कांट-छांट का सही समय फरवरी माह : डा. एस.पी. भारद्वाज

अपने पौधों की समस्याओं के अनुरूप करें छिडक़ाव : डा. एस.पी. भारद्धाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

  • बीमों की कांट-छांट उन पौधों में अवश्य करें जो 15 वर्ष की आयु से अधिक हों
  • हिमपात तथा मध्यम व निचली पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा होने पर बागवानों व किसानों को कुछ राहत
  • बागवान पौधों में तौलिए व गोबर की गली सड़ी खाद का कर सकते हैं प्रयोग
  • तौलिए में तने के पास खाद डालने से जड़ छेदक कीट व अन्य छिद्रक कीट का प्रकोप बागीचों में बढ़ जाता है
  • बीमों की कांट-छांट उन पौधों में अवश्य करें जो 15वर्ष आयु से अधिक हो
  • अच्छी व गुणवत्ता युक्त फल प्राप्ति के लिए ताजा, सशक्त नए बीमों का होना अनिवार्य
  • टीएसओ का प्रयोग न करें क्योंकि यह तेल अशुद्ध है, बल्कि शुद्ध आयल का प्रयोग करें जो प्राप्त किया जा सकता है एचएमओ से
  • पैसा व्यर्थ न गवाएं और सोच समझकर या फिर वैज्ञानिक सलाह लेकर ही बागीचों में करें छिडक़ाव
  • वैज्ञानिक विधि से खेत व बागवानी करने में ही समझदारी है, अत: इसे अपनाएं
  • केवल तौलिए का आधा बाहरी भाग ही खाद व उर्वरक डालने के लिए करें प्रयोग

 

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बहुत दिनों के अन्तराल के पश्चात के फरवरी में अन्तत: हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ी क्षेत्रों में हिमपात तथा मध्यम व निचली पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा होने पर बागवानों व किसानों को कुछ राहत मिली है। उस समय में हुई बर्फवारी तथा वर्षा नि:संदेह आने वाले भविष्य में पानी की कमी की आपूर्ति करने में सहायक सिद्ध होगी। वर्षा व हिमपात न होने के कारण बागवान पौधों के तौलिए तथा खाद डालने का कार्य नहीं कर पा रहे थे। अब बागवान पौधों में तौलिए बना सकते हैं तथा गोबर की गली सड़ी खाद का प्रयोग कर सकते हैं। गोबर की गली खाद 10 किलो प्रति पौधे प्रति वर्ष की दर से तौलिए के बाहरी घेरे में डालें तथा इसे तुरंत एक ईंच मिट्टी की पर्त से ढक दें। तने से यह कोई अन्य खाद या उर्वरक की कम से कम 3-4 फुट दूरी बनाए रखें।

केवल तौलिए का आधा बाहरी भाग ही खाद व उर्वरक डालने के लिए प्रयोग करें।

केवल तौलिए का आधा बाहरी भाग ही खाद व उर्वरक डालने के लिए प्रयोग करें।

साधारणत: यह देखा गया है कि बागावान गोबर की खाद तने के पास डालते हैं और इसे बहुत दिनों के बाद फैलाते हैं और

 टी.एस ओर या एचएमओ हार्टीकलचरल मिनरल तेल का प्रयोग सेब बागीचों में कर रहे हैं जो युक्तिसंगत नहीं

टी.एस ओर या एचएमओ हार्टीकलचरल मिनरल तेल का प्रयोग सेब बागीचों में कर रहे हैं जो युक्तिसंगत नहीं

वह भी पूरे तौलिए में जो सर्वथा अनुचित है। तौलिए में तने के पास खाद डालने से जड़ छेदक कीट व अन्य छिद्रक कीट का प्रकोप बागीचों में बढ़ जाता है क्योंकि यह खाद जड़ छिद्रक कीट के अंडे में से बाहर निकलने पर भोजन की आपूर्ति करता है और बड़ा होने पर यह  छिद्रक कीट पौधों की जड़ों को खाता रहता है। खाद का सही ढंग से प्रयोग करने पर तथा इसे तुरंत मिट्टी से ढंकने मात्र से जड़ छिद्रक के प्रकोप का कम करने में सहायता मिलती है। कई बार तो बागवान कच्चे या पूर्णरूप से गली सड़ी खाद भी प्रयोग करते हैं ऐसा करने से बचें और केवल गली सड़ी गोबर की खाद का ही प्रयोग करें। इस खाद को पौधे के आधे बाहरी तौलिए के भाग में फैलाकर डालें। दस वर्ष की आयु वाले पौधों में 100 किलो तक ही गोबर की खाद का प्रयोग करें।

गोबर की खाद के साथ इस समय सिंगल सुपर फास्फेट 2 किलो 200 ग्राम प्रति पौधा जो 10 वर्ष से अधिक हो डालें, और विधि भी वही अपनाएं जो गोबर की खाद को डालने के लिए प्रयोग की गई है। इसके अतिरिक्त किसी अन्य खाद या उर्वरक का प्रयोग न करें।

पौधों के तौलिए भी पौधे के फैलाव के अनुरूप ही बनाएं। यदि स्थान की कमी हो तो जितना अधिक से अधिक संभव हो उतना बनाएं। तने के चारों और का आधा भाग कलम किए गए भाग को ऊपर रखकर समतल बनाएं और इसमें घास उगने न दें। केवल तौलिए का आधा बाहरी भाग ही खाद व उर्वरक डालने के लिए प्रयोग करें। अन्यथा खाद का अधिकतर भाग पौधों को नहीं मिल पाएगा और व्यर्थ हो जाएगा। पौधों की कांट-छांट का कार्य पूरा कर लें। और ब्रार्डो मिक्चर बनाने के लिए 2 किलो नीला थोथा तथा 2 किलो साधारण अनबुझा चूना प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर पूर्णत: छिडक़ें। इस छिडक़ाव से कैंकर रोग तथा बूली एफिड के प्रकोप को नियंत्रण करने में सफलता मिलती है। यह केवल ऐसा छिडक़ाव है जो 100-120 दिनों तक प्रभावी रहता है अन्यथा कोई अन्य फफूंदनाशक केवल 15-21 दिनों तक ही रोगरोधक क्षमता रखता है।

बीमों की कांट-छांट उन पौधों में अवश्य करें जो 15 वर्ष आयु से अधिक हों। पूरे बागीचे के एक तिहाई पुराने बीमों को नया बनाने का प्रयत्न करें और इस कार्य को तीन वर्ष में पूरा करें। अच्छी व गुणवत्ता युक्त फल प्राप्ति के लिए ताजा, सशक्त नए बीमों का होना अनिवार्य है। अन्यथा गुणवत्ता तथा स्थिर मानक अनुरूप फल की प्राप्ति की संभावना कम हो जाती है। इस संदर्भ में पहले भी कहा जा चुका है। कांट-छांट का कार्य पूरे फरवरी महीने में बिना किसी संकोच के पूरा किया जा सकता है।

जिन बागीचों में तने पर चूना लगाने का कार्य पूरा नहीं किया जा सका है, उसे शीघ्र करें। इसके लिए एक किलो नीला थोथा, 9 किलो चूना, 30 लीटर पानी तथा एक लीटर अलसी का तेल प्रयोग करें। यह लेप पौधों के पहली टहनी तक लगाएं इसके कारण तने की छाल नहीं फटेगी तथा तना छिद्रक कीट व वूली एफिड का आक्रमण भी कम होता है।

आजकल कुछ बागवान टी.एस ओर या एचएमओ “हार्टीकलचरल मिनरल तेल” का प्रयोग सेब बागीचों में कर रहे हैं जो युक्तिसंगत नहीं है। आज से तीन-चार दशक

बीमों की कांट-छांट उन पौधों में अवश्य करें जो 15वर्ष आयु से अधिक हो

बीमों की कांट-छांट उन पौधों में अवश्य करें जो 15वर्ष आयु से अधिक हो

पहले टीएसओ का छिडक़ाव सेब बागीचों में किया जाता था, जिसका मुख्य कारण इन स्प्रे आयल का अत्यंत अशुद्ध होना था क्योंकि इन्हें बाद में जब पौधों का शीत स्वाप या डएमैंसी पूरी हो जाती थी, में प्रयोग ही नहीं किए जा सकते थे क्योंकि

जिन बागीचों में तने या चूना लगाने का कार्य पूरा नहीं किया जा सका है, उसे शीघ्र करें

जिन बागीचों में तने या चूना लगाने का कार्य पूरा नहीं किया जा सका है, उसे शीघ्र करें

यह पौधों की पत्तियों को जला देते थे। इस समय इनका प्रयोग सैजोज व रेड माईट के अंडों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। बागवान वही पुरानी पद्धति बिना सोच विचार कर प्रयोग कर रहे हैं। इससे बागवान तेल की 7-8 लीटर मात्रा प्रति 200 लीटर पानी में प्रयोग करके भी न तो सैंजोस स्केल और न ही रैड माईट पर नियंत्रण पाने में सफल हो पाएं हैं। जिसका मुख्य कारण यह है कि उस समय यह कीट व माईट गहरे शीतस्वाप में होते हैं और इन्हें ऑक्सीजन की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है अत: यह छिडक़ाव निर्रथक हो जाते हैं।

वर्तमान में इन मिनरल तेलों में नवीनतम तकनीक अपनाकर इन्हें शुद्ध किया गया है और यह जल की तरह पारदर्शक होते हैं और इनमें कोई विशेष गंध भी नहीं होती। इन्हें हार्टीकलचरल मिनरल तेल या एचएमओ के नाम से जाना जाता है और यह कई नामों से बाजार में उपलब्ध है। टीएसओ का प्रयोग न करें क्योंकि यह तेल अशुद्ध है और इससे पौधों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यह तो पुरानी रीत थी जब एचएमओ का विकास नहीं हो पाया था।

वर्तमान में शुद्ध आयल का प्रयोग करें जो एचएमओ से प्राप्त किया जा सकता है। सर्वप्रथम यह पौधों की विभिन्न विकास अवस्थाओं में प्रयोग किए जा सकते हैं। क्योंकि यह शुद्ध है तथा इन्हें प्रयोग करके कीटनाशाकों के प्रयोग में कमी आती है। जो मित्र कीट, पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य के लिए हितकर है। दूसरे इनकों पौधों की बाद की अवस्था में भी प्रयोग किया जा सकता है। सैंजांउस्केल व यूरोपियन रैड माईट में सक्रियता तब बढ़ती है जब पौधों की पत्तियां आधा इंच से टाईट कलस्टर अवस्था में होती है। उस समय टीएसओ का प्रयोग न करें, अपितु एचएमओ जो मैक आल सीजन या आरबोफाईन नाम से सुगमता से मिल रहे हैं की 4 लीटर 196मिली लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ें। उस समय इस मात्रा के छिडक़ाव से सैंजाज स्केल व रैड माईट के अंडों पर व्यापक नियंत्रण प्राप्त होता है। इससे पहले किए गए छिडक़ाव निरर्थक होते हैं तथा इन्हें न करें।

इस समय किए किसी तेल के छिडक़ाव का कोई लाभ नहीं होता केवल व्यर्थ में पैसा व मेहनत तथा समय की बरबादी होती है। अत: पैसा व्यर्थ न गवाएं और सोच समझकर या फिर वैज्ञानिक सलाह लेकर ही बागीचों में छिडक़ाव करें। केवल वहीं छिडक़ाव करें जो आवश्यक है और जिनके करने पर आपके बागीचों में पनप रही समस्या का समाधान होता है और जो पर्यावरण के लिए घातक न हो अधिक छिडक़ाव करने की एक भ्रान्ति है जिससे पूर्ण रूप से बचना चाहिए। अपने पौधों की समस्याओं के अनुरूप ही छिडक़ाव करें। जो पौधों के स्वास्थ्य  को सुधार करके लंबे समय तक स्वस्थ रख सकें। पौधों के स्वस्थ होने पर ही कीट माईट व रोग कम पनपेगे तथा गुणवत्ता युक्त फल की प्राप्ति

अच्छी व गुणवत्ता युक्त फल प्राप्ति के लिए ताजा, सशक्त नए बीमों का होना अनिवार्य

अच्छी व गुणवत्ता युक्त फल प्राप्ति के लिए ताजा, सशक्त नए बीमों का होना अनिवार्य

हो सकेगी। अत: निरर्थक तथा घटिया सामग्री व छिडक़ाव से पूर्णत: बचें। वैज्ञानिक विधि से खेत व बागवानी करने में ही समझदारी है। अत: इसे अपनाएं।

  • भूमि में नमी कम होने के कारण अभी तक पौध रोपण का कार्य संभव नहीं हो पाया था इसे अब किया जा सकता है पूरा

भूमि में नमी कम होने के कारण अभी तक पौध रोपण का कार्य संभव नहीं हो पाया था इसे अभी पूरा किया जा सकता है। रोपण से पहले पौधों को कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 300 ग्राम तथा क्लोरपायरीफास (डरमेट या डरसबान) 250 मि.ली. तथा एचएमओ (मैकआलसीजन या आरबोफाईन) 2 लीटर प्रति 100 लीटर पानी में घोल कर पौधों को 10 मिनट तक पूरा डुबोएं। ऐसा करने पर सैजीस स्केल, रैड माईट बूली एफिड तथा रोगों का संपूर्ण नियंत्रण होता है।

शेष बचें इस घोल को पौध स्थापन के पश्चात पौधे के तौलिए को 4-5 लीटर घोल से शाम के समय सींच दें। इससे पौधों में रोग व कीट के पनपने की संभावना बहुत कम हो जाती है तथा स्थापित होने में सहायता मिलती है। तौलिए में 100 ग्राम राख को भी मिलाया जा सकता है उससे भी पोषक तत्वों के अतिरिक्त छिद्रक का प्रयोग नहीं हो पाता।

 

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