ज्वाला निकलना वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला, कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहां पर ज्वाला प्राकर्तिक न होकर चमत्कारिक है क्योंकि अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अन्दर से निकलती ‘ऊर्जा’ का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस ‘ऊर्जा’ को नहीं ढूंढ पाए। वही अकबर लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाए। यह दोनों बाते यह सिद्ध करती है की यहां ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पादन होता।

  • ज्वालामुखी मंदिर परिसर काफी विशाल

    ज्वालामुखी मंदिर परिसर काफी विशाल

    ज्वालामुखी मंदिर परिसर काफी विशाल

श्री ज्वालामुखी मंदिर परिसर काफी विशाल है। परिसर के प्रमुख देवालयों में सेजा भवन, वीर कुंड, गोरख डिब्बिया, श्री राधा कृष्ण मंदिर, शिव शक्ति स्थल, काली भैरव मंदिर, लाल शिवालय, सिद्धि नागार्जुन, अत्बिकेश्वर महादेव, श्री संतोषी माता मंदिर शामिल है। इनमें से कुछ मंदिर से ऊपर पहाड़ी पर चली गई सीढ़ियों के किनारे स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त एक किलोमीटर ऊपर पहाड़ी की गोदी में टेढ़ा मंदिर स्थित है जहां श्री राम और सीता जी के दर्शन किए जा सकते हैं। श्री ज्वालामुखी मंदिर से पार श्री तारादेवी का प्राचीन मंदिर भी दर्शनीय है।

अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।

  • यहां पहुंचे कैसे?

यहां पहुंचना बेहद आसान है। यह जगह वायु मार्ग, सड़क मार्ग और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ीहुई है।

  • सड़क मार्ग

पठानकोट, दिल्ली, शिमला आदि प्रमुख शहरों से ज्वालामुखी मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है। यात्री अपने निजी वाहनों व हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस के द्वारा भी वहां तक पहुंच सकते है। दिल्ली से ज्वालाजी के लिए दिल्ली परिवहन निगम की सीधी बस सुविधा भी उपलब्ध है।

  • वायु मार्ग

ज्वालाजी मंदिर जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा गगल है जो कि ज्वालाजी से 46 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहा से मंदिर तक जाने के लिए कार व बस सुविधा उपलब्ध है।

  • रेल मार्ग

रेल मार्ग से जाने वाले यात्री पठानकोट से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की सहायता से मरांदा होते हुए पालमपुर आ सकते हैं। पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है।

 

 

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